{"_id":"6a54da33c28ef2057d05faf2","slug":"when-she-disclosed-her-pregnancy-she-was-deprived-of-her-right-to-earn-a-livelihood-noida-news-c-1-noi1095-4496440-2026-07-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"Noida News: गर्भावस्था की सूचना दी, तो छीन लिया आजीविका का हक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Noida News: गर्भावस्था की सूचना दी, तो छीन लिया आजीविका का हक
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गर्भावस्था की सूचना दी, तो छीन लिया आजीविका का हक
श्रम न्यायालय ने 42 महिलाओं को दिलाया न्याय
काउंसलिंग के बाद कई महिलाओं की नौकरी हुई बहाल
ज्योति कार्की
नोएडा। मां बनने की खुशी कई कामकाजी महिलाओं के लिए चिंता का कारण बन रही है। जिले में कई निजी कंपनियां गर्भवती होने की जानकारी मिलते ही महिला कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही हैं या फिर उन्हें मैटरनिटी लीव देने से इनकार कर रही हैं।
ऐसे मामलों में महिलाएं अब श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटा रही हैं। पिछले एक साल में जिले के श्रम न्यायालय में ऐसे 42 मामले पहुंचे, जिनमें महिलाओं ने नौकरी बचाने और अपने अधिकारों के लिए शिकायत दर्ज कराई। श्रम विभाग के अनुसार, अधिकांश शिकायतें निजी कंपनियों, फैक्ट्रियों और संस्थानों से आती हैं। कई महिलाओं ने आरोप लगाया कि गर्भावस्था की जानकारी देने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें प्रदर्शन खराब होने, अनुबंध समाप्त होने या अन्य कारण बताकर नौकरी से हटा दिया गया। कुछ मामलों में कंपनियों ने मातृत्व अवकाश देने से भी इनकार कर दिया।
श्रम निरीक्षक सुप्रिया ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद सबसे पहले दोनों पक्षों को नोटिस भेजा जाता है। इसके बाद काउंसलिंग के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया जाता है। यदि समझौता नहीं होता तो मामला श्रम न्यायालय में भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में कंपनियों ने महिला कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखा, बकाया वेतन का भुगतान किया और नियमानुसार मैटरनिटी लीव भी दिलाई गई। उन्होंने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत पात्र महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश और अन्य सुविधाएं देना नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी है। यदि कोई कंपनी इसका पालन नहीं करती तो महिला श्रम विभाग में शिकायत दर्ज करा सकती है।
विज्ञापन
केस स्टडी-1
गर्भावस्था बताई, नौकरी चली गई
सेक्टर-63 की एक निजी कंपनी में कार्यरत महिला ने गर्भवती होने की जानकारी दी। कुछ दिनों बाद कंपनी ने उसका अनुबंध समाप्त कर दिया। किसी तरह वह श्रम विभाग पहुंची। उसका कहना था कि इसमें उसकी क्या गलती है। वह कंपनी में कई वर्षों से काम कर रही थी। श्रम विभाग के हस्तक्षेप के बाद कंपनी ने महिला को दोबारा नौकरी पर रखा और बकाया वेतन का भुगतान किया।
केस स्टडी-2
मैटरनिटी लीव नहीं दी
सेक्टर-1 स्थित एक फैक्ट्री में कार्यरत महिला को मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया गया। महिला ने बताया कि उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह नौकरी छोड़कर घर बैठे। वह चाहती थी कि नियम के अनुसार छुट्टी मिलने के बाद उसको दोबारा फैक्ट्री में आने का मौका दिया जाए। शिकायत के बाद श्रम विभाग ने दोनों पक्षों की काउंसलिंग कराई, जिसके बाद कंपनी ने महिला को मैटरनिटी लीव और अन्य लाभ दिए।
केस स्टडी-3
इस्तीफा देने का बनाया दबाव
विभाग में कई महीने पहले एक महिला पहुंची, उसका आरोप था कि वह एक निजी संस्थान की कर्मचारी है। जैसे ही उसने गर्भावस्था के बारे में बताया तो उस पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। मामला श्रम न्यायालय पहुंचा तो पहले कंपनी के लोगों को नोटिस दिया गया, इसके बाद उनको बुलवाया गया। जिसके बाद उनके बीच समझौता हुआ और महिला की नौकरी बहाल कर दी गई। साथ ही उसका बकाया भुगतान भी कराया गया। आज महिला की एक बेटी है और वह अपने काम को कर रही है।
वर्जन
पिछले एक वर्ष में मैटरनिटी लीव और गर्भावस्था के कारण नौकरी से निकाले जाने के 42 मामले आए हैं। शिकायत मिलने पर पहले काउंसलिंग कराई जाती है, समाधान नहीं होने पर मामला श्रम न्यायालय में जाता है। कई महिलाओं को नौकरी और उनका बकाया भुगतान दिलाया गया है। महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। -सुप्रिया द्विवेदी, श्रम निरीक्षक, गौतमबुद्ध नगर
जानें क्या है मातृत्व अवकाश नियम
मातृत्व अवकाश कामकाजी महिलाओं को बच्चे के जन्म और उनकी देखभाल के लिए दिया जाने वाला सवैतनिक अवकाश है। भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के तहत 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में काम करने वाली हर महिला 26 सप्ताह (करीब 6 महीने) की सवेतन छुट्टी पाने की पात्र होती है। छुट्टी की अवधि पहले दो बच्चों के लिए 26 सप्ताह (लगभग 182 दिन) का अवकाश मिलता है, जिसमें से 8 सप्ताह डिलीवरी से पहले लिए जा सकते हैं। तीसरे बच्चे या उससे अधिक के लिए 12 सप्ताह की छुट्टी का नियम है। इस अवकाश का लाभ उठाने के लिए महिला को पिछले 12 महीनों में कम से कम 80 दिन उस कंपनी में काम किया होना चाहिए।
