‘बाहुबली’ से ‘धुरंधर’ तक, कभी जरूरत तो कभी मार्केटिंग के चलते दो भाग में बंटी फिल्में; जानिए एक्सपर्ट की राय
Dhurandhar 2: रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर’ को दो भागों में रिलीज किया गया। जहां पहला भाग पिछले साल दिसंबर में रिलीज हुआ था वहीं इसका दूसरा भाग इस साल 19 मार्च को रिलीज हुआ। जानिए बॉलीवुड में कहां से शुरू हुआ दो भाग में फिल्में बनाने का ट्रेंड…
विस्तार
भारतीय सिनेमा में पिछले एक दशक से एक ही कहानी को दो हिस्सों में रिलीज करने का चलन बढ़ रहा है। पहले ऐसा प्रयोग बहुत कम देखने को मिलता था। लेकिन अब बड़े बजट और बड़े विजन वाली फिल्मों के साथ निर्माता यह जोखिम लेने लगे हैं। ऐसी फिल्मों में पहला भाग अक्सर किरदार और कहानी के लिए माहौल तैयार करता है। पहले भाग के अंत में ऐसा मोड़ छोड़ दिया जाता है कि ऑडियंस दूसरे भाग का इंतजार करें। हालांकि, यही इंतजार कई बार दूसरे भाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी बन जाता है।
जब एडिटिंग टेबल पर बने दो भाग
भारतीय सिनेमा में दो भाग में फिल्में रिलीज करने का असली क्रेज अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ ने शुरू किया था। अनुराग ने इस गैंगस्टर फिल्म को जब शूट करके एडिट किया तो यह कुल पांच घंटे की फिल्म हो रही थी पर इतनी लंबी फिल्म थिएटर में दिखाना मुश्किल था। ऐसे में उन्होंने एडिटिंग टेबल पर इसे दो भाग में रिलीज करने का फैसला किया। दोनों ही भागों को ऑडियंस और समीक्षकों ने खूब सराहा।
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?
हालांकि, इस मामले में सबसे ज्यादा लाइमलाइट बटोरने वाली फिल्म ‘बाहुबली’ बनी। फिल्म का पहला भाग कुछ ऐसे मोड पर खत्म हुआ कि दूसरे भाग के लिए दर्शकों का इंतजार कर पाना मुश्किल हो गया। 2015 में रिलीज हुई ‘बाहुबली: द बिगिनिंग’ के अंत में निर्देशक राजामौली ने पूरे देश के लिए एक सवाल छोड़ दिया कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? जब 2017 में ‘बाहुबली: द कन्क्लूजन’ इस सवाल का जवाब लेकर लौटी तो फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई की।
‘केजीएफ 2’ ने तोड़े बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड
कुछ ऐसा ही असर देखने को मिला ‘केजीएफ 1’ और ‘केजीएफ 2’ में भी। निर्देशक प्रशांत नील की इस फिल्म ने पहले भाग में रॉकी नाम के किरदार की दुनिया बनाई। लेकिन असली टकराव और संघर्ष दूसरे भाग के लिए बचाकर रखा गया। नतीजा यह हुआ कि दूसरा भाग रिलीज होते ही ऐसा हिट हुआ कि इसने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसने दुनियाभर में लगभग 1200 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की। यह 1000 करोड़ क्लब में शामिल होने वाली पहली कन्नड फिल्म भी बनी। इसी तरह अल्लू अर्जुन की ‘पुष्पा’, सनी देओल की ‘गदर’ और श्रद्धा कपूर की ‘स्त्री’ भी दो पार्ट में रिलीज हुईं और सफल रहीं।
हर बार काम नहीं करता यह फार्मूला
