लपटों से पहले बेनकाब होता सिस्टम: अग्निशमन सेवा कर्मचारियों, फायर स्टेशनों और उपकरणों की कमी से जूझ रही दिल्ली
राजधानी में आग घटनाओं से ज्यादा सिस्टम की वह खतरनाक सुस्ती है जो हादसे दर हादसे के बाद भी नहीं टूटती। सैकड़ों मौतों, दर्जनों बड़ी घटनाओं और लगातार मिलती चेतावनियों के बावजूद आज भी अधूरे फायर नेटवर्क, खाली पदों और घनी बस्तियों में फायर ब्रिगेड की दम तोड़ती त्वरित प्रतिक्रिया के साथ जी रही है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राजधानी में आग घटनाओं से ज्यादा सिस्टम की वह खतरनाक सुस्ती है जो हादसे दर हादसे के बाद भी नहीं टूटती। सैकड़ों मौतों, दर्जनों बड़ी घटनाओं और लगातार मिलती चेतावनियों के बावजूद आज भी अधूरे फायर नेटवर्क, खाली पदों और घनी बस्तियों में फायर ब्रिगेड की दम तोड़ती त्वरित प्रतिक्रिया के साथ जी रही है। दुनिया आग तक पहुंचने का समय घटा रही है, दिल्ली अब भी हादसों के बाद कारण खोज रही है। इसमें गलती दमकल विभाग की कम उस सिस्टम की ज्यादा है जिसने राजधानी की बढ़ती आबादी के साथ विभाग की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया।
मालवीय नगर अग्निकांड में 22 लोगों की मौत के बाद फिर दिल्ली की अग्निशमन व्यवस्था पर सवाल उठे हैं लेकिन शायद ही इसकी वजह जानने और उस कमी को दूर करने का प्रयास किया गया है। 1969 में जिस दिल्ली में करीब 34 लाख लोग रहते थे, आज उसकी आबादी 2.27 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। 7 गुना जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अग्निशमन ढांचे का विस्तार उसी अनुपात में नहीं हो सका है। नतीजा यह है कि जिस व्यवस्था को 5 से 7 मिनट के भीतर मौके पर पहुंचना चाहिए, उसे कई बार 15 से 20 मिनट तक लग जाते हैं।
पिछले वर्ष 18,670 आग की घटनाओं में 76 लोगों की मौत हुई जबकि इस वर्ष मई तक 3,410 आग संबंधी कॉल दर्ज हो चुकी थीं और 44 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इसके बावजूद दमकल विभाग में रिक्त पदों को भरने की कवायद दूर-दूर तक नजर नहीं आती है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार 900 से ज्यादा पदक रिक्त हैं। वर्ष 2011 के बाद स्टेशन अफसर पद पर सीधी भर्ती तक नहीं हुई है। स्थिति मानव संसाधन तक सीमित नहीं है। दिल्ली जैसे महानगर को करीब 120 फायर स्टेशनों की जरूरत हैं लेकिन वर्तमान में केवल 71 दमकल केंद्र संचालित हैं। इसका सीधा असर रिस्पॉन्स टाइम पर पड़ता है। घनी आबादी वाले इलाकों, अनधिकृत कॉलोनियों और संकरी गलियों में दमकल वाहनों की पहुंच पहले से ही चुनौतीपूर्ण होती है। ऐसे में सीमित संख्या में उपलब्ध फायर स्टेशनों के कारण राहत कार्य में और देरी होती है। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ फायर फाइटर्स (आईएएफएफ) के अनुसार शहरी क्षेत्रों में पहले फायर इंजन का मौके पर 4 मिनट और पूरी प्रथम प्रतिक्रिया टीम का 8 मिनट के भीतर पहुंचना आदर्श मानक है।
56 साल पुराना वायरलेस नेटवर्क
विभागीय सूत्रों के अनुसार दिल्ली फायर सर्विस आज भी उसी वायरलेस नेटवर्क ढांचे पर निर्भर है जिसकी शुरुआत 1969 में हुई थी। दिल्ली की जरूरत बढ़ती गईं लेकिन उस अनुपात में संचार प्रणाली में व्यापक बदलाव नहीं हुआ। इसके कारण कंट्रोल रूम, फायर स्टेशनों और घटनास्थल पर मौजूद दमकल कर्मियों के बीच समन्वय प्रभावित होता है। हालांकि दमकल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि विभाग अब तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। जल्द शुरू होने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म के तहत नागरिक मोबाइल एप के जरिये दमकल वाहनों की लाइव लोकेशन देख सकेंगे। सभी फायर टेंडरों में जीपीएस ट्रैकर और एडवांस कैमरे लगाए जाएंगे
दो और मरीज को मिली छुट्टी, 12 विदेशी समेत 13 का उपचार जारी
मालवीय नगर अग्निकांड हादसे के घायलों का साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में उपचार जारी है। इसमें दो मरीजों को चिकित्सीय सुधार के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अभी उपचार के लिए 13 मरीज भर्ती है। इसमें 12 विदेशी नागरिक शामिल है। अस्पताल के अनुसार उपचार के लिए आठ मरीज आईसीयू में और चार मरीज वार्ड में भर्ती है। एक मरीज को उपचार के लिए वेंटिलेटर पर रखा गया है। भर्ती मरीज की हालत स्थिर हैं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में और मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार दर्ज होगा। बता दें कि घटना वाले दिन बुधवार को अस्पताल में 39 लोगों को लाया गया था। इसमें 18 मृत अवस्था में लाए गए थे। अब तक इस हादसे में 22 लोगों की मौत हो चुकी है।