सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Education ›   Success Stories ›   Jane Goodall school Drop out at 18 her hard work on chimpanzee and primatologist-anthropologist

Jane Goodall: 18 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ी... अपनी मेहनत से लेडी चिंपांजी प्राइमेटोलॉजिस्ट-मानवविज्ञानी बनीं

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 04 Oct 2025 09:00 AM IST
विज्ञापन
सार

डेम वैलेरी जेन मॉरिस गूडाल  किसी परिचय की मोहताज नहीं। प्रख्यात प्राइमेटोलॉजिस्ट और मानवविज्ञानी के निधन से अपूरणीय क्षति हुई है। चिंपांजियों पर खोज करने व पर्यावरण संरक्षण में पूरा जीवन खपाने वाली गूडाल का जिक्र कई फिल्मों में हो चुका है। उन्होंने एक लेखिका के रूप में भी कई लोगों के बीच ज्ञान की अलख जगाने का काम किया है। 91 वर्षीय इस अफ्रीकी विदूषी उर्फ लेडी चिंपांजी को जानिए अमर उजाला की खास रिपोर्ट में

Jane Goodall school Drop out at 18 her hard work on chimpanzee and primatologist-anthropologist
इस अफ्रीकी महिला गूडाल निधन के बावजूद रहेंगी प्रासंगिक - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी / ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
Follow Us

पिता ने जब उनके पहले जन्मदिन में टेडी चिंपांजी दिया, तो किसी को एहसास नहीं था कि वह पूरी जिंदगी चिंपांजियों के नाम लिख देंगी। 18 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी, लेकिन ने चिंपांजियों पर हो रहे वैश्विक अध्ययनों की दिशा बदल दी।

Trending Videos


करीब 90 साल पहले एक इंजीनियर पिता ने अपनी बेटी को उसके पहले जन्मदिन पर टेडी चिंपांजी दिया, जिसका नाम जुबली था। उस वक्त उनके पिता और अन्य लोगों को इस बात का कतई आभास नहीं रहा होगा कि यह चिंपांजी खिलौना उस बेटी के दिलो-दिमाग में ऐसे बैठ जाएगा कि वह अपना पूरा जीवन ही चिंपांजियों के लिए समर्पित कर देगी। उस बेटी का नाम था डेम वैलेरी जेन मॉरिस गूडाल, जिनका हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। प्रख्यात प्राइमेटोलॉजिस्ट और मानवविज्ञानी डॉ. जेन गूडाल, जिन्हें चिंपांजी लेडी के नाम से भी जानते हैं, ने अपने जीवन के सात दशक सक्रिय रूप से चिंपांजियों के संरक्षण और उन्हें समझने में व्यतीत किए। उन्होंने चिंपांजियों पर तंजानिया के गोम्बे रिजर्व में विशेष तौर पर शोध किया। उनके समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह साल के 300 दिन पर्यावरण संरक्षण की खातिर यात्राओं में ही व्यतीत करती थीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


कैसे हुई शुरुआत
डेम वैलेरी जेन मॉरिस गूडाल का जन्म तीन अप्रैल, 1934 को लंदन में हुआ था। उन्हें जेन गूडाल के नाम से ही ज्यादा जाना जाता था। उनके पिता मोर्टिमर हर्बर्ट मॉरिस गूडाल इंजीनियर और बिजनेसमैन थे, तो मां मार्गरेट मायफैनवे जोसेफ, लेखिका व उपन्यासकार थीं, जिन्होंने वेन मॉरिस गूडाल के नाम से अपना लेखन कार्य किया। पिता कार रेसिंग में भी शामिल रहे, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेन गूडाल के माता-पिता का तलाक हो गया। जेन अपनी मां के साथ रहीं। बचपन से ही जानवरों के प्रति लगाव होने की वजह से गूडाल ने 18 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी। इतना ही नहीं बचपन में पिता से मिला जुबली चिंपांजी टेडी उनके पास लंदन में धरोहर के रूप में रहा।

अफ्रीका, शादी और चिंपांजी
सेक्रेटेरियल स्कूल से एक कोर्स पूरा करने और लंदन में कई नौकरियां करने के बाद 1956 में गूडाल को उनके एक दोस्त का पत्र मिला, जिसके परिवार का केन्या के नैरोबी के पास एक फार्म था। उस दोस्त ने उन्हें अपने साथ रहने के लिए आमंत्रित किया। वह अपने 23वें जन्मदिन पर तत्काल एक मालवाहक जहाज से केन्या की राजधानी नैरोबी पहुंचीं और वहां कुछ पुरातत्वविद और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से मिलीं। इसके बाद वह 1960 में तंजानिया के गोम्बे स्ट्रीम गेम रिजर्व (जो अब एक राष्ट्रीय उद्यान है) पहुंचीं और वहीं पर अपना बसेरा बनाया, ताकि वह चिंपंाजियों के व्यवहार को समझ सकें। यहीं पर उनकी मुलाकात वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बैरन ह्यूगो वैन लॉविक से हुई, जिनसे उन्होंने 1964 में शादी कर ली और 1967 में उन्हें एक बेटा हुआ। एक दशक बाद 1974 में दोनों का तलाक हो गया। जेन गूडाल ने कुछ समय बाद तंजानिया के संसद सदस्य और राष्ट्रीय उद्यानों के निदेशक डेरेक ब्राइसन से विवाह किया। दुर्भाग्य से 1980 में ब्राइसन का कैंसर से निधन हो गया। इसके बाद वह पूरी तरह से चिंपांजियों पर काम करने लगीं। उनके परिवार में एक बेटा, उनकी बहन जूडी वाटर्स और तीन पोते-पोतियां हैं।

