SC: पश्चिम एशियाई देशों के प्रभावित छात्रों की याचिकाओं पर सुनवाई पूरी, क्या दोबारा होगी इनकी परीक्षा?
CBSE Gulf Students Case: पश्चिम एशियाई देशों के सीबीएसई छात्रों की विशेष मूल्यांकन योजना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर मामला निपटा दिया। कोर्ट ने छात्रों को कंपार्टमेंट परीक्षा के साथ परीक्षा देने की मांग नहीं मानी, लेकिन जल्द नई परीक्षा कराने की सीबीएसई की बात दर्ज की।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
CBSE Gulf Students Case: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम एशियाई देशों में रहने वाले कक्षा 12 के उन छात्रों की याचिकाओं का निपटारा कर दिया है, जिन्होंने सीबीएसई की विशेष मूल्यांकन योजना को चुनौती दी थी। यह योजना पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात के बीच बोर्ड परीक्षाएं रद्द होने के बाद लागू की गई थी।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने प्रभावित छात्रों को कंपार्टमेंट परीक्षा देने वाले छात्रों के साथ परीक्षा में बैठने की मांग स्वीकार नहीं की। हालांकि, कोर्ट ने सीबीएसई की उस बात को रिकॉर्ड पर लिया है, जिसमें बोर्ड ने कहा कि प्रभावित छात्रों को जल्द से जल्द नई परीक्षा में शामिल करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।
किन देशों के छात्रों ने याचिका दायर की थी?
ये याचिकाएं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, ओमान और बहरीन के सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों ने दायर की थीं।
इन छात्रों ने 2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए सीबीएसई की मूल्यांकन पद्धति पर सवाल उठाया था। पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण कई विषयों की बोर्ड परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी थीं।
सीबीएसई ने कैसे किया था छात्रों का मूल्यांकन?
सीबीएसई ने 27 मार्च 2026 को विशेष मूल्यांकन योजना जारी की थी। इसके तहत जिन विषयों की बोर्ड परीक्षा रद्द हुई थी, उनके अंक स्कूल स्तर पर हुई परीक्षाओं के आधार पर देने का प्रावधान किया गया था। इसमें मुख्य रूप से शामिल थीं:
- त्रैमासिक परीक्षाएं
- अर्धवार्षिक परीक्षाएं
- प्री-बोर्ड परीक्षाएं
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस तरीके से कई छात्रों को नियमित बोर्ड परीक्षा देने की तुलना में काफी कम अंक मिले।
छात्रों की आगे की पढ़ाई पर क्या पड़ा असर?
याचिका में कहा गया था कि विशेष मूल्यांकन से छात्रों की उच्च शिक्षा में प्रवेश की संभावनाएं प्रभावित हुईं। खास तौर पर डायरेक्ट एडमिशन ऑफ स्टूडेंट्स अब्रॉड (DASA) और चिल्ड्रन ऑफ इंडियन वर्कर्स इन गल्फ कंट्रीज (CIWG) जैसी योजनाओं के तहत प्रवेश लेने वाले छात्र प्रभावित हुए। इन योजनाओं में पात्रता के लिए कम से कम 75 प्रतिशत अंक की शर्त है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि कुछ ऐसे छात्र, जिन्होंने जेईई मेन में योग्यता हासिल की थी, विशेष मूल्यांकन में मिले अंकों के कारण प्रवेश के लिए पात्र नहीं रह गए। कुछ छात्रों को फेल या कंपार्टमेंट श्रेणी में भी रखा गया, जबकि उनके पिछले शैक्षणिक प्रदर्शन का रिकॉर्ड लगातार अच्छा रहा था।
सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सीबीएसई ने कहा कि पूरे मामले में उसका मुख्य उद्देश्य प्रभावित छात्रों का हित और उनका शैक्षणिक भविष्य रहा है। बोर्ड ने 27 मार्च की मूल्यांकन योजना को युद्ध जैसी परिस्थितियों में परीक्षा आयोजित नहीं हो पाने के कारण छात्रों को बिना परिणाम के न छोड़ने की कोशिश बताया।
सीबीएसई ने यह भी बताया कि विशेष मूल्यांकन से संतुष्ट नहीं होने वाले छात्रों के लिए आगे एक और परीक्षा का प्रावधान उसकी नीति में है। यह परीक्षा प्रभावित देशों में परिस्थितियां अनुकूल होने और इसे आयोजित करना व्यावहारिक रूप से संभव होने के बाद कराई जा सकती है।
23,052 छात्रों के लिए क्या व्यवस्था होगी?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सीबीएसई प्रवेश के लिए अस्थायी या मूल्यांकन किए गए परिणामों के आधार पर सुविधाएं देने, दोबारा मूल्यांकन और सत्यापन की प्रक्रिया को तेज करने और संभव होने पर विशेष परीक्षा आयोजित करने के लिए तैयार है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन उपायों को केवल याचिका दायर करने वाले छात्रों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। करीब 23,052 समान स्थिति वाले छात्रों को ध्यान में रखना होगा।
छात्रों की कंपार्टमेंट परीक्षा के साथ परीक्षा कराने की मांग क्यों नहीं मानी गई?
याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि प्रभावित छात्रों को कंपार्टमेंट परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों के साथ परीक्षा देने की अनुमति दी जाए। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल की इस दलील को स्वीकार किया कि सभी प्रभावित छात्रों के लिए उस परीक्षा में यह सुविधा देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा।
हालांकि, कोर्ट ने 28 जुलाई की पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल की ओर से रखे गए उस सुझाव को भी रिकॉर्ड में लिया, जिसमें अगली परीक्षा आयोजित करने में लगने वाले समय को 82 दिन से घटाकर 70 दिन करने की संभावना बताई गई थी। कोर्ट ने यह तय करने का फैसला संबंधित पक्षों पर छोड़ा कि ऐसा करना व्यावहारिक रूप से संभव है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
पीठ ने 30 जुलाई को पारित आदेश में याचिकाओं का निपटारा किया। यह आदेश 12 अगस्त को अपलोड किया गया। कोर्ट का उद्देश्य यह रहा कि याचिकाकर्ता जल्द से जल्द अगली परीक्षा में शामिल होकर प्रतिस्पर्धा कर सकें और अगले वर्ष उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए भी प्रयास कर सकें।
कमेंट
कमेंट X