{"_id":"6a75ec344e2c9e34b70e798b","slug":"up-election-2027-shamli-kairana-assembly-seat-history-bjp-sp-bsp-congress-political-equation-2026-08-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"सीट का समीकरण: दो परिवारों के दबदबे की कहानी कहता है कैराना, बीते 14 में 12 चुनाव इन्ही में से कोई एक जीता","category":{"title":"Election","title_hn":"चुनाव","slug":"election"}}
सीट का समीकरण: दो परिवारों के दबदबे की कहानी कहता है कैराना, बीते 14 में 12 चुनाव इन्ही में से कोई एक जीता
Mon, 10 Aug 2026 01:09 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Mon, 10 Aug 2026 01:09 PM IST
सार
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं। इससे पहले सियासी सरगर्मियां भी तेज होने लगी हैं। सियासी दल अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। इन सबके बीच अमर उजाला आपको राज्य की सभी सीटों के चुनावी इतिहास से रूबरू कराने जा रहा है। आज की कड़ी में पढ़ें शामली जिले की कैराना विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास और मौजूदा समीकरण...
विज्ञापन
कैराना सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब सात महीने का समय ही रह गया है। राजनीतिक दलों ने चुनाव में जोर लगाने के लिए अभी से कमर कसना भी शुरू कर दिया है। सत्तासीन भाजपा से लेकर समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की ओर से वोटरों के बीच पहुंच बनाने की कवायद शुरू की जा चुकी है। इसी कड़ी में राजनीतिक दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ अहम सीटों पर अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। आइये जानते हैं आज इसी क्षेत्र की एक अहम सीट कैराना विधानसभा सीट और इसके इतिहास के बारे में।
न
पहले जानें- किस जिले में आती है कैराना की सीट
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला है शामली। इस जिले के अंतर्गत तीन तहसील, पांच ब्लॉक और 322 गांव आते हैं। शामली जिला बनने से पहले यह सीट मुजफ्फरनगर जिले में आती थी।
अलग जिला बनने के बाद शामली में तीन विधानसभा सीटें आईं। इनमें- कैराना, शामली और थानाभवन विधानसभाएं शामिल हैं। तीनों ही विधानसभाओं का आजादी के बाद चुनाव का अपना इतिहास है। सीट का समीकरण के पहले हिस्से में आज बात करेंगे कैराना विधानसभा सीट की।
विज्ञापन
क्या है कैराना विधानसभा सीट का इतिहास?
कैराना विधानसभा सीट के इतिहास को चार चरण में बांटा जा सकता है। पहला- कांग्रेस के दबदबे वाला समय, जो कि 1951 से 1962 तक चला। दूसरा- हुकुम सिंह और हसन परिवार के राजनीतिक उदय का काल, जिसके जरिए कांग्रेस और जनता दल ने 1970 से 1996 तक इस सीट पर कब्जा जमाए रखा। तीसरा- 1996 के बाद भाजपा का वर्चस्व और चौथा- सपा की बेरोकटोक विजय का दौर।
1. 1951 का चुनाव
1951 में जब उत्तर प्रदेश में पहली बार चुनाव हुए थे, तब कैराना दो हिस्सों में बंटा था- कैराना उत्तर और कैराना दक्षिण। इन दोनों सीटों पर तब कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। कैराना उत्तर से केशो गुप्ता और कैराना दक्षिण से वीरेंद्र वर्मा विधायक चुने गए थे।
2. 1957 का चुनाव
हालांकि, 1955 वह साल था, जब परिसीमन आयोग के आदेश के तहत दोनों सीटों को मिलाकर एक एकल कैराना विधानसभा सीट का गठन किया गया। इसके बाद 1957 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में कैराना से कांग्रेस के वीरेंद्र शर्मा विधायक बने।
