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रोशनी यहां है: 250 रुपये की फीस से 966 करोड़ का सफर, जानिए नारायण मजूमदार की मेहनत ने कैसे बदली उनकी तकदीर
अमर उजाला नेटवर्क।
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Mon, 12 Jan 2026 07:35 AM IST
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सार
खेतों की मिट्टी में पले नारायण मजूमदार ने सुबह साइकिल पर दूध बेचकर पढ़ाई की और डिग्री हासिल की। कई नौकरियां छोड़ने के बाद उन्होंने भरोसे के बल पर रेड काउ डेयरी की नींव रखी। आज उनकी कंपनी लगभग 966 करोड़ का कारोबार करते हुए लाखों किसानों और युवाओं की रोजी-रोटी का सहारा बनी है।
नारायण मजूमदार
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
यह कहानी एक ऐसे युवक की है, जो खेतों की मिट्टी में पलकर बड़ा हुआ। घर की हालत इतनी खस्ताहाल थी कि पढ़ाई विलासिता जैसी चीज लगती थी। सुबह-सुबह बाकी बच्चे नींद में खोए रहते, लेकिन वह साइकिल पर दूध के डिब्बे लेकर गांव-गांव घूमता। उससे हुई थोड़ी-सी कमाई उसकी पढ़ाई, किताबों, किराये, और रोजमर्रा की जरूरतों का सहारा बनती। दिन बीतते गए, हालात कई बार बद से बदतर हुए, लेकिन उस लड़के का हौसला डगमगाया नहीं। चुनौतियों से लड़ते हुए उसने डेयरी टेक्नोलॉजी में डिग्री हासिल की और एक डेयरी केमिस्ट के रूप में कॅरिअर की शुरुआत की।
तनख्वाह तय थी, सुविधा भी थी, मगर भीतर कहीं एक बेचैनी भी थी कि जिंदगी सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं हो सकती। इसी ऊहापोह की स्थिति में कुछ समय बाद उसने नौकरी छोड़ दी। उस लड़के ने अलग-अलग जगहों पर जाकर काम किया और डेयरी उद्योग को गहराई से समझा। कुछ वक्त बाद उसने अपने दम पर एक छोटा-सा चिलिंग प्लांट शुरू किया। पूंजी कम थी, लेकिन उसकी ईमानदारी, मेहनत और लगन देखकर धीरे-धीरे किसान उस पर भरोसा करने लगे। यही भरोसे की बुनियाद धीरे-धीरे रेड काउ डेयरी नाम से विशाल पहचान बन गई, जिसमें न सिर्फ हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, बल्कि यह लाखों किसानों की आमदनी का सशक्त आधार भी है। इस प्रेरक सफर का नाम है नारायण मजूमदार, जिन्होंने साबित किया कि अगर हौसला सच्चा हो, तो साधन अपने आप रास्ता बनाते हैं।
संघर्ष की पाठशाला
15 जुलाई, 1958 को नादिया जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे नारायण मजूमदार सीमित संसाधनों में पले-बढ़े। उनके पिता बिमलेंदु मजूमदार किसान थे और मां बसंती मजूमदार घर संभालती थीं। संसाधन सीमित थे। 1975 में उन्होंने एनडीआरआई, करनाल से बीएससी डेयरी टेक्नोलॉजी की पढ़ाई शुरू की। तब दस विषयों की कुल फीस 250 रुपये थी, जो उस समय उनके परिवार के लिए बड़ी रकम थी। पर हालात ने उन्हें हिम्मत हारने के बजाय जिम्मेदारी लेने की सीख दी। पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने सुबह पांच से सात बजे तक दूध बेचने का काम शुरू किया। रोज की मेहनत से मिलने वाले लगभग तीन रुपये उनकी शिक्षा की नींव बने। बाद में पश्चिम बंगाल सरकार से 100 रुपये की छात्रवृत्ति मिलने लगी और पिता भी हर महीने 100 रुपये भेजने लगे, लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं था। इसके लिए परिवार को अपनी एक एकड़ जमीन तक बेचनी पड़ी।
थकान ने दिखाई दिशा
