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Delhi NCR News: पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड से शिशु को देखने की होड़, मानसिक सेहत पर मंडराया संकट
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- सिर्फ तस्वीर देखना आश्वासन नहीं देता, मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। भागदौड़ भरी जिंदगी में स्वास्थ्य सेवाओं को घर तक पहुंचाने की कोशिशें तेज हैं। इन्हीं में एक नया ट्रेंड है मोबाइल से जुड़ने वाले पोर्टेबल होम अल्ट्रासाउंड। गर्भवती महिलाएं या उनके परिजन छोटे हैंडहेल्ड डिवाइस को पेट पर रखकर मोबाइल स्क्रीन पर शिशु की छवि देखने की कोशिश करते हैं। सवाल यह है कि यह सुविधा कितनी सुरक्षित है और इसका मन पर क्या असर पड़ता है।
पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड एक छोटा उपकरण है जो मोबाइल ऐप से कनेक्ट होकर तस्वीरें दिखाता है। इसे क्लिनिक के बजाय घर पर इस्तेमाल करने का प्रचार किया जा रहा है। दावा है कि इससे समय और अस्पताल के चक्कर बचते हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तकनीक प्रशिक्षित डॉक्टर के मार्गदर्शन के बिना भ्रम पैदा कर सकती है।
सिर्फ तस्वीर देखना आश्वासन नहीं देता
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों का कहना है कि अल्ट्रासाउंड केवल तस्वीर नहीं, बल्कि चिकित्सा व्याख्या की प्रक्रिया है। डॉक्टरों के अनुसार स्क्रीन पर कुछ देखकर सामान्य व्यक्ति सही-गलत का आकलन नहीं कर सकता। छोटी-सी शंका भी गर्भवती महिला में चिंता बढ़ा सकती है। कई बार बार-बार स्कैन करने की आदत बन जाती है, जिससे अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं पहले से भावनात्मक रूप से संवेदनशील होती हैं। बार-बार जांच करने की प्रवृत्ति ‘कम्पल्सिव बिहेवियर’ में बदल सकती है। किसी अस्पष्ट छवि को देखकर घबराहट, अनिद्रा और अवसाद जैसे लक्षण उभर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने का दबाव भी मानसिक तनाव बढ़ाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक मातृ मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दिए बिना तकनीक का उपयोग नुकसानदेह हो सकता है। डॉक्टर बताते हैं कि बिना चिकित्सकीय जरूरत के बार-बार अल्ट्रासाउंड की सलाह नहीं दी जाती।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। भागदौड़ भरी जिंदगी में स्वास्थ्य सेवाओं को घर तक पहुंचाने की कोशिशें तेज हैं। इन्हीं में एक नया ट्रेंड है मोबाइल से जुड़ने वाले पोर्टेबल होम अल्ट्रासाउंड। गर्भवती महिलाएं या उनके परिजन छोटे हैंडहेल्ड डिवाइस को पेट पर रखकर मोबाइल स्क्रीन पर शिशु की छवि देखने की कोशिश करते हैं। सवाल यह है कि यह सुविधा कितनी सुरक्षित है और इसका मन पर क्या असर पड़ता है।
पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड एक छोटा उपकरण है जो मोबाइल ऐप से कनेक्ट होकर तस्वीरें दिखाता है। इसे क्लिनिक के बजाय घर पर इस्तेमाल करने का प्रचार किया जा रहा है। दावा है कि इससे समय और अस्पताल के चक्कर बचते हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तकनीक प्रशिक्षित डॉक्टर के मार्गदर्शन के बिना भ्रम पैदा कर सकती है।
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सिर्फ तस्वीर देखना आश्वासन नहीं देता
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों का कहना है कि अल्ट्रासाउंड केवल तस्वीर नहीं, बल्कि चिकित्सा व्याख्या की प्रक्रिया है। डॉक्टरों के अनुसार स्क्रीन पर कुछ देखकर सामान्य व्यक्ति सही-गलत का आकलन नहीं कर सकता। छोटी-सी शंका भी गर्भवती महिला में चिंता बढ़ा सकती है। कई बार बार-बार स्कैन करने की आदत बन जाती है, जिससे अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं पहले से भावनात्मक रूप से संवेदनशील होती हैं। बार-बार जांच करने की प्रवृत्ति ‘कम्पल्सिव बिहेवियर’ में बदल सकती है। किसी अस्पष्ट छवि को देखकर घबराहट, अनिद्रा और अवसाद जैसे लक्षण उभर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने का दबाव भी मानसिक तनाव बढ़ाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक मातृ मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दिए बिना तकनीक का उपयोग नुकसानदेह हो सकता है। डॉक्टर बताते हैं कि बिना चिकित्सकीय जरूरत के बार-बार अल्ट्रासाउंड की सलाह नहीं दी जाती।