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Uttarakhand Samwad 2026: निर्देशकों के बीच रहा इसलिए ‘स्त्री’ मिली, कास्टिंग काउच पर क्या बोले अभिषेक बनर्जी?

एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति राघव Updated Wed, 24 Jun 2026 04:39 PM IST
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सार

Amar Ujala Uttarakhand Samwad 2026: देहरादून में आयोजित अमर उजाला संवाद 2026 में चर्चित अभिनेता और कास्टिंग निर्देशक अभिषेक बनर्जी भी शामिल हुए हैं। 'पाताल लोक' में हथौड़ा त्यागी और 'स्त्री' में जना का किरदार निभाने वाले अभिनेता ने इस कार्यक्रम में कई दिलचस्प किस्से साझा किए।

Amar Ujala Uttarakhand Samwad 2026: actor casting director Abhishek Banerjee Attend Samwad Shares his journey
अमर उजाला संवाद में अभिषेक बनर्जी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

24 जून को देहरादून में 'अमर उजाला संवाद 2026' कार्यक्रम का आयोजित किया गया। कार्यक्रम में खेल, राजनीति, अध्यात्म और मनोरंजन से जुड़ी कई दिग्गज हस्तियां शामिल हुईं। संवाद में 'पाताल लोक' में हथौड़ा त्यागी और 'स्त्री' में जना का किरदार निभाकर मशहूर हुए अभिनेता अभिषेक बनर्जी भी शामिल हुए। पढ़िए मंच से उन्होंने क्या कुछ कहा?





देहरादून को लेकर कोई खास याद?
बन टिक्की। देहरादून की बन टिक्की मेरे लिए काफी खास है। मेरे दोस्तों ने खिलाई थी। मेरे कई दोस्त यहां रहते हैं। मैं शूटिंग के लिए आया था। कई जगहों पर घूमा था। बचपन में माता-पिता के साथ भी आया था।
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करियर में जो सोचकर आए थे, वो अब तक हासिल किया?
करियर में जो सोचकर आया था, वह अभी बाकी है। बहुत बड़े सपने देख लिए थे। अभी और बढ़ने की जरूरत है। प्रक्रिया चल रही है। धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूं। मैं खड़गपुर में पैदा हुआ था। मेरे पिता सीआईएसएफ में थे। वो कोलकाता में पोस्टेड थे। शुरुआती दौर मैं दो साल कोलकाता रहा।
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फिर दिल्ली में पिताजी का ट्रांसफर हुआ। फिर दिल्ली के बाद तमिलनाडु गया। वहां पांच साल मेरी परवरिश हुई और वहीं से एक्टिंग का कीड़ा काटा। मैं स्पोर्ट्सपर्सन था। कई गेम खेलता था। मगर, साथ ही कई और एक्टिविटी थीं। वहीं से मंच पर आया, एक्टिंग की और यहीं से शौक लगा कि एक्टिंग मैं आगे भी करना चाहूंगा।
उसके बाद मैं दिल्ली आया। यहां कुछ साल स्कूल में बिताने के बाद मुझे किसी ने बताया कि डीयू का किरोड़ीमल कॉलेज ऐसा है, जहां थिएटर बहुत अच्छा होता है। कई माने हुए कलाकार वहीं से हैं। वहां, थिएटर करने के बाद, मैं दिल्ली से मुंबई गया।

आउटसाइडर के लिए यहां कितना संघर्ष होता है?
जैसा कि हम किताबों में पढ़ते थे कि भारत एक ग्रामीण प्रधान देश है। बहुत सारे लोग छोटे टाउन से आते हैं। मैं खुद भी एक छोटे शहर से आता हूं। बड़े शहर तक की यात्रा हर किसी के लिए एक संघर्ष का समय होता है। मेरे पिता जी जब अपने संघर्ष की बात बताते हैं तो मुझे अपना संघर्ष कम लगता है।
सेना में होने के नाते उन्होंने जो संघर्ष देखा, हमारा संघर्ष बहुत बेसिक है। आप सपना देखकर कुछ पाएंगे, ऐसा नहीं है। उस सपने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी। पूरी शिद्दत के साथ मेहनत करनी होगी। ऐसी इंडस्ट्री में, जहां पहले से ही बहुत जाने-माने लोग मौजूद हैं। यहां प्रतिस्पर्धा के साथ आगे बढ़ना।



