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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   One warmer... three innocent lives... and the system remains silent!

Delhi NCR News: एक वार्मर... तीन मासूम... और सिस्टम खामोश!

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 20 Aug 2026 01:01 AM IST
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- एक वार्मर पर तीन-तीन बच्चे... इलाज की भीड़ में 3 साल की तौसीफा ने तोड़ा दम, नूंह की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े सवाल
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- करोड़ों की इमारत, लेकिन मासूमों की सांसें उधार! नूंह मेडिकल कॉलेज में एक वार्मर पर तीन-तीन बच्चे, 3 साल की तौसीफा की मौत ने खोली व्यवस्था की पोल

फोटो - वार्मर मशीन में एक साथ तीन बच्चों का हो रहा इलाज।

रिजवान खान
नूंह। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया मेडिकल कॉलेज… करीब 18 लाख की आबादी के लिए बेहतर इलाज की बड़ी उम्मीद… लेकिन अस्पताल के भीतर बच्चों के इलाज की तस्वीर इस उम्मीद को झकझोरने वाली है। जिस अस्पताल में गरीब परिवार अपने बच्चों की जिंदगी बचाने की आस लेकर पहुंचते हैं, वहां संसाधनों की कमी के चलते एक वार्मर मशीन पर तीन-तीन बच्चों को रखने की स्थिति सामने आई है। बच्चों के बेड भी मरीजों की भीड़ के आगे कम पड़ते दिखाई दिए। बुधवार को मेडिकल कॉलेज में की गई पड़ताल में बच्चों की इमरजेंसी की व्यवस्था ने स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इमरजेंसी पीडियाट्रिक रूम में महज तीन वार्मर मशीन उपलब्ध हैं, जबकि रोजाना 30 से अधिक बीमार बच्चे यहां पहुंचते हैं। ऐसे में जरूरत पड़ने पर एक ही वार्मर पर तीन-तीन बच्चों को शिफ्ट करना पड़ रहा है। इसी अव्यवस्था के बीच उदाका गांव की तीन साल की मासूम तौसीफा की मौत ने पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है।

- बेटी को बचाने अस्पताल आया था पिता, गोद में मिली लाश

उदाका गांव निवासी आरिफ पुत्र रुजदार का आरोप है कि डॉक्टरों की लापरवाही और सिस्टम की अव्यवस्था के कारण उसकी बेटी तौसीफा की जान चली गई। आरिफ के मुताबिक सोमवार को बेटी को हल्का बुखार हुआ था। वह उसे इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचा, जहां दवाई देकर घर भेज दिया गया।
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बुधवार को तबीयत में सुधार नहीं होने पर आरिफ फिर बेटी को लेकर अस्पताल पहुंचा। आरोप है कि पहले कार्ड की एंट्री में समय लगा। इसके बाद बच्ची को इमरजेंसी में ले जाने के बावजूद करीब आधे घंटे तक डॉक्टरों ने उसे नहीं देखा। बच्ची की हालत लगातार बिगड़ती रही। जब उसकी सांसें उखड़ने लगीं तो डॉक्टरों ने इलाज शुरू करने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
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एक पिता अपनी बेटी को बचाने के लिए अस्पताल पहुंचा था, लेकिन कुछ ही देर बाद उसकी आंखों के सामने उसकी तीन साल की मासूम बेटी की जिंदगी बुझ गई।

- नवजात को भी नहीं मिला खाली वार्मर
गोधोला गांव से अपनी नवजात पोती को लेकर पहुंची छोटी ने भी अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठाए। उसके मुताबिक मंगलवार को उसकी पुत्रवधू ने बेटी को जन्म दिया था। नवजात को सांस लेने में परेशानी होने पर उसे तुरंत मेडिकल कॉलेज लाया गया, लेकिन वहां वार्मर खाली नहीं था।

परिजनों ने डॉक्टरों से काफी मिन्नतें कीं। इसके बाद नवजात को पहले से भर्ती एक बच्चे के साथ उसी वार्मर पर शिफ्ट कर दिया गया। छोटी का कहना है कि निजी अस्पताल में इलाज कराने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। ऐसे में सरकारी अस्पताल ही गरीब परिवारों का सहारा है, लेकिन यहां भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलना बेहद चिंता की बात है।

- इमरजेंसी में 9 बेड, तीन वार्मर और दो वेंटीलेटर
मेडिकल कॉलेज की बच्चों की इमरजेंसी में 9 बेड हैं। यहां तीन वार्मर और दो वेंटीलेटर बताए गए हैं। प्रतिदिन 30 से अधिक बीमार बच्चों के पहुंचने के कारण संसाधनों पर लगातार दबाव रहता है।

पहली मंजिल के आईसीयू में 11 बेड और तीन वार्मर हैं, जबकि एनआईसीयू में पांच वार्मर उपलब्ध हैं। दूसरी मंजिल पर जनरल वार्ड के दो कमरों में 60 बेड लगाए गए हैं।

मेडिकल कॉलेज निदेशक मुकेश कुमार के अनुसार इमरजेंसी, एनआईसीयू और जनरल वार्ड को मिलाकर 12 वार्मर मशीन चालू हालत में हैं, जबकि कुछ मशीनें खराब हैं। अतिरिक्त मशीनों के लिए मांग भेजी गई है और जल्द उपलब्ध होने की उम्मीद है।

- जिले के 431 गांवों की उम्मीद, सुविधाओं का इंतजार

नूंह जिले में 431 गांव हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए 5 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 17 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 111 सब सेंटर हैं। ऐसे में मेडिकल कॉलेज जिले के लाखों लोगों के लिए सबसे बड़ा चिकित्सा सहारा है।


तौसीफा की मौत ने व्यवस्था के सामने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—अगर करोड़ों रुपये की लागत से बने अस्पताल में बच्चों की जिंदगी बचाने के लिए जरूरी संसाधन ही पर्याप्त नहीं होंगे, तो गरीब परिवार अपनी उम्मीद लेकर आखिर कहां जाएं?
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