Film Review : अजय का ढीला वन मैन शो बनी 'शिवाय'
फिल्म समीक्षा - शिवाय
निर्माता-निर्देशकः अजय देवगन
सितारेः अजय देवगन, एरिका कार, सायशा सैगल, एबिगली एमेस, वीर दास
रेटिंग **
यह फिल्म अजय देवगन का ग्लोबल सपना है। विदेश में भारतीय योग और अध्यात्म के साथ शिव के संगीतमय नाम शिवाय की पैकेजिंग-लेबलिंग। यह विश्व बाजार के लिए केंद्रित उत्पाद है। सिर्फ अजय के फैन्स इससे संतुष्ट हो सकते हैं। सिनेमा के कद्रदान नहीं। यहां हीरो मलंग है। कैलाश पर्वत पर रहता है। चिलम खींचता है, नाम है शिवाय। बुल्गारिया से आई गोरी सुंदरी उससे पूछती है कि उसके पास शिव जैसा क्या है? उनके जैसे बाल, उनके जैसा नाग ? हीरो जिस्म पर बने टैटूओं में उसे दोनों के दर्शन कराता है। फिदा सुंदरी शिवाय में सब पा जाती है। शिवाय से उसे बेटी होती है जिसे छोड़ कर वह अपने देश लौट जाती है।
पिता बेटी को अकेले पालता है और कुछ देर में आप पाते हैं कि आध्यात्मिक रंग-रोगन को धो-पोंछ कर शिवाय ने हॉलीवुड फिल्म टेकन (2008) का ट्रैक पकड़ लिया है।
फिल्म की लंबाई असहज
बेटी की जिद पर उसे लेकर पिता मां को ढूंढने बुल्गारिया पहुंचता है। मां की तलाश शुरू होती है और बेटी का अपहरण हो जाता है। हीरो का अब एक ही लक्ष्य है अपहरणकर्ताओं के चंगुल से अपनी बेटी को छुड़ाना। इसके बाद कार से कार का पीछा करने के लंबे सीन हैं। पुलिस के साथ हीरो की मारधाड़ है। अपराधियों की तलाश और उनके अड्डों की तबाही है। किराए के गुंडों की धुनाई है। कारों का एक-दूसरे से टकराना और हवा में उड़ना है। मशीनगनों-पिस्तौलों से पल-पल चलती सैकड़ों गोलियों की धांय-धांय की आवाज है। फिल्म एकदम से यूरोप में मानव तस्करी के धंधे को केंद्र में लाती है और अनजाने में हीरो जाने कितनी लड़कियों का उद्धार करता है।
बुल्गारियाई मीडिया कहता है कि जो काम बरसों से उसकी पुलिस न कर सकी उसे कुछ घंटों में एक भारतीय ने कर दिया। वह अपराधी कैसे हुआ? इन बातों के साथ फिल्म में बर्फीले पहाड़ों और कैमरावर्क की खूबसूरती भी है। मगर इनका मजा फिल्म की लंबाई खत्म कर देती है। जो तीन घंटे से थोड़ी ही कम है जबकि कहानी के ऐक्शन और थ्रिल के लिए दो घंटे बहुत हैं। कई बार लगता है कि कैमरा घूमता गया और एडिटिंग टेबल पर काट-छांट नहीं हुई। संपादन में निर्देशक अजय देवगन का मोह नुकसानदायक रहा। गीत-संगीत भी ऐसा नहीं है कि कहें उसकी वजह से लंबाई बढ़ी।
फिल्म का क्लाइमेक्स अस्पष्ट है
आम तौर पर आपत्तिजनक शब्द फिल्मों में म्यूट (मौन) कराए जाते हैं। यहां 'हिंदुस्तान' म्यूट है। संभवतः ऐसा पहली बार हुआ। इंडियन एंबेसी का अधिकारी नायक की बेटी से पूछता है अगर वह मां को ढूंढ निकालेगा तो उसे क्या मिलेगा? यूरोपीय-सी दिखने वाली बेटी उसे चॉकलेट देती है। तब अधिकारी कहता है कि विश्वास हो गया कि यह हिंदुस्तानी है क्योंकि वहीं के लोग काम कराने को घूस देते हैं। शिवाय अजय का वन-मैन-शो है। जिसमें ऐक्टर के रूप में ही वह अपनी प्रतिष्ठा से न्याय कर पाए लेकिन निर्देशक के रूप में नहीं। उनके अभिनय में संवेदना है मगर कहानी के फैलाव ने उसे ढीला कर दिया।
ओल्गा बनीं एरिका कार के किरदार समेत फिल्म का क्लाइमेक्स अस्पष्ट है कि अंत में क्या हुआ? अकेले देश लौट रहे पिता पर बेटी क्यों नाराज हुई? क्या उसने पिता को बुल्गारिया में रोक लिया? क्या नायक-नायिका का पुनर्मिलन हो गया? नायक से इजहार-ए-मोहब्बत करने वाली एक अन्य युवती का क्या हुआ? उस युवती से प्यार करने वाले एक अन्य युवक का क्या हुआ? दर्शक बेचारगी में यही सोचता बाहर आता है कि शायद सीक्वल में सवालों के जवाब मिलें। एरिका कार साधारण हैं। जबकि सायशा सैगल का डेब्यू खास उम्मीदें नहीं जगाता। वीर दास छोटी-सी भूमिका में मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