डिग्री हासिल करने के बाद मजूमदार कोलकाता लौट आए और क्वालिटी आइसक्रीम में केमिस्ट की नौकरी शुरू की। उस दौर में 612 रुपये का मासिक वेतन सम्मानजनक माना जाता था, लेकिन उनकी दिनचर्या थकाने वाली थी। रोज सुबह बहुत जल्दी गांव से ट्रेन पकड़ना और रात देर से घर लौटना उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बन गई थी। लगातार थकान और एकरसता ने उन्हें यह एहसास करा दिया कि केवल सुरक्षित नौकरी ही उनके जीवन का उद्देश्य नहीं है। कुछ ही महीनों में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और नए अनुभवों की तलाश में आगे बढ़े। इसके बाद उन्होंने सिलीगुड़ी स्थित हिमालयन कोऑपरेटिव, फिर मदर डेयरी और बाद में डैनिश डेयरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया। हर जगह उन्हें सीखने के अच्छे अवसर मिले, लेकिन वे कहीं लंबे समय तक नहीं टिक पाए।
भरोसे से बना ब्रांड
1995 में उनको हावड़ा स्थित ठाकेर डेयरी प्रोडक्ट्स में कंसल्टेंट जनरल मैनेजर की अहम जिम्मेदारी मिली। काम के दौरान उन्होंने देखा कि दूध उत्पादक किसानों को बेहद कम दाम मिलते हैं, जबकि बिचौलियों के कारण वही दूध बाजार में कई गुना महंगा बिकता है। यह असमानता उन्हें भीतर तक झकझोर गई। किसानों की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने गांव-गांव जाकर उनसे सीधे संवाद शुरू किया और खुद दूध खरीदने लगे। उनकी मेहनत, ईमानदारी और जमीन से जुड़ी कार्यशैली से किसानों का भरोसा बना और कंपनी प्रबंधन भी प्रभावित हुआ। इसके परिणामस्वरूप उनके लिए एक चिलिंग प्लांट लगाया गया। आगे चलकर 1997 में उन्होंने अपना खुद का चिलिंग प्लांट शुरू किया और 2000 में ठाकेर डेयरी की पूरी चिलिंग यूनिट खरीद ली।
सपनों के मिली रफ्तार
इसी समय उन्होंने अपने सपनों को रफ्तार देने के लिए पहला मिल्क टैंकर भी खरीदा और अपनी प्रॉपराइटरशिप फर्म को आगे बढ़ाते हुए पार्टनरशिप कॉरपोरेशन में बदल दिया। फिर साल 2003 में उन्होंने एक और साहसिक निर्णय लिया और ठाकेर डेयरी से अलग होकर ‘रेड काउ डेयरी’ के नाम से अपनी खुद की कंपनी की नींव रखी। आज रेड काउ डेयरी लगभग 966 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार वाली एक मजबूत कंपनी के रूप में स्थापित हो चुकी है। इसके तीन अत्याधुनिक प्रोडक्शन प्लांट हैं, जहां एक हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि पश्चिम बंगाल के तीन लाख से अधिक किसान इस कंपनी से सीधे जुड़े हैं और इससे स्थायी लाभ उठा रहे हैं।
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तनख्वाह तय थी, सुविधा भी थी, मगर भीतर कहीं एक बेचैनी भी थी कि जिंदगी सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं हो सकती। इसी ऊहापोह की स्थिति में कुछ समय बाद उसने नौकरी छोड़ दी। उस लड़के ने अलग-अलग जगहों पर जाकर काम किया और डेयरी उद्योग को गहराई से समझा। कुछ वक्त बाद उसने अपने दम पर एक छोटा-सा चिलिंग प्लांट शुरू किया। पूंजी कम थी, लेकिन उसकी ईमानदारी, मेहनत और लगन देखकर धीरे-धीरे किसान उस पर भरोसा करने लगे। यही भरोसे की बुनियाद धीरे-धीरे रेड काउ डेयरी नाम से विशाल पहचान बन गई, जिसमें न सिर्फ हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, बल्कि यह लाखों किसानों की आमदनी का सशक्त आधार भी है। इस प्रेरक सफर का नाम है नारायण मजूमदार, जिन्होंने साबित किया कि अगर हौसला सच्चा हो, तो साधन अपने आप रास्ता बनाते हैं।
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संघर्ष की पाठशाला