विज्ञापन
श्रम न्यायालय ने 42 महिलाओं को दिलाया न्याय
काउंसलिंग के बाद कई महिलाओं की नौकरी हुई बहाल
ज्योति कार्की
नोएडा। मां बनने की खुशी कई कामकाजी महिलाओं के लिए चिंता का कारण बन रही है। जिले में कई निजी कंपनियां गर्भवती होने की जानकारी मिलते ही महिला कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही हैं या फिर उन्हें मैटरनिटी लीव देने से इनकार कर रही हैं।
ऐसे मामलों में महिलाएं अब श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटा रही हैं। पिछले एक साल में जिले के श्रम न्यायालय में ऐसे 42 मामले पहुंचे, जिनमें महिलाओं ने नौकरी बचाने और अपने अधिकारों के लिए शिकायत दर्ज कराई। श्रम विभाग के अनुसार, अधिकांश शिकायतें निजी कंपनियों, फैक्ट्रियों और संस्थानों से आती हैं। कई महिलाओं ने आरोप लगाया कि गर्भावस्था की जानकारी देने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें प्रदर्शन खराब होने, अनुबंध समाप्त होने या अन्य कारण बताकर नौकरी से हटा दिया गया। कुछ मामलों में कंपनियों ने मातृत्व अवकाश देने से भी इनकार कर दिया।
विज्ञापन
श्रम निरीक्षक सुप्रिया ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद सबसे पहले दोनों पक्षों को नोटिस भेजा जाता है। इसके बाद काउंसलिंग के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया जाता है। यदि समझौता नहीं होता तो मामला श्रम न्यायालय में भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में कंपनियों ने महिला कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखा, बकाया वेतन का भुगतान किया और नियमानुसार मैटरनिटी लीव भी दिलाई गई। उन्होंने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत पात्र महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश और अन्य सुविधाएं देना नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी है। यदि कोई कंपनी इसका पालन नहीं करती तो महिला श्रम विभाग में शिकायत दर्ज करा सकती है।
विज्ञापन
केस स्टडी-1
गर्भावस्था बताई, नौकरी चली गई
सेक्टर-63 की एक निजी कंपनी में कार्यरत महिला ने गर्भवती होने की जानकारी दी। कुछ दिनों बाद कंपनी ने उसका अनुबंध समाप्त कर दिया। किसी तरह वह श्रम विभाग पहुंची। उसका कहना था कि इसमें उसकी क्या गलती है। वह कंपनी में कई वर्षों से काम कर रही थी। श्रम विभाग के हस्तक्षेप के बाद कंपनी ने महिला को दोबारा नौकरी पर रखा और बकाया वेतन का भुगतान किया।
केस स्टडी-2
मैटरनिटी लीव नहीं दी
सेक्टर-1 स्थित एक फैक्ट्री में कार्यरत महिला को मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया गया। महिला ने बताया कि उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह नौकरी छोड़कर घर बैठे। वह चाहती थी कि नियम के अनुसार छुट्टी मिलने के बाद उसको दोबारा फैक्ट्री में आने का मौका दिया जाए। शिकायत के बाद श्रम विभाग ने दोनों पक्षों की काउंसलिंग कराई, जिसके बाद कंपनी ने महिला को मैटरनिटी लीव और अन्य लाभ दिए।
केस स्टडी-3
इस्तीफा देने का बनाया दबाव
विभाग में कई महीने पहले एक महिला पहुंची, उसका आरोप था कि वह एक निजी संस्थान की कर्मचारी है। जैसे ही उसने गर्भावस्था के बारे में बताया तो उस पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। मामला श्रम न्यायालय पहुंचा तो पहले कंपनी के लोगों को नोटिस दिया गया, इसके बाद उनको बुलवाया गया। जिसके बाद उनके बीच समझौता हुआ और महिला की नौकरी बहाल कर दी गई। साथ ही उसका बकाया भुगतान भी कराया गया। आज महिला की एक बेटी है और वह अपने काम को कर रही है।
वर्जन
पिछले एक वर्ष में मैटरनिटी लीव और गर्भावस्था के कारण नौकरी से निकाले जाने के 42 मामले आए हैं। शिकायत मिलने पर पहले काउंसलिंग कराई जाती है, समाधान नहीं होने पर मामला श्रम न्यायालय में जाता है। कई महिलाओं को नौकरी और उनका बकाया भुगतान दिलाया गया है। महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। -सुप्रिया द्विवेदी, श्रम निरीक्षक, गौतमबुद्ध नगर
जानें क्या है मातृत्व अवकाश नियम
मातृत्व अवकाश कामकाजी महिलाओं को बच्चे के जन्म और उनकी देखभाल के लिए दिया जाने वाला सवैतनिक अवकाश है। भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के तहत 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में काम करने वाली हर महिला 26 सप्ताह (करीब 6 महीने) की सवेतन छुट्टी पाने की पात्र होती है। छुट्टी की अवधि पहले दो बच्चों के लिए 26 सप्ताह (लगभग 182 दिन) का अवकाश मिलता है, जिसमें से 8 सप्ताह डिलीवरी से पहले लिए जा सकते हैं। तीसरे बच्चे या उससे अधिक के लिए 12 सप्ताह की छुट्टी का नियम है। इस अवकाश का लाभ उठाने के लिए महिला को पिछले 12 महीनों में कम से कम 80 दिन उस कंपनी में काम किया होना चाहिए।