3. 1962 का चुनाव
1962 के चुनाव में कांग्रेस का एकाधिकार टूटा और निर्दलीय उम्मीदवार चंदन सिंह ने इस सीट से जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के वीरेंद्र वर्मा को नौ हजार से अधिक वोटों के अंतर से हरा दिया था।
4. 1967 का चुनाव
1967 में एक बार फिर कांग्रेस ने इस सीट पर वापसी की। पार्टी ने शफाकत जंग को मैदान में उतारा और उन्होंने 19 हजार वोट हासिल कर पार्टी को जीत दिलाई। हालांकि, कांग्रेस की जीत का एक बड़ा कारण दो निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच वोटों का बंटना था। दरअसल, तत्कालीन विधायक चंदन सिंह के सामने कांग्रेस के साथ-साथ किसान नेता चंद्रभान भी उम्मीदवार बने। कृषि प्रधान इस क्षेत्र में चंदन सिंह को पिछली बार मिले वोट बंट गए और चंद्रभान को भी करीब उनके बराबर (15 हजार) ही वोट मिले। नतीजतन कैराना से शफाकत जंग की विजयी हुई।
5. 1969 का चुनाव
पिछले चुनाव में चंदन सिंह के साथ वोट बंटने के कारण हार का सामना करने वाले चंद्रभान इस बार चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के टिकट पर चुनाव लड़े। उन्हें चुनाव में जबरदस्त जीत मिली। चंद्रभान ने कांग्रेस के सलेक चंद संगल को करीब 20 हजार वोटों के अंतर से हरा दिया। जहां उन्हें 47,244 वोट मिले तो वहीं संगल 27,491 वोट ही पा सके।
6. 1974 का चुनाव
बाबू हुकुम सिंह ने 1974 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार यहां से जीत दर्ज की। उन्हें 27,405 वोट मिले, जबकि भारतीय किसान दल के चंद्रभान शर्मा इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे। हुकुम सिंह को सीधी टक्कर कांग्रेस (ओ) के प्रत्याशी बशीर अहमद से मिली थी, जिन्हें 21,005 वोट मिले थे।
7. 1977 का चुनाव
कैराना में 1977 के विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प रहे। इस चुनाव में जीत के साथ ही यह सीट कांग्रेस के हाथ से निकलकर जनता पार्टी के खाते में चली गई थी। दरअसल, बीते चुनाव में कांग्रेस (ओ) से उतरे बशीर अहमद को इस बार आपातकाल के बाद अस्तित्व में आई जनता पार्टी ने उम्मीदवार बनाया। उन्होंने इसमें जीत हासिल की और कांग्रेस के हुकुम सिंह को छह हजार से अधिकर वोटों से परास्त किया। बशीर अहमद को 35,330 वोट हासिल हुए, जबकि हुकुम सिंह दूसरे स्थान पर रहे, जिन्हें 29,275 वोट मिले।
8. 1980 का चुनाव
कैराना विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में 1980 के चुनाव में हुकुम सिंह ने जीत हासिल की थी। उन्होंने यह चुनाव जनता पार्टी सेक्युलर के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था और विधायक चुने गए थे। उन्हें 27,749 वोट मिले थे और निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले बशीर अहमद को 20,146 वोट मिले। इस तरह हुकुम सिंह ने करीब सात हजार वोटों से बशीर अहमद को शिकस्त दी थी। वहीं, कांग्रेस (आई) की तरफ से उतरे शफाकत जंग को 18,313 वोट मिले।
9. 1985 का चुनाव
कैराना में 1985 के विधानसभा चुनाव में हुकुम सिंह ने जीत हासिल की थी। उन्होंने यह चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था और विधायक चुने गए थे। 1980 के चुनाव के बाद इस सीट पर यह उनकी लगातार दूसरी जीत थी। हुकुम सिंह को इस चुनाव में 55,561 वोट मिले, जबकि इस बार लोकदल से चुनाव लड़ने वाले बशीर अहमद को 43,429 वोट मिले।
