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अरोकियास्वामी वेलुमणि: कभी पाई-पाई को थे मोहताज, आज हजारों करोड़ का टर्नओवर; भूमिहीन बेटे से अरबपति तक का सफर?
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Mon, 08 Dec 2025 05:38 AM IST
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सार
थायरोकेयर टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के संस्थापक अरोकियास्वामी वेलुमणि कभी एक जोड़ी जूते और कपड़ों तक के लिए मोहताज थे। स्कूल की फीस कपास के खेत में काम करके भरी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। मजबूरी, गरीबी और संघर्षों से उठकर आज वे 5000 करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति के मालिक हैं।
डॉ. अरोकियास्वामी वेलुमणि
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बात उस समय की है, जब एक शिक्षक अपने छात्र से बातचीत कर रहे थे। बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि छात्र बीएससी करना चाहता है, लेकिन केवल 100 रुपये की कमी के कारण उसे मजबूरन बीकॉम में प्रवेश लेना पड़ रहा है। शिक्षक ने तुरंत अपना बटुआ निकाला और 100 रुपये देकर उसे बीएससी में दाखिला लेने में मदद की। वही छात्र, जो उस समय 100 रुपये की कमी से जूझ रहा था, आज करोड़ों की कंपनी का मालिक है। यह युवक कोई और नहीं, बल्कि थायरोकेयर टेक्नोलॉजीज के संस्थापक अरोकियास्वामी वेलुमणि हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से एक विशाल कंपनी खड़ी की।
स्कूल की फीस भरने तक के नहीं थे पैसे
1959 में तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास स्थित गांव अप्पानाइकेनपट्टी पुदुर में एक साधारण परिवार में डॉ. अरोकियास्वामी वेलुमणि का जन्म हुआ। पिता किसान थे और परिवार के पास कुछ एकड़ जमीन थी, लेकिन वेलुमणि के जन्म के तीन साल बाद ही एक धोखे की वजह से उनकी सारी जमीन चली गई। घर तक बेचना पड़ा और परिवार गहरी गरीबी में डूब गया। जूते, कपड़े और बुनियादी जरूरतों तक के पैसे नहीं थे। ऐसे कठिन समय में उनकी मां दूध बेचकर परिवार चलाने लगीं और वह 11 साल की उम्र में कपास के खेतों में काम करने लगे। मई में कपास तोड़ते और जून में उसी पैसे से स्कूल की फीस भरते। इन शुरुआती संघर्षों ने उनमें कड़ी मेहनत, धैर्य और दृढ़ता की गहरी समझ पैदा की।
60 से भी ज्यादा बार मिला रिजेक्शन
हालातों से लड़ते हुए किसी तरह उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में बीएससी की डिग्री हासिल कर ली। उस समय कॉलेज की ग्रुप फोटो खरीदने तक के पैसे नहीं थे। बीएससी के बाद उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू किया, 60 से भी अधिक कंपनी में आवेदन दिया, लेकिन हर जगह से उन्हें असफलता ही मिली। इतनी असफलताएं भी वेलुमणि का रास्ता रोक नहीं पाईं। वह अपने हालातों के साथ संघर्ष करने लगे। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और एक कैप्सूल बनाने वाली कंपनी में उन्हें नौकरी मिल गई, जहां उनकी तनख्वाह 150 रुपये थी। अब वह 100 रुपये घर भेजते और 50 रुपये में किसी तरह खुद का खर्च चलाते, लेकिन कुछ ही समय बाद कंपनी बंद हो गई और वेलुमणि बेरोजगार हो गए। वह फिर से नौकरी ढंूढ़ रहे थे, तभी भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में लैब असिस्टेंट की पोस्ट के लिए अप्लाई किया।
इसमें उनका सेलेक्शन हो गया। इसमें काम करते हुए उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर साइंटिस्ट बने। इसी दौरान उन्होंने एक बैंक कर्मचारी से शादी भी कर ली। उनके जीवन में सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन वो एक कंफर्ट जोन में बंधकर नहीं रहना चाहते थे। 14 साल तक भाभा में काम करने के बाद वेलुमणि ने अपनी कंपनी खोलने की बात सोची।
बिना वेतन के किया काम
अपनी कंपनी स्थापित करने के लिए वेलुमणि और उनकी पत्नी ने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपने भविष्य निधि के पैसे से मुंबई के भायखला में एक गैराज किराये पर लिया और थायराइड विकारों का पता लगाने के लिए एक लाख रुपये का निवेश कर थायरोकेयर टेक्नोलॉजी नाम से एक परीक्षण केंद्र स्थापित किया। उनका लक्ष्य भारत के गरीबों के लिए थायराइड परीक्षण को किफायती बनाना था। शुरुआत में उनका फोकस केवल थायराइड के टेस्ट पर था। जब लैब खोली तो शुरू में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला।
