Startups: रॉकेट और सैटेलाइट के दम पर आगे बढ़ रहे युवा, स्टार्टअप इंडिया और IIT-IIST बना रहे नए स्पेस उद्यमी
Space Startups: भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है और इसके साथ ही स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर भी बढ़ रहे हैं। स्टार्टअप इंडिया, IIT और IIST के इनक्यूबेशन सेंटर युवा उद्यमियों को तकनीकी सहायता, मार्गदर्शन और उद्योग से जुड़ने का मंच प्रदान कर रहे हैं, जिससे वे अंतरिक्ष क्षेत्र में अपने नवाचारों को आगे बढ़ा सकें।
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Startups: भारत में लंबे समय तक अंतरिक्ष क्षेत्र का मतलब केवल इसरो माना जाता था, लेकिन अब निजी कंपनियों के प्रवेश से युवाओं के सामने नौकरी के साथ-साथ अपना उद्यम शुरू करने के नए रास्ते भी खुले हैं। स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल, पिक्सेल, दिगंतारा और गैलेक्सआई जैसे भारतीय स्टार्टअप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। आज कई क्षेत्रों में अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में तकनीकी विशेषज्ञों के साथ नए विचार रखने वाले उद्यमियों की भी मांग बढ़ रही है।
हर स्टार्टअप रॉकेट नहीं बनाता
कई छात्र यह सोचते हैं कि स्पेस स्टार्टअप शुरू करने के लिए रॉकेट बनाना जरूरी होगा, जबकि ऐसा नहीं है। आज कई कंपनियां सैटेलाइट से मिलने वाले डाटा का विश्लेषण कर किसानों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों के लिए समाधान तैयार कर रही हैं। कुछ कंपनियां छोटे सैटेलाइट विकसित कर रही हैं, तो कुछ अंतरिक्ष से जुड़े सॉफ्टवेयर, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बना रही हैं। और अब सौर ऊर्जा से चलने वाले हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (एचएपीएस) जैसे मानव रहित विमान भी इस क्षेत्र का हिस्सा बन रहे हैं। यदि किसी छात्र की रुचि कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, डाटा साइंस, रोबोटिक्स या एआई में है, तो उसके लिए भी इस क्षेत्र में अच्छी संभावनाएं हैं।
कैसे करें सही तैयारी
इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले गणित और विज्ञान की मजबूत समझ जरूरी है। 12वीं के बाद मैकेनिकल, एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या फिजिक्स जैसे विषयों में पढ़ाई की जा सकती है। कॉलेज के दौरान केवल परीक्षा पास करने तक खुद को सीमित न रखें। प्रोजेक्ट तैयार करें, तकनीकी प्रतियोगिताओं में भाग लें और इंटर्नशिप के अवसर तलाशें। पढ़ाई के दौरान मिला यही अनुभव आगे चलकर नौकरी और स्टार्टअप, दोनों में काम आता है।
इन स्किल्स पर दें ध्यान
डिग्री के साथ कुछ व्यावहारिक कौशल भी जरूरी हैं, जैसे-पाइथन और सी प्रोग्रामिंग, एम्बेडेड सिस्टम, रोबोटिक्स, ड्रोन तकनीक, मशीन लर्निंग, सैटेलाइट डाटा विश्लेषण और 3डी प्रिंटिंग। इन कौशल से छात्र अपनी तकनीकी क्षमता मजबूत कर सकते हैं और नए समाधान विकसित करना सीखते हैं।
सीखने के कई अवसर
पढ़ाई के साथ अतिरिक्त प्रशिक्षण भी युवाओं को आगे बढ़ने में मदद करता है। इसरो, आईआईआरएस और आईआईएसटी के अलावा कई आईआईटी, एनआईटी और विश्वविद्यालय समय-समय पर स्पेस टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट डिजाइन, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग और एयरोस्पेस से जुड़े अल्पकालिक सर्टिफिकेट प्रोग्राम, हैकाथॉन और तकनीकी कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। ऐसे कार्यक्रम छात्रों को नई तकनीक सीखने के साथ उद्योग के विशेषज्ञों से जुड़ने का अवसर भी देते हैं।
स्टार्टअप शुरू करने में भी मिल रही मदद
यदि आज किसी युवा के पास अच्छा विचार है, तो उसे अकेले आगे बढ़ने की जरूरत नहीं है। इन-स्पेस, स्टार्टअप इंडिया, अटल इनोवेशन मिशन, विभिन्न आईआईटी और आईआईएसटी के इनक्यूबेशन सेंटर, टी-हब जैसे संस्थान नए उद्यमियों को मार्गदर्शन, तकनीकी सहायता और उद्योग से जुड़ने का अवसर दे रहे हैं। कई सफल स्पेस स्टार्टअप की शुरुआत भी कॉलेज प्रोजेक्ट या छोटी टीम से हुई थी।