10. 1989 का चुनाव
कैराना में 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार राजेश्वर बंसल ने जीत हासिल की थी और वे वहां के विधायक चुने गए थे। इस जीत के साथ ही उन्होंने इस सीट पर हुकुम सिंह के लगातार दो बार (1980 और 1985) के जीत के सिलसिले को तोड़ दिया था। बंसल को इस चुनाव में 65,053 वोट मिले, जबकि हुकुम सिंह को 60,032 वोट मिले।
11. 1991 का चुनाव
1991 के चुनावों में मुनव्वर हसन ने जनता दल के टिकट पर पहली बार जीत हासिल की। इसने कैराना सीट पर एक नए मुस्लिम-गुर्जर राजनीतिक समीकरण को जन्म दिया। मुनव्वर हसन ने कांग्रेस के हुकुम सिंह को एकतरफा हराया और 48,224 वोट हासिल किए। वहीं, हुकुम सिंह को 31,660 वोट मिले। इस चुनाव की खास बात यह ही कि पिछली बार निर्दलीय लड़ने वाले राजेश्वर बंसल इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। भाजपा उम्मीदवार को 29,730 वोटों के साथ तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।
12. 1993 का चुनाव
कैराना में 1993 के विधानसभा चुनाव में जनता दल के उम्मीदवार मुनव्वर हसन ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की थी और विधायक चुने गए। एक बार फिर उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे हुकुम सिंह को हराया। दूसरी तरफ भाजपा की तरफ से लड़ रहे सत्यपाल को 34,312 वोटों के साथ तीसरा स्थान मिला। इस चुनाव में पहली बार समाजवादी पार्टी (सपा) की एंट्री हुई और उसके रामफल मलिक को 4400 वोट मिले।
13. 1996 का चुनाव
कैराना में 1996 के विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प रहे। 1996 में बाबू हुकुम सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। राम मंदिर आंदोलन के बीच राज्य में तेजी से प्रभाव बढ़ा रही इस पार्टी और हुकुम सिंह दोनों को साथ आने का फायदा मिला। हुकुम सिंह को चुनाव में 81,658 वोट मिले। वहीं, सीट पर महज दूसरा चुनाव लड़ रही सपा ने बाबू सिंह को उम्मीदवार बनाया, जिन्हें 68,215 वोट मिले। यानी हुकुम सिंह 13,443 वोट के अंतर से जीते।
14. 2002, 2007, 2012 के विधानसभा चुनाव
1996 की यह जीत हुकुम सिंह के लिए एक लंबे जीत के सिलसिले की शुरुआत थी। इस चुनाव के बाद उन्होंने कैराना सीट से 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी लगातार जीत दर्ज की थी। इस तरह कैराना भाजपा का अभेद्य किला बनता चला गया। इस जीत का एक तथ्य यह है कि 2002 में समाजवादी पार्टी, 2007 में रालोद और 2012 में बसपा इस सीट पर दूसरे नंबर के दल के तौर पर उभरे।
15. 2014 का उपचुनाव और भाजपा से छिनी सीट
कैराना में 2014 में विधानसभा के उपचुनाव हुए थे। यह चुनाव इसलिए हुआ, क्योंकि इस सीट से लगातार चार बार (1996, 2002, 2007 और 2012) विधायक रहे भारतीय जनता पार्टी के हुकुम सिंह को पार्टी ने 2014 में लोकसभा का टिकट दे दिया था। उनके लोकसभा चले जाने के कारण यह विधानसभा सीट खाली हो गई थी, जिस वजह से यहां 2014 में उपचुनाव कराए गए।