इक्का-दुक्का ही ग्राहक आते थे, लेकिन वह काम करते रहे। बाद में इनकी कंपनी ने दूसरे टेस्ट को भी शामिल किया और कीमतें कम रखकर और परिचालन दक्षता पर ध्यान केंद्रित किया। इससे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी और थायरोकेयर तेजी से आगे बढ़ा। 150 स्क्वायर फीट का यह गैराज धीरे-धीरे 4 लाख स्क्वायर फीट में फैल गया। कंपनी को आगे ले जाने के लिए वह शुरू में कोई सैलरी नहीं लेते थे। कंपनी में जो भी कमाई होती थी, उसे वह कंपनी में ही लगा देते थे ताकि कंपनी को बढ़ाया जा सके। इस रणनीति को अपनाकर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सफलता की नई-नई सीढ़ियां चढ़ते रहे। आज उनकी कंपनी के भारत में 1200 से ज्यादा आउटलेट हैं और 2000 से भी ज्यादा शहरों में फैला हुआ है। नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों में भी काम कर रही है। वेलुमणि की कुल संपत्ति लगभग 5,000 करोड़ रुपये है।
युवाओं को सीख
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स्कूल की फीस भरने तक के नहीं थे पैसे
1959 में तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास स्थित गांव अप्पानाइकेनपट्टी पुदुर में एक साधारण परिवार में डॉ. अरोकियास्वामी वेलुमणि का जन्म हुआ। पिता किसान थे और परिवार के पास कुछ एकड़ जमीन थी, लेकिन वेलुमणि के जन्म के तीन साल बाद ही एक धोखे की वजह से उनकी सारी जमीन चली गई। घर तक बेचना पड़ा और परिवार गहरी गरीबी में डूब गया। जूते, कपड़े और बुनियादी जरूरतों तक के पैसे नहीं थे। ऐसे कठिन समय में उनकी मां दूध बेचकर परिवार चलाने लगीं और वह 11 साल की उम्र में कपास के खेतों में काम करने लगे। मई में कपास तोड़ते और जून में उसी पैसे से स्कूल की फीस भरते। इन शुरुआती संघर्षों ने उनमें कड़ी मेहनत, धैर्य और दृढ़ता की गहरी समझ पैदा की।
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60 से भी ज्यादा बार मिला रिजेक्शन
हालातों से लड़ते हुए किसी तरह उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में बीएससी की डिग्री हासिल कर ली। उस समय कॉलेज की ग्रुप फोटो खरीदने तक के पैसे नहीं थे। बीएससी के बाद उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू किया, 60 से भी अधिक कंपनी में आवेदन दिया, लेकिन हर जगह से उन्हें असफलता ही मिली। इतनी असफलताएं भी वेलुमणि का रास्ता रोक नहीं पाईं। वह अपने हालातों के साथ संघर्ष करने लगे। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और एक कैप्सूल बनाने वाली कंपनी में उन्हें नौकरी मिल गई, जहां उनकी तनख्वाह 150 रुपये थी। अब वह 100 रुपये घर भेजते और 50 रुपये में किसी तरह खुद का खर्च चलाते, लेकिन कुछ ही समय बाद कंपनी बंद हो गई और वेलुमणि बेरोजगार हो गए। वह फिर से नौकरी ढंूढ़ रहे थे, तभी भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में लैब असिस्टेंट की पोस्ट के लिए अप्लाई किया।
इसमें उनका सेलेक्शन हो गया। इसमें काम करते हुए उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर साइंटिस्ट बने। इसी दौरान उन्होंने एक बैंक कर्मचारी से शादी भी कर ली। उनके जीवन में सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन वो एक कंफर्ट जोन में बंधकर नहीं रहना चाहते थे। 14 साल तक भाभा में काम करने के बाद वेलुमणि ने अपनी कंपनी खोलने की बात सोची।
बिना वेतन के किया काम
अपनी कंपनी स्थापित करने के लिए वेलुमणि और उनकी पत्नी ने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपने भविष्य निधि के पैसे से मुंबई के भायखला में एक गैराज किराये पर लिया और थायराइड विकारों का पता लगाने के लिए एक लाख रुपये का निवेश कर थायरोकेयर टेक्नोलॉजी नाम से एक परीक्षण केंद्र स्थापित किया। उनका लक्ष्य भारत के गरीबों के लिए थायराइड परीक्षण को किफायती बनाना था। शुरुआत में उनका फोकस केवल थायराइड के टेस्ट पर था। जब लैब खोली तो शुरू में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला।
इक्का-दुक्का ही ग्राहक आते थे, लेकिन वह काम करते रहे। बाद में इनकी कंपनी ने दूसरे टेस्ट को भी शामिल किया और कीमतें कम रखकर और परिचालन दक्षता पर ध्यान केंद्रित किया। इससे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी और थायरोकेयर तेजी से आगे बढ़ा। 150 स्क्वायर फीट का यह गैराज धीरे-धीरे 4 लाख स्क्वायर फीट में फैल गया। कंपनी को आगे ले जाने के लिए वह शुरू में कोई सैलरी नहीं लेते थे। कंपनी में जो भी कमाई होती थी, उसे वह कंपनी में ही लगा देते थे ताकि कंपनी को बढ़ाया जा सके। इस रणनीति को अपनाकर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सफलता की नई-नई सीढ़ियां चढ़ते रहे। आज उनकी कंपनी के भारत में 1200 से ज्यादा आउटलेट हैं और 2000 से भी ज्यादा शहरों में फैला हुआ है। नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों में भी काम कर रही है। वेलुमणि की कुल संपत्ति लगभग 5,000 करोड़ रुपये है।
युवाओं को सीख
- शिक्षा कभी मत छोड़ें, चाहे हालात कितने भी कठिन हों।
- संघर्ष असफलता नहीं, बल्कि सफलता का पहला अध्याय है।
- संसाधन कम हों तब भी सपनों से समझौता न करें।
- हर अस्वीकृति आपको और मजबूत बनाती है।
- सही समय पर लिया गया रिस्क पूरा जीवन बदल सकता है।