चिंपांजियों की भाषा सीखी
चिंपांजियों के व्यवहार को समझने के लिए जेन गूडाल ने उन्हीं की तरह तेज आवाज में बात करना ‘पैंट हूट’ सीख लिया था। भले ही उन्होंने कॉलेज में वन और वन्य जीवों के बारे में अध्ययन न किया हो, लेकिन वह चिंपांजियों और प्रकृति के इतने करीब हो गई थीं कि उन्हें प्राइमेटोलॉजिस्ट और मानवविज्ञानी की उपाधि मिली। वर्ष 1965 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने उन्हें इथोलॉजी में पीएचडी की उपाधि प्रदान की। उन्होंने 1977 में जेन गूडाल संस्थान की स्थापना की, जो चिंपंाजियों के साथ ही पर्यावरण पर काम करता है। 1991 में उन्होंने ‘रूट्स एंड शूट्स’ कार्यक्रम शुरू किया, जो बच्चों और युवाओं के बीच 120 देशों में चल रहा है। गूडाल चिंपंाजियों को अप्राकृतिक रूप से बंधक बनाए जाने का विरोध करती थीं और उन्हें रेस्क्यू भी करवाती थीं।


लेखन और फिल्में
जेन गूडाल की कहानी चालीस से ज्यादा फिल्मों के विषय का हिस्सा रहीं हैं। उन्होंने 32 किताबें लिखीं, जिनमें से 15 बच्चों के लिए थीं। उनकी आखिरी प्रकाशित किताब, ‘द बुक ऑफ होप : ए सर्वाइवल गाइड फॉर ट्राइंग टाइम्स’ थी, जिसमें उन्होंने मानव जाति के भविष्य के बारे में अपनी आशावादिता के बारे में लिखा। ‘माई फ्रेंड्स, द वाइल्ड चिंपांजीज’, ‘इन द शैडो ऑफ मैन’ और ‘थ्रू अ विंडो’ उनकी सबसे चर्चित किताबें रही हैं। गूडाल ने अपने सहयोगी, विकासवादी जीवविज्ञानी मार्क बेकॉफ के साथ अपने निधन से पहले बच्चों के लिए ‘एवरी एलीफेंट हैज ए नेम’ लिखी थी, जिसके 2027 की शुरुआत में प्रकाशित होने की संभावना है।

भाषण और यात्रा
जेन गूडाल को यात्रा करना और भाषण देना अच्छा लगता था। वह अपने जीवन के अंतिम समय तक सक्रिय रहीं। उनके संबंध में ‘हेल्दी टू 100’ किताब के लेखक केन स्टर्न ने कहा था, ‘जो लोग लंबे समय तक काम करते हैं, वे आम तौर पर लंबे समय तक जीवित रहते हैं।’ वह कहती थीं, ‘मरना तो सबको है, लेकिन अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए इन्सान को कुछ सामाजिक कार्य जरूर करने चाहिए।’ उन्हें संयुक्त राष्ट्र ने 2002 में शांति दूत बनाया था, जो अपने आप में एक बड़ा पुरस्कार है। गूडाल को डीवीएफ लाइफ टाइम, अमेरिका का प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम और ब्रिटिश साम्राज्य की महिला जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 2022 में बार्बी ने जेन गूडाल नाम की गुड़िया जारी की।

पहली महिला शोधकर्ता या वैज्ञानिक होने का अवसर
चिंपांजी को बुद्धिमान जानवर बताने वाली जेन गूडाल कहती थीं, ‘अगर वे इन्सान होते, तो हम उन्हें दोस्त कहते।’ चिंपंाजियों के लगभग हर व्यवहार पर अध्ययन करने वाली गूडाल ऐसी पहली महिला वैज्ञानिक थीं, जिन्होंने बताया था कि चिंपांजी मादाएं चार से छह वर्ष में केवल एक बार ही बच्चे पैदा करती हैं और पहली बार मां बनने वाली मादा अपने बच्चों को नर चिंपांजियों से बचाकर रखती हैं।

ट्रंप की चिंपांजी से तुलना
2016 में डोनाल्ड ट्रंप जब पहली बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब जेन गूडाल ने उनकी तुलना नर चिंपांजी से की थी। 2022 में भी एक साक्षात्कार के दौरान वह अपनी बात पर अड़ी रहीं और कहा, ‘ट्रंप का स्वभाव पूरी तरह नर चिंपांजियों जैसा है, जो सिर्फ अपना एकाधिकार चाहते हैं।’ इस बयान ने अमेरिकी राजनीति में काफी हलचल मचाई थी।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all Education News in Hindi related to careers and job vacancy news, exam results, exams notifications in Hindi etc. Stay updated with us for all breaking news from Education and more Hindi News.

विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

Election
एप में पढ़ें

Followed