2014 में कैराना विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नाहिद हसन ने जीत हासिल की और वे नए विधायक चुने गए। नाहिद हसन को इस चुनाव में कुल 83,984 वोट हासिल हुए। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा के उम्मीदवार अनिल चौहान, जिन्हें 82,885 वोट मिले को मात्र 1,099 वोटों के करीबी अंतर से हराया। वहीं, कांग्रेस के उम्मीदवार अरशद हसन 16,906 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
16. 2017 और 2022 के चुनाव में सपा का डंका
इस उपचुनाव के परिणाम के साथ ही कैराना विधानसभा सीट भाजपा के हाथ से निकलकर समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई। नाहिद हसन बीते तीन चुनावों से लगातार इस सीट पर जीत दर्ज कर रहे हैं। 2017 में जहां उन्होंने भाजपा की मृगांका सिंह को हराते हुए करीब एक लाख वोट हासिल किए थे, वहीं 2022 में उन्होंने यह रिकॉर्ड भी तोड़ दिया और 1,31,035 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। इस बार भी उन्होंने भाजपा की मृगांका सिंह को हराया, जिन्हें 1,05,148 वोट मिले।
विज्ञापन
न
पहले जानें- किस जिले में आती है कैराना की सीट
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला है शामली। इस जिले के अंतर्गत तीन तहसील, पांच ब्लॉक और 322 गांव आते हैं। शामली जिला बनने से पहले यह सीट मुजफ्फरनगर जिले में आती थी।
विज्ञापन
अलग जिला बनने के बाद शामली में तीन विधानसभा सीटें आईं। इनमें- कैराना, शामली और थानाभवन विधानसभाएं शामिल हैं। तीनों ही विधानसभाओं का आजादी के बाद चुनाव का अपना इतिहास है। सीट का समीकरण के पहले हिस्से में आज बात करेंगे कैराना विधानसभा सीट की।
विज्ञापन
क्या है कैराना विधानसभा सीट का इतिहास?
कैराना विधानसभा सीट के इतिहास को चार चरण में बांटा जा सकता है। पहला- कांग्रेस के दबदबे वाला समय, जो कि 1951 से 1962 तक चला। दूसरा- हुकुम सिंह और हसन परिवार के राजनीतिक उदय का काल, जिसके जरिए कांग्रेस और जनता दल ने 1970 से 1996 तक इस सीट पर कब्जा जमाए रखा। तीसरा- 1996 के बाद भाजपा का वर्चस्व और चौथा- सपा की बेरोकटोक विजय का दौर।
1. 1951 का चुनाव
1951 में जब उत्तर प्रदेश में पहली बार चुनाव हुए थे, तब कैराना दो हिस्सों में बंटा था- कैराना उत्तर और कैराना दक्षिण। इन दोनों सीटों पर तब कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। कैराना उत्तर से केशो गुप्ता और कैराना दक्षिण से वीरेंद्र वर्मा विधायक चुने गए थे।
2. 1957 का चुनाव
हालांकि, 1955 वह साल था, जब परिसीमन आयोग के आदेश के तहत दोनों सीटों को मिलाकर एक एकल कैराना विधानसभा सीट का गठन किया गया। इसके बाद 1957 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में कैराना से कांग्रेस के वीरेंद्र शर्मा विधायक बने।
3. 1962 का चुनाव
1962 के चुनाव में कांग्रेस का एकाधिकार टूटा और निर्दलीय उम्मीदवार चंदन सिंह ने इस सीट से जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के वीरेंद्र वर्मा को नौ हजार से अधिक वोटों के अंतर से हरा दिया था।
4. 1967 का चुनाव
1967 में एक बार फिर कांग्रेस ने इस सीट पर वापसी की। पार्टी ने शफाकत जंग को मैदान में उतारा और उन्होंने 19 हजार वोट हासिल कर पार्टी को जीत दिलाई। हालांकि, कांग्रेस की जीत का एक बड़ा कारण दो निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच वोटों का बंटना था। दरअसल, तत्कालीन विधायक चंदन सिंह के सामने कांग्रेस के साथ-साथ किसान नेता चंद्रभान भी उम्मीदवार बने। कृषि प्रधान इस क्षेत्र में चंदन सिंह को पिछली बार मिले वोट बंट गए और चंद्रभान को भी करीब उनके बराबर (15 हजार) ही वोट मिले। नतीजतन कैराना से शफाकत जंग की विजयी हुई।