कभी ऐसा लगा कि इंडस्ट्री मेरे लिए नहीं बनी है? मगर, कभी कुछ मोटिवेशन मिला हो...
कभी ऐसा नहीं लगा कि इंडस्ट्री मेरे लिए नहीं है। हमेशा लगा कि मैं मेहनत करूंगा तो किसी भी फील्ड में आगे बढ़ सकता हूं। सिनेमा मेरे लिए जिंदगी है। यह मेरे लिए ताजी हवा की तरह है। मैंने सोचा कि इसी इंडस्ट्री में अगर एक्टिंग नहीं कर पा रहा हूं तो इसके अलावा क्या कर सकता हूं?
फिर मैंने कभी इंतजार नहीं किया कि कोई आएगा और फिल्म लिखेगा या काम देगा। मैंने मुंबई जाते ही सबसे पहले काम ढूंढा। मुझे लगा कि मैं कास्टिंग अच्छे से कर सकता हूं, क्योंकि मैंने काफी समय तक थिएटर किया, तो कास्टिंग करने लगा।
फिर आप किसी भी फील्ड में जाते हैं तो सबसे जरूरी है कम्युनिकेशन स्किल। आप किस तरह अपने सीनियर से बात कर पाएंगे और सीख पाएंगे। मैं कल ही राकेश बेदी जी के साथ फ्लाइट में बैठा था तो उनसे पूछा कि कितने साल हो गए आपको इंडस्ट्री में?
उन्होंने बताया कि 50 साल। उनकी इतनी बड़ी यात्रा रही है। मुझे उनके साथ आधा घंटा बिताने को मिला और इस दौरान मैंने ऐसी बातें सीखीं, जो कोई क्लास या स्कूल नहीं सिखा सकता। सीखने की इच्छा हमेशा रखनी पड़ती है। सीखते-सीखते आप रास्ता बना लेते हैं।

कास्टिंग डायरेक्टर का काम क्या होता है?
एक तरह की एचआर कंपनी है। हम लोग एक ब्रिज हैं, बाहरी दुनिया और इंडस्ट्री की दुनिया के बीच में। मुझे कई लोग यह पूछते हैं इस बारे में। बहुत से लोग छोटे शहरों से आते हैं, उनके लिए डायरेक्टर के ऑफिस तक जाना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में हम अपने ऑडिशन करते हैं। एक्टर्स को चुनकर डायरेक्टर्स को दिखाते हैं। अगर उनका परफॉर्मेंस अच्छा है तो आजकल आप ओटीटी पर देख रहे होंगे कि कई नए कलाकार आ रहे हैं। क्योंकि कास्टिंग डायरेक्टर उन तक पहुंचने की कोशिश करते रहते हैं।

शिकायतें ये भी होती हैं कि कास्टिंग डायरेक्टर या तो खुद को कास्ट कर लेते हैं या पहचान के लोगों को मौका देते हैं?
शायद इंडस्ट्री में मैं ही इकलौता हूं जो कास्टिंग के बाद एक्टिंग कर पाया है। मैं यह मानना चाहूंगा कि उसका कारण प्रतिभा है। सिर्फ मेरी पहुंच नहीं हैं। कोई भी डायरेक्टर सिर्फ पहचान के चक्कर में रोल नहीं देता। उनके पैसे लगे होते हैं। अगर ऐसे रोल मिल भी गया तो खराब एक्टिंग होती है और उसके बाद दूसरा रोल नहीं मिलेगा। आउटसाइडर को समझना पड़ेगा कि आपको हर रोल में खुद को साबित करना पड़ेगा। यह शिकायतें तो हमेशा रहेंगी। हिंदुस्तान ऐसा देश है जहां 90 प्रतिशत आबादी को लगता है कि वह क्रिकेट खेल सकते हैं और 90 फीसदी को लगता है कि वह एक्टिंग कर सकती है।

नेपोटिज्म पर काफी बहस होती है। आप क्या सोचते हैं? 
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिजनेसमैन के बच्चे बिजनेस करेंगे। नेपोटिज्म में भी सेम है। फिल्मी परिवार वालों को अवसर बहुत मिलते हैं। मगर, ये भी है कि आप जब इंडस्ट्री में बाहर से आए हैं तो आपको उतना समय तो लगेगा ही। मेरे परिवार में किसी ने एक्टिंग के बारे में सोचा नहीं। मगर, आगे जो मेरी पीढ़ी होगी उनके लिए एक आसान रास्ता जरूर होगा। लेकिन, वो एक मुकाम हासिल कर पाएंगे या नहीं...ये उनके टैलेंट पर निर्भर होगा।

क्या आपका रोल किसी ने कभी छीना है?
यह तो हर दिन होता है। पहचान के लोग तो आपका कोई न कोई हक तो छीनते हैं। मगर, इसे लेकर कड़वाहट पालना मन में उसकी जरूरत नहीं है। बहुत सारे और तरीके हैं, जिससे आप अपना टैलेंट दिखा सकते हैं। मैं निर्देशकों के बीच रहा, शायद इसलिए मुझे स्त्री मिली। अगर अमर कौशिक मुझे नहीं जानते, सुदीप शर्मा नहीं जानते कास्टिंग के दौरान तो मुझे स्त्री और पाताल लोक नही मिलती। पहचान काम करती है। मगर, सिर्फ पहचान ही काम नहीं करती है।

