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Suyash Singh: चर्चा में गैलेक्सआई के संस्थापक; दुनिया के पहले ऑप्टोसार उपग्रह की लॉन्चिंग में निभाई अहम भूमिका
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Mon, 11 May 2026 08:25 AM IST
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सार
एलन मस्क से प्रेरित और दुनिया का पहला ऑप्टोसार उपग्रह विकसित और सफलतापूर्वक लॉन्च करने वाले गैलेक्सआई के संस्थापकों में से एक सुयश सिंह ने अंतरिक्ष जगत में नवाचार का अग्रदूत बनकर वाकई एक क्रांति की है।
चर्चा में गैलेक्सआई के संस्थापक - सुयश सिंह
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
साल 2019, जुलाई का महीना और कैलिफोर्निया में स्पेसएक्स के ऑफिस का नजारा। पूरी दुनिया की नजरें 'हाइपरलूप पॉड प्रतियोगिता' पर टिकी थीं। दुनियाभर से आए हजारों प्रतिभाशाली इंजीनियरों और शोधकर्ताओं के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास से आई एक टीम भी मौजूद थी। यह टीम अपने सपनों को एक छोटे-से 'पॉड' (एक प्रकार का कैप्सूल) में समेटकर यहां तक पहुंची थी। खास बात यह है कि 2,500 से अधिक आवेदकों में से प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचने वाली यह इकलौती एशियाई टीम थी, जिसका नेतृत्व एक युवा इंजीनियर कर रहा था। हालांकि, फाइनल में जर्मनी की टीम विजयी हुई, लेकिन भारतीय टीम के नवाचार की स्वायत्तता और उसके बेजोड़ इंजीनियरिंग कौशल ने स्पेसएक्स के मालिक एलन मस्क तक को बेहद प्रभावित किया। मस्क ने न केवल टीम से मुलाकात की, बल्कि उनके काम को सराहा और टीम के सदस्यों के जज्बे की खुलकर तारीफ भी की। उस टीम का नेतृत्व करने वाला वही युवा इंजीनियर वर्षों बाद आज दुनियाभर में सुर्खियों में छाया हुआ है। नाम है सुयश सिंह। फिलवक्त सुयश की चर्चा उनकी कंपनी गैलेक्सआई के 'मिशन दृष्टि' की वजह से हो रही है, जिसके तहत दुनिया का पहला ऑप्टोसार उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया है। यह अत्याधुनिक उपग्रह बादलों, धुएं और घने अंधेरे के पार भी स्पष्ट तस्वीरें लेने में सक्षम है।
बादलों के पार देखने वाली तकनीक
सुयश सिंह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उनकी पढ़ाई मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अलग-अलग स्कूलों में हुई। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज से पूरी की और बाद में आईआईटी, मद्रास से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया। कॅरिअर की शुरुआत उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में डाटा एनालिटिक्स से की, जिसके बाद वे मशीन विजन और डीप-टेक रिसर्च से जुड़े। 2021 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘गैलेक्सआई’ की स्थापना की।
भारत की पहली टीम
आईआईटी में पढ़ाई के दौरान ही सुयश सिंह ने वर्ष 2017 में ‘आविष्कार हाइपरलूप’ टीम बनाई। इसे भारत की पहली छात्र-नेतृत्व वाली हाइपरलूप टीम माना जाता है। नवाचार क्षमता और नेतृत्व कौशल के कारण उन्हें आन्त्रप्रेन्योर इंडिया की प्रतिष्ठित '35 अंडर 35' सूची में भी शामिल किया जा चुका है। इसके अलावा, वह एआईईएसईसी से भी जुड़े रहे हैं। यह युवाओं से जुड़ा एक वैश्विक गैर-लाभकारी संगठन है, जो दुनिया के 100 से अधिक देशों में सक्रिय है।
सात समंदर पार की सीख
सुयश पहली बार हाइपरलूप पॉड प्रतियोगिता में असफल हो गए थे। इसके बाद, उन्होंने अपने खर्चे पर अमेरिका जाकर प्रतियोगिता को करीब से समझा और फिर टीम की रणनीति बदली। इसी बदलाव के बाद उनकी टीम 2019 में फाइनल तक पहुंची। सुयश हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के उस मेल को पसंद करते हैं, जो जटिल से जटिल डाटा (जैसे सैटेलाइट इमेज) को आम लोगों के लिए आसान बना सके।
जब प्रधानमंत्री ने की तारीफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में सुयश सिंह और उनकी टीम की 'न्यू इंडिया के युवा नवोन्मेषक' कहकर सराहना की थी। यह किसी युवा डीप-टेक संस्थापक के लिए बड़ी उपलब्धि है। सुयश एक अच्छे वक्ता भी हैं और टेडएक्स जैसे मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
जिंदगी का यादगार लम्हा