5. 1969 का चुनाव
पिछले चुनाव में चंदन सिंह के साथ वोट बंटने के कारण हार का सामना करने वाले चंद्रभान इस बार चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के टिकट पर चुनाव लड़े। उन्हें चुनाव में जबरदस्त जीत मिली। चंद्रभान ने कांग्रेस के सलेक चंद संगल को करीब 20 हजार वोटों के अंतर से हरा दिया। जहां उन्हें 47,244 वोट मिले तो वहीं संगल 27,491 वोट ही पा सके।
6. 1974 का चुनाव
बाबू हुकुम सिंह ने 1974 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार यहां से जीत दर्ज की। उन्हें 27,405 वोट मिले, जबकि भारतीय किसान दल के चंद्रभान शर्मा इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे। हुकुम सिंह को सीधी टक्कर कांग्रेस (ओ) के प्रत्याशी बशीर अहमद से मिली थी, जिन्हें 21,005 वोट मिले थे।
7. 1977 का चुनाव
कैराना में 1977 के विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प रहे। इस चुनाव में जीत के साथ ही यह सीट कांग्रेस के हाथ से निकलकर जनता पार्टी के खाते में चली गई थी। दरअसल, बीते चुनाव में कांग्रेस (ओ) से उतरे बशीर अहमद को इस बार आपातकाल के बाद अस्तित्व में आई जनता पार्टी ने उम्मीदवार बनाया। उन्होंने इसमें जीत हासिल की और कांग्रेस के हुकुम सिंह को छह हजार से अधिकर वोटों से परास्त किया। बशीर अहमद को 35,330 वोट हासिल हुए, जबकि हुकुम सिंह दूसरे स्थान पर रहे, जिन्हें 29,275 वोट मिले।
8. 1980 का चुनाव
कैराना विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में 1980 के चुनाव में हुकुम सिंह ने जीत हासिल की थी। उन्होंने यह चुनाव जनता पार्टी सेक्युलर के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था और विधायक चुने गए थे। उन्हें 27,749 वोट मिले थे और निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले बशीर अहमद को 20,146 वोट मिले। इस तरह हुकुम सिंह ने करीब सात हजार वोटों से बशीर अहमद को शिकस्त दी थी। वहीं, कांग्रेस (आई) की तरफ से उतरे शफाकत जंग को 18,313 वोट मिले।
9. 1985 का चुनाव
कैराना में 1985 के विधानसभा चुनाव में हुकुम सिंह ने जीत हासिल की थी। उन्होंने यह चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था और विधायक चुने गए थे। 1980 के चुनाव के बाद इस सीट पर यह उनकी लगातार दूसरी जीत थी। हुकुम सिंह को इस चुनाव में 55,561 वोट मिले, जबकि इस बार लोकदल से चुनाव लड़ने वाले बशीर अहमद को 43,429 वोट मिले।
10. 1989 का चुनाव
कैराना में 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार राजेश्वर बंसल ने जीत हासिल की थी और वे वहां के विधायक चुने गए थे। इस जीत के साथ ही उन्होंने इस सीट पर हुकुम सिंह के लगातार दो बार (1980 और 1985) के जीत के सिलसिले को तोड़ दिया था। बंसल को इस चुनाव में 65,053 वोट मिले, जबकि हुकुम सिंह को 60,032 वोट मिले।
11. 1991 का चुनाव
1991 के चुनावों में मुनव्वर हसन ने जनता दल के टिकट पर पहली बार जीत हासिल की। इसने कैराना सीट पर एक नए मुस्लिम-गुर्जर राजनीतिक समीकरण को जन्म दिया। मुनव्वर हसन ने कांग्रेस के हुकुम सिंह को एकतरफा हराया और 48,224 वोट हासिल किए। वहीं, हुकुम सिंह को 31,660 वोट मिले। इस चुनाव की खास बात यह ही कि पिछली बार निर्दलीय लड़ने वाले राजेश्वर बंसल इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। भाजपा उम्मीदवार को 29,730 वोटों के साथ तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।