हालांकि, हर फिल्म के साथ यह जादू दोहराना आसान नहीं होता। निर्देशक मणिरत्नम ने अपनी ऐतिहासिक फिल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन’ को भी दो हिस्सों में रिलीज करने की योजना बनाई। चोल साम्राज्य पर बनी इस फिल्म का पहला भाग तो पसंद किया गया पर दूसरा भाग प्रभावी नहीं रहा। इसी तरह ‘सालार’ और ‘देवरा’ के रिलीज होने के बाद इनके दूसरे पार्ट पर भी सवाल उठे। ऋतिक रोशन की ‘वॉर 2’ भी उतनी सफल नहीं रही।
‘कई बार बिजनेस एंगल भी होता है’
‘आजकल फिल्मों में पार्ट 1, पार्ट 2 या ट्रिलॉजी बनाने का ट्रेंड बढ़ा है। लेकिन हर फिल्म का दूसरा भाग सफल हो यह जरूरी नहीं है। इस बात से बहुत फर्क पड़ता है कि मेकर्स ने कहानी को शुरुआत से ही कई हिस्सों में प्लान किया था या फिर पहले भाग की सफलता को देखते हुए पार्ट 2 बनाने का फैसला किया गया।
अगर कहानी पहले से दो हिस्सों में सोची गई हो, जैसे ‘बाहुबली 1’ और ‘बाहुबली 2’, तो ऑडियंस उससे जुड़ती है और अगले भाग का इंतजार भी करती है। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में इसके पीछे एक बिजनेस एंगल भी होता है। जब किसी कहानी को दो या तीन हिस्सों में बनाया जाता है तो उससे कमाई की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। फिल्म की मार्केटिंग भी लंबे समय तक चलती है और धीरे-धीरे एक पूरी फ्रेंचाइज बन जाती है।
इसके चलते भी कई बार पार्ट 2 की घोषणा की जाती है और यहां फिल्म फ्लॉप होने का रिस्क होता है। ‘सालार’ और ‘देवरा’ जैसी फिल्मों के साथ भी ऐसा ही हुआ। दूसरे भाग की घोषणा तो हुई, लेकिन अब तक कोई बड़ा अपडेट सामने नहीं आया है।’
- सुमित कडेल, ट्रेड एनालिस्ट
‘दो पार्ट बनाना कोई ट्रेंड नहीं’
‘जब मैंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानी अनुराग कश्यप को पहली बार पिच की थी, तब मैंने ही उन्हें इसे दो पार्ट में सुनाया था। उस समय यह साफ नहीं था कि फिल्म एक ही होगी या दो हिस्सों में बनेगी। लेकिन जब अनुराग सर ने कहा कि इस पर ठीक से रिसर्च करो और विस्तार से लिखो, तब असली कहानी खुलनी शुरू हुई।
रिसर्च और राइटिंग के दौरान हमें महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक गैंगस्टर या गैंगवॉर स्टोरी नहीं बल्कि कई पीढ़ियों में फैली एक लंबी गाथा है। इसमें समय के साथ बदलते रिश्ते हैं। सत्ता की लड़ाई है। कई घटनाएं हैं जो मिलकर एक बड़ी दुनिया बनाते हैं। जैसे जैसे हम इस पर काम करते गए, कहानी फैलती चली गई।
धीरे धीरे स्क्रिप्ट इतनी बड़ी हो गई कि वह लगभग 700 पन्नों तक पहुंच गई। अगर उस पूरी स्क्रिप्ट को ज्यों का त्यों फिल्माया जाता, तो फिल्म की लंबाई करीब नौ या साढ़े नौ घंटे तक पहुंच सकती थी। जाहिर है थिएटर में इतनी लंबी फिल्म दिखाना संभव नहीं था।
ऐसे में हमने बाद में काफी एडिटिंग और री स्ट्रक्चरिंग की। आखिरकार इसे लगभग साढ़े पांच घंटे की फिल्म में ढाला गया। फिर इसे दो हिस्सों में रिलीज किया गया।
असल बात यह है कि दो पार्ट बनाना कोई ट्रेंड नहीं है। अगर फिल्ममेकर का विजन साफ हो और कहानी इतनी बड़ी हो कि उसे दो हिस्सों में बताना जरूरी हो, तभी उसे दो भागों में बनाया जाता है। यह पूरी तरह कहानी पर निर्भर करता है।'
जीशान कादरी, लेखकर-अभिनेता