एलन मस्क से हुई अपनी मुलाकात को सुयश अपनी जिंदगी का ड्रीम मोमेंट मानते हैं। सुयश एलन मस्क को ही अपना प्रेरणास्रोत भी मानते हैं। मस्क के 'फर्स्ट प्रिंसिपल्स' दृष्टिकोण और असंभव लगने वाले लक्ष्यों को हासिल करने की उनकी क्षमता से वह काफी प्रभावित हैं।
जंगलों की आग का वह 'एहसास'
सुयश को स्टार्टअप गैलेक्सआई की प्रेरणा किसी बोर्डरूम से नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक आपदा से मिली थी। साल 2018 में कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग का अध्ययन करते समय सुयश ने एक गंभीर तकनीकी कमजोरी को महसूस किया कि पारंपरिक ऑप्टिकल सैटेलाइट घने धुएं के पार नहीं देख सकते थे, और दूसरी ओर रडार डाटा इतना जटिल था कि आम लोगों के लिए उसका उपयोग करना बहुत मुश्किल था। इसी हताशा और चुनौती ने उन्हें 'ऑप्टोसार' बनाने के लिए प्रेरित किया। यह दुनिया का पहला ऐसा हाइब्रिड सेंसर है, जो एक ही सैटेलाइट में ऑप्टिकल और रडार इमेजिंग, दोनों की खूबियों को जोड़ता है।
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बादलों के पार देखने वाली तकनीक
सुयश सिंह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उनकी पढ़ाई मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अलग-अलग स्कूलों में हुई। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज से पूरी की और बाद में आईआईटी, मद्रास से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया। कॅरिअर की शुरुआत उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में डाटा एनालिटिक्स से की, जिसके बाद वे मशीन विजन और डीप-टेक रिसर्च से जुड़े। 2021 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘गैलेक्सआई’ की स्थापना की।
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भारत की पहली टीम
आईआईटी में पढ़ाई के दौरान ही सुयश सिंह ने वर्ष 2017 में ‘आविष्कार हाइपरलूप’ टीम बनाई। इसे भारत की पहली छात्र-नेतृत्व वाली हाइपरलूप टीम माना जाता है। नवाचार क्षमता और नेतृत्व कौशल के कारण उन्हें आन्त्रप्रेन्योर इंडिया की प्रतिष्ठित '35 अंडर 35' सूची में भी शामिल किया जा चुका है। इसके अलावा, वह एआईईएसईसी से भी जुड़े रहे हैं। यह युवाओं से जुड़ा एक वैश्विक गैर-लाभकारी संगठन है, जो दुनिया के 100 से अधिक देशों में सक्रिय है।
सात समंदर पार की सीख
सुयश पहली बार हाइपरलूप पॉड प्रतियोगिता में असफल हो गए थे। इसके बाद, उन्होंने अपने खर्चे पर अमेरिका जाकर प्रतियोगिता को करीब से समझा और फिर टीम की रणनीति बदली। इसी बदलाव के बाद उनकी टीम 2019 में फाइनल तक पहुंची। सुयश हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के उस मेल को पसंद करते हैं, जो जटिल से जटिल डाटा (जैसे सैटेलाइट इमेज) को आम लोगों के लिए आसान बना सके।
जब प्रधानमंत्री ने की तारीफ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में सुयश सिंह और उनकी टीम की 'न्यू इंडिया के युवा नवोन्मेषक' कहकर सराहना की थी। यह किसी युवा डीप-टेक संस्थापक के लिए बड़ी उपलब्धि है। सुयश एक अच्छे वक्ता भी हैं और टेडएक्स जैसे मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
जिंदगी का यादगार लम्हा
एलन मस्क से हुई अपनी मुलाकात को सुयश अपनी जिंदगी का ड्रीम मोमेंट मानते हैं। सुयश एलन मस्क को ही अपना प्रेरणास्रोत भी मानते हैं। मस्क के 'फर्स्ट प्रिंसिपल्स' दृष्टिकोण और असंभव लगने वाले लक्ष्यों को हासिल करने की उनकी क्षमता से वह काफी प्रभावित हैं।
जंगलों की आग का वह 'एहसास'
सुयश को स्टार्टअप गैलेक्सआई की प्रेरणा किसी बोर्डरूम से नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक आपदा से मिली थी। साल 2018 में कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग का अध्ययन करते समय सुयश ने एक गंभीर तकनीकी कमजोरी को महसूस किया कि पारंपरिक ऑप्टिकल सैटेलाइट घने धुएं के पार नहीं देख सकते थे, और दूसरी ओर रडार डाटा इतना जटिल था कि आम लोगों के लिए उसका उपयोग करना बहुत मुश्किल था। इसी हताशा और चुनौती ने उन्हें 'ऑप्टोसार' बनाने के लिए प्रेरित किया। यह दुनिया का पहला ऐसा हाइब्रिड सेंसर है, जो एक ही सैटेलाइट में ऑप्टिकल और रडार इमेजिंग, दोनों की खूबियों को जोड़ता है।