12. 1993 का चुनाव
कैराना में 1993 के विधानसभा चुनाव में जनता दल के उम्मीदवार मुनव्वर हसन ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की थी और विधायक चुने गए। एक बार फिर उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे हुकुम सिंह को हराया। दूसरी तरफ भाजपा की तरफ से लड़ रहे सत्यपाल को 34,312 वोटों के साथ तीसरा स्थान मिला। इस चुनाव में पहली बार समाजवादी पार्टी (सपा) की एंट्री हुई और उसके रामफल मलिक को 4400 वोट मिले।
13. 1996 का चुनाव
कैराना में 1996 के विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प रहे। 1996 में बाबू हुकुम सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। राम मंदिर आंदोलन के बीच राज्य में तेजी से प्रभाव बढ़ा रही इस पार्टी और हुकुम सिंह दोनों को साथ आने का फायदा मिला। हुकुम सिंह को चुनाव में 81,658 वोट मिले। वहीं, सीट पर महज दूसरा चुनाव लड़ रही सपा ने बाबू सिंह को उम्मीदवार बनाया, जिन्हें 68,215 वोट मिले। यानी हुकुम सिंह 13,443 वोट के अंतर से जीते।
14. 2002, 2007, 2012 के विधानसभा चुनाव
1996 की यह जीत हुकुम सिंह के लिए एक लंबे जीत के सिलसिले की शुरुआत थी। इस चुनाव के बाद उन्होंने कैराना सीट से 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी लगातार जीत दर्ज की थी। इस तरह कैराना भाजपा का अभेद्य किला बनता चला गया। इस जीत का एक तथ्य यह है कि 2002 में समाजवादी पार्टी, 2007 में रालोद और 2012 में बसपा इस सीट पर दूसरे नंबर के दल के तौर पर उभरे।
15. 2014 का उपचुनाव और भाजपा से छिनी सीट
कैराना में 2014 में विधानसभा के उपचुनाव हुए थे। यह चुनाव इसलिए हुआ, क्योंकि इस सीट से लगातार चार बार (1996, 2002, 2007 और 2012) विधायक रहे भारतीय जनता पार्टी के हुकुम सिंह को पार्टी ने 2014 में लोकसभा का टिकट दे दिया था। उनके लोकसभा चले जाने के कारण यह विधानसभा सीट खाली हो गई थी, जिस वजह से यहां 2014 में उपचुनाव कराए गए।
2014 में कैराना विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नाहिद हसन ने जीत हासिल की और वे नए विधायक चुने गए। नाहिद हसन को इस चुनाव में कुल 83,984 वोट हासिल हुए। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा के उम्मीदवार अनिल चौहान, जिन्हें 82,885 वोट मिले को मात्र 1,099 वोटों के करीबी अंतर से हराया। वहीं, कांग्रेस के उम्मीदवार अरशद हसन 16,906 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
16. 2017 और 2022 के चुनाव में सपा का डंका
इस उपचुनाव के परिणाम के साथ ही कैराना विधानसभा सीट भाजपा के हाथ से निकलकर समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई। नाहिद हसन बीते तीन चुनावों से लगातार इस सीट पर जीत दर्ज कर रहे हैं। 2017 में जहां उन्होंने भाजपा की मृगांका सिंह को हराते हुए करीब एक लाख वोट हासिल किए थे, वहीं 2022 में उन्होंने यह रिकॉर्ड भी तोड़ दिया और 1,31,035 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। इस बार भी उन्होंने भाजपा की मृगांका सिंह को हराया, जिन्हें 1,05,148 वोट मिले।