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Mangala Kapoor Success Story: एसिड अटैक के बाद 6 साल अस्पताल में, संगीत से मिली नई जिंदगी; पढ़ें प्रेरक कहानी

एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Mon, 23 Feb 2026 04:10 AM IST
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सार

एक समय ऐसा भी था, जब मंगला कपूर ने छह वर्षों से अधिक समय अस्पताल में बिताया। लोगों की कटु बातों ने उन्हें कई बार पीछे हटने पर मजबूर किया, लेकिन पिता के साथ ने उन्हें टूटने नहीं दिया। संगीत को सहारा बनाकर उन्होंने अपना खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से हासिल किया और हर चुनौती को पार करते हुए अंततः पद्मश्री तक का गौरवपूर्ण सफर तय किया।

Mangala Kapoor Success Story: From Acid Attack Survivor to Padma Shri Awardee Through Music
पद्मश्री प्रो. मंगला कपूर - फोटो : Instagram
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विस्तार

वाराणसी जहां कहानियां केवल कही नहीं जातीं,  जी जाती हैं। कुछ कथाएं फुसफुसाहट बनकर बहती हैं, कुछ सुरों में ढलकर अमर हो जाती हैं, और कुछ वर्षों तक खामोशी में दबी रहती हैं, जब तक कि दुनिया उन्हें सुनने के लिए ठहर न जाए। ऐसी ही एक कहानी है पद्मश्री से सम्मानित डॉ. मंगला कपूर की। उनका जीवन साहस, संघर्ष और साधना का अद्भुत संगम है। बाल्यावस्था में हुई अकल्पनीय हिंसा ने उनके चेहरे और बचपन को झुलसा दिया, पर उनके भीतर के स्वर को नहीं जला सकी। वर्षों तक शारीरिक पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा और मानसिक संघर्षों से गुजरते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी। संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, पुनर्जन्म बना। उनके सुरों में पीड़ा की गहराई भी है और आत्मबल की ऊंचाई भी। समय के साथ लोगों का ध्यान उनके घावों से हटकर उनके रागों पर टिक गया। आज वे केवल एक प्रख्यात शास्त्रीय गायिका नहीं, बल्कि प्रेरणा का प्रतीक हैं।

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बारह साल की उम्र में एसिड अटैक
डॉ. मंगला कपूर का बचपन मंदिरों के शहर वाराणसी के एक संयुक्त परिवार में बीता। घर में शिक्षा और अनुशासन को महत्व दिया जाता था। तीन बच्चों में वे इकलौती बेटी थीं। पिता 250 रुपये का मामूली वेतन पाते थे, मां गृहिणी थीं, और सीमित साधनों के बावजूद घर में स्नेह की कमी नहीं थी। लेकिन जब वे सातवीं कक्षा में थीं, एक रात करीब ढाई बजे उन पर एसिड से हमला हुआ। व्यापारिक विवाद की आग ने उनके बचपन, चेहरे और आत्मविश्वास को झुलसा दिया। रात से सुबह तक उनकी दुनिया बदल चुकी थी। उस समय उनकी उम्र महज बारह वर्ष थी।
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आत्महत्या का प्रयास
असहनीय पीड़ा में उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां समुचित उपचार नहीं मिल सका। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि लोगों ने उनके जीवित रहने की उम्मीद छोड़ दी थी। कुछ लोगों ने तो माता-पिता को जहर दे देने की सलाह तक दे डाली। घर में अंत्येष्टि की तैयारी होने लगी, लेकिन उनकी सांसें थमी नहीं। इसके बाद पिता उन्हें एक निजी अस्पताल ले गए। इलाज, सर्जरी और शहर-दर-शहर भटकने का लंबा सिलसिला शुरू हो गया। छह वर्षों में उनके 37 ऑपरेशन हुए। आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी कठिन हो गया, फिर भी परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी। कई बार उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया, लेकिन हर बार पिता का साथ उन्हें संभाल लेता था। पिता ने घर पर शिक्षक बुलवाए और अस्पताल व घर के बीच उनकी पढ़ाई जारी रही। जब वे पहली बार आठवीं की परीक्षा देने पहुंचीं, तो सहपाठियों के उपहास ने उन्हें गहराई से आहत कर दिया। प्रिंसिपल ने उन्हें अलग कक्षा में बैठाया, लेकिन वे बिना परीक्षा दिए ही लौट आईं। हालांकि पिता ने हार नहीं मानी और विशेष परीक्षा दिलवाकर उनकी पढ़ाई फिर से शुरू कराई।

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संगीत से जीवन तक
डिप्रेशन गहराने लगा था। डॉक्टरों ने ध्यान भटकाने की सलाह दी। ईश्वर ने उन्हें अद्भुत स्वर दिया था। पिता ने संगीत कक्षा में प्रवेश दिलाया। शुरुआत में शिक्षक ने यह कहकर मना कर दिया कि अन्य बच्चे असहज होंगे, पर मां के आग्रह पर प्रवेश मिला। धीरे-धीरे संगीत ने उन्हें नया जीवन दिया। मित्र, शिक्षक और रियाज, इन सबने उनके आत्मविश्वास को पुनर्जीवित किया। वे हर कक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होती हुईं स्नातक के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पहुचीं।

पुरानी किताबों से की पढ़ाई
घर की हालत ऐसी थी कि बस का किराया भी नहीं होता था। वे पैदल विश्वविद्यालय जातीं। दो साड़ियां थीं, उन्हीं को धोकर पहनतीं। किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, अपने वरिष्ठ छात्रों की फटी-पुरानी किताबों से पढ़ाई करतीं। छात्रवृत्ति मिलने पर अपनी किताबें खरीदीं। इसी संघर्ष में उन्होंने पीएचडी तक की शिक्षा पूरी की। नौकरी की तलाश में कई जगह साक्षात्कार दिए, पर रूप-रंग के कारण अस्वीकृति मिली। अंततः बीएचयू के महिला महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली। इसी बीच पेजेट बीमारी से दोनों पैरों की हड्डियां टूट गईं। आठ महीने बिस्तर पर रहीं, पर बैशाखी के सहारे पुनः कॉलेज लौटीं। 30 वर्षों की सेवा के बाद प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुईं।

छह पुस्तकें भी लिखीं
भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके असाधारण योगदान तथा दुर्लभ रागों के संरक्षण के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। साथ ही, संगीत-शास्त्र और राग-दस्तावेजीकरण में उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें आचार्य भरत मुनि पुरस्कार भी प्रदान किया गया। उनकी आत्मा को स्पर्श करने वाली गायकी के कारण लोग उन्हें ‘काशी की लता’ कहने लगे। उन्होंने संगीत को केवल प्रस्तुति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया। वंचित बच्चों के लिए निशुल्क कक्षाएं आरंभ कीं। वे छह पुस्तकों की लेखिका हैं। उनकी आत्मकथा ‘सीरत’ उनकी उपलब्धियों का सजीव दस्तावेज है, जिस पर एक फिल्म भी बनाई गई है।

युवाओं को सीख

  • मानसिक मजबूती शारीरिक मजबूती से बड़ी होती है।
  • परिस्थितियां नहीं, आपका दृष्टिकोण भविष्य तय करता है।
  • सामाजिक तानों से टूटे नहीं, बल्कि मजबूत बनें।

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