15 जुलाई, 1958 को नादिया जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे नारायण मजूमदार सीमित संसाधनों में पले-बढ़े। उनके पिता बिमलेंदु मजूमदार किसान थे और मां बसंती मजूमदार घर संभालती थीं। संसाधन सीमित थे। 1975 में उन्होंने एनडीआरआई, करनाल से बीएससी डेयरी टेक्नोलॉजी की पढ़ाई शुरू की। तब दस विषयों की कुल फीस 250 रुपये थी, जो उस समय उनके परिवार के लिए बड़ी रकम थी। पर हालात ने उन्हें हिम्मत हारने के बजाय जिम्मेदारी लेने की सीख दी। पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने सुबह पांच से सात बजे तक दूध बेचने का काम शुरू किया। रोज की मेहनत से मिलने वाले लगभग तीन रुपये उनकी शिक्षा की नींव बने। बाद में पश्चिम बंगाल सरकार से 100 रुपये की छात्रवृत्ति मिलने लगी और पिता भी हर महीने 100 रुपये भेजने लगे, लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं था। इसके लिए परिवार को अपनी एक एकड़ जमीन तक बेचनी पड़ी।
थकान ने दिखाई दिशा
डिग्री हासिल करने के बाद मजूमदार कोलकाता लौट आए और क्वालिटी आइसक्रीम में केमिस्ट की नौकरी शुरू की। उस दौर में 612 रुपये का मासिक वेतन सम्मानजनक माना जाता था, लेकिन उनकी दिनचर्या थकाने वाली थी। रोज सुबह बहुत जल्दी गांव से ट्रेन पकड़ना और रात देर से घर लौटना उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बन गई थी। लगातार थकान और एकरसता ने उन्हें यह एहसास करा दिया कि केवल सुरक्षित नौकरी ही उनके जीवन का उद्देश्य नहीं है। कुछ ही महीनों में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और नए अनुभवों की तलाश में आगे बढ़े। इसके बाद उन्होंने सिलीगुड़ी स्थित हिमालयन कोऑपरेटिव, फिर मदर डेयरी और बाद में डैनिश डेयरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया। हर जगह उन्हें सीखने के अच्छे अवसर मिले, लेकिन वे कहीं लंबे समय तक नहीं टिक पाए।
भरोसे से बना ब्रांड
1995 में उनको हावड़ा स्थित ठाकेर डेयरी प्रोडक्ट्स में कंसल्टेंट जनरल मैनेजर की अहम जिम्मेदारी मिली। काम के दौरान उन्होंने देखा कि दूध उत्पादक किसानों को बेहद कम दाम मिलते हैं, जबकि बिचौलियों के कारण वही दूध बाजार में कई गुना महंगा बिकता है। यह असमानता उन्हें भीतर तक झकझोर गई। किसानों की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने गांव-गांव जाकर उनसे सीधे संवाद शुरू किया और खुद दूध खरीदने लगे। उनकी मेहनत, ईमानदारी और जमीन से जुड़ी कार्यशैली से किसानों का भरोसा बना और कंपनी प्रबंधन भी प्रभावित हुआ। इसके परिणामस्वरूप उनके लिए एक चिलिंग प्लांट लगाया गया। आगे चलकर 1997 में उन्होंने अपना खुद का चिलिंग प्लांट शुरू किया और 2000 में ठाकेर डेयरी की पूरी चिलिंग यूनिट खरीद ली।
सपनों के मिली रफ्तार
इसी समय उन्होंने अपने सपनों को रफ्तार देने के लिए पहला मिल्क टैंकर भी खरीदा और अपनी प्रॉपराइटरशिप फर्म को आगे बढ़ाते हुए पार्टनरशिप कॉरपोरेशन में बदल दिया। फिर साल 2003 में उन्होंने एक और साहसिक निर्णय लिया और ठाकेर डेयरी से अलग होकर ‘रेड काउ डेयरी’ के नाम से अपनी खुद की कंपनी की नींव रखी। आज रेड काउ डेयरी लगभग 966 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार वाली एक मजबूत कंपनी के रूप में स्थापित हो चुकी है। इसके तीन अत्याधुनिक प्रोडक्शन प्लांट हैं, जहां एक हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि पश्चिम बंगाल के तीन लाख से अधिक किसान इस कंपनी से सीधे जुड़े हैं और इससे स्थायी लाभ उठा रहे हैं।