अब तो काफी सफल हो चुके हो। लोग पहचानते हैं। मगर, जब लोग अप्रोच नहीं करते थे। कैसे मोटिवेशन मिला?
शुरुआत में आपको कोई पहचानता नहीं है। मेरे साथ और भी कई लड़के लड़कियां थे जिन्हें लगता था कि वे बहुत अच्छे एक्टर हैं। मगर, आप किस तरह अपना रास्ता ढूंढते हैं, वह डिपेंड यह भी करता है कि आप कितने साल तक उस शहर में अपना समय देते हैं। मेरे ऐसे बहुत से दोस्त हैं जो थिएटर करते थे और मुंबई आए मेरे साथ। मगर, आर्थिक तंगी या अभावों के कारण उन्हें मुंबई छोड़ना पड़ा। वो अपने-अपने शहरों में जाकर रहने लगे। ऐसा होता है। यह इंडस्ट्री का एक दुखद पहलू है। इंडस्ट्री के डार्क साइड भी हैं।

कास्टिंग डायरेक्टर से कई शिकायतें होती है... कास्टिंग काउच और शोषण के आरोप लगते हैं। क्या अब यह चीजें बदली हैं?
शोषण हर इंडस्ट्री में होता है। जहां भी पावर है, वहां शोषण है। यह आज से नहीं है। हमसे पहले भी चलता आ रहा है। आपको यह समझना और सीखना है कि आपको शोषण करवाना है या नहीं। या आपको कोई लालच देकर रोल देना चाहता है तो क्या आप उसमें पड़ेंगे? अगर कोई शोषण कर रहा है तो शिकायत करिए। आप किसी के घर मत जाइए। कोई इंसान इतना बड़ा नहीं है कि आपको बैन कर देगा तो आपको काम नहीं मिलेगा। इंडस्ट्री में इतनी भी यूनिटी नहीं है कि एक बैन कर देगा तो आपको काम नहीं मिलेगा।

बॉलीवुड का कौन सा मिथ है जिसे तोड़ना चाहोगे?
आप लोगों का ऑफिस में एसी में काम करते होगे। आठ घंटे की शिफ्ट होती होगी। हम लोग धूप में, बारिश में, जंगल में, सांप-बिच्छू के बीच शूटिंग करते हैं। बहुत गर्मी होती है। इसलिए वह वैनिटी वैन होती है। वह लग्जरी के लिए नहीं होते। वह इसलिए होते हैं, ताकि हमें थोड़ी ठंडक मिल जाए। वह आधे घंटे का ही ब्रेक होता है हमारे पास। उसमें हमें जो जूस पिलाया जाता है, ताकि हम हाइड्रेट रहें। जो छाता पकड़ते हैं, वह इसलिए क्योंकि हमारे चेहरे पर मेकअप होता है। बाहर से देखने पर लगता है कि इनकी जिंदगी बहुत बढ़िया हैं। मगर, ऐसा नहीं है।

'स्त्री 3' कब आ रही है?
स्त्री 3 जल्द आ रही है और मिर्जापुर 3 का टीजर भी आने वाला है।

क्या 'स्त्री' आपके करियर में गेम चेंजर रही है?
बिल्कुल! उसकी वजह से मुझे पहचान मिली। छोटे-छोटे बच्चे जब आज मुझे मेरे नाम से बुलात हैं तो वह मेरे लिए बहुत कमाई हुई पूंजी है। उम्मीद है कि स्त्री 10 तक उसका हिस्सा रहूं, जब तक संभव हो।

स्वतंत्र सिनेमा के बारे में क्या कहेंगे?
अभिषेक बनर्जी: युवाओं के लिए बहुत जरूरी बात है कि जब हम सिनेमा में काम करना चाहते हैं तो हम उसे कमर्शियल सिनेमा से जोड़ते हैं। मगर, हमारे देश में इतने सारे प्रतिभाशाली राइटर-फिल्म मेकर्स हैं, जो इंडिपेंडेंट सिनेमा बनाते हैं। वह एक तरह से आपको वैश्विक पहचान दे सकता है। उसे देखने के लिए ऐसे दर्शक हैं, जो अलग-अलग फेस्टिवल में जाते हैं तो आप वहां से सलेक्ट हो सकते हैं। फिल्मों में काम करने के लिए आप इंडिपेंडेंट फिल्म मेकर्स को ढूंढिए। उनसे जुड़िए। धीरे-धीरे एक मंडली बनाइए।

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