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विनाश का अतीत: व्यवस्थित तरीके से तोड़ी गई अरावली पर्वत शृंखला की कमर, पर्यावरणविदों ने चेताया; संरक्षण जरूरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली/ अलवर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 08 Jan 2026 03:42 AM IST
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सार
अधिकृत सरकारी दस्तावेजों, सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दर्ज तथ्यों के अनुसार, 1995 से 2010 के बीच अरावली की पारिस्थितिक रीढ़ को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया।
अजमेर में अरावली पहाड़ियों का ड्रोन से लिया गया नजारा
- फोटो : ANI Photos
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विस्तार
अरावली पर्वत शृंखला का सबसे विनाशकारी दौर कोई प्राचीन इतिहास नहीं, बल्कि हाल का अतीत है। अधिकृत सरकारी दस्तावेजों, सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दर्ज तथ्यों के अनुसार, 1995 से 2010 के बीच अरावली की पारिस्थितिक रीढ़ को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया।
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यह वह समय था जब हरियाणा और राजस्थान में अवैध खनन अपने चरम पर पहुंचा, पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी हुई और प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी का फायदा उठाकर एक विशाल समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी), सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी), सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और संरक्षण संगठन वी आर अरावली के आकलन बताते हैं कि इसी दौर ने अरावली को उस संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया, जिसके प्रभाव आज उत्तर भारत की हवा, पानी और जलवायु में साफ दिख रहे हैं।
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अधिकृत सरकारी और न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार अरावली पर्वत श्रृंखला में अवैध खनन की सबसे तीव्र और व्यापक गतिविधियां 1990 के दशक के मध्य से 2000 के दशक के अंत तक दर्ज की गईं। विशेष रूप से 1995 से 2010 के बीच हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम, नूंह (पूर्व में मेवात) और राजस्थान के अलवर, भरतपुर तथा उदयपुर जिलों में पत्थर, बजरी और सिलिका का अवैध खनन चरम पर रहा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी और एनजीटी में दाखिल हलफनामों में इस अवधि को अरावली के लिए सबसे विनाशकारी चरण करार दिया गया है। सीईसी और सीएसई के आकलनों के अनुसार इस दौर में अरावली क्षेत्र से करोड़ों टन खनिज सामग्री निकाली गई। जांच रिपोर्टों में यह स्पष्ट किया गया है कि हरियाणा-राजस्थान बेल्ट में हर साल केवल कुछ हजार टन नहीं, बल्कि कई लाख से करोड़ टन पत्थर और बजरी अवैध रूप से निकाली जाती रही। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि खनन पर प्रतिबंध के बावजूद हजारों ट्रक प्रतिदिन सामग्री ढोई जाती थी, जिससे वास्तविक मात्रा का सटीक आकलन लगभग असंभव हो गया।
खनन अर्थव्यवस्था और माफिया नेटवर्क
सीईसी, सीएसई और विभिन्न राज्य स्तरीय जांचों में यह भी सामने आया है कि अरावली में अवैध खनन केवल पर्यावरणीय अपराध ही नहीं था, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था का आधार बन गया। इस अर्थव्यवस्था में खनन माफिया, परिवहन नेटवर्क, स्थानीय स्तर पर रियल एस्टेट गतिविधियां और प्रशासनिक चूक की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। कई मामलों में यह आरोप लगे कि अवैध खनन से निकली सामग्री का उपयोग तेजी से फैलते शहरी और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में किया गया, जिससे एक दुष्चक्र बना जहां शहरों का अनियोजित विस्तार अरावली के क्षरण की कीमत पर होता गया।
पर्यावरणविद् बोले- अरावली का संरक्षण नहीं हुआ तो तबाही
अरावली उत्तर भारत की जल और जलवायु सुरक्षा की अदृश्य दीवार है। इसका क्षरण केवल पहाड़ियों के कटने का नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर भारत की हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम को अस्थिर कर रहा है। इसके कमजोर होने से भूजल रिचार्ज की प्राकृतिक प्रक्रिया टूट गई है जिसका असर हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर में जल संकट के रूप में दिख रहा है।
-डॉ. अनिल जोशी, पर्यावरणविद्
अरावली को केवल खाली जमीन या डेवलपमेंट फ्रंटियर के रूप में देखा गया, जबकि वह उत्तर भारत की पारिस्थितिक ढाल है। खनन और निर्माण गतिविधियों ने अरावली की जलधारण क्षमता को नष्ट किया, जिससे एक ओर शहरी बाढ़ और दूसरी ओर भूजल संकट पैदा हुआ। अरावली को कमजोर करना वास्तव में शहरों की जल और वायु सुरक्षा को कमजोर करना है।
-डॉ. सुनीता नारायण, पर्यावरणविद्
अभी भी बचाई जा सकती है अरावली
वी आर अरावली की रिपोर्ट, राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में किए गए सफल पुनर्नवीनीकरण प्रयास व अंतरराष्ट्रीय उदाहरण जैसे चीन की ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना दिखाते हैं कि वैज्ञानिक योजना व दीर्घकालिक इच्छाशक्ति से क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक तंत्र को आंशिक रूप से पुनर्जीवित किया जा सकता है।
भू-संरचना व जल तंत्र की अपूरणीय क्षति
पर्यावरण मंत्रालय और जीएसआई से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर हुए अवैध खनन ने अरावली की पहाड़ियों की मूल भू-संरचना को अपूरणीय क्षति पहुंचाई। पहाड़ों के कटने से न केवल वन आवरण नष्ट हुआ, बल्कि प्राकृतिक जलग्रहण और जलधारण प्रणाली भी ध्वस्त हो गई। इसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ा, जो हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के कई हिस्सों में लगातार नीचे जाता गया। विशेषज्ञों के अनुसार 1990-2000 के दशक में निकाले गए खनिज की कुल मात्रा हजारों टन नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से करोड़ों टन के स्तर की थी। यही कारण है कि आज अरावली के कई हिस्सों को आंशिक रूप से मृत पारिस्थितिक क्षेत्र के रूप में देखा जाने लगा है।