सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla

Vinay Shukla Interview: मिथुन की बतौर कमर्शियल हीरो इस पहली फिल्म की कॉपी गायब, निर्देशक ने सुनाई पूरी कहानी

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 02 Oct 2024 01:44 PM IST
विज्ञापन
special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ला - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

फुटपाथ से उठकर हिंदी सिनेमा के आसमान पर छा जाने वाले आखिरी सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती को जब से केंद्र सरकार ने सिनेमा का सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने का एलान किया है, उनको निर्देशित कर चुके फिल्म निर्देशक काफी खुश हैं। लेखक-निर्देशक विनय शुक्ल की पहली फिल्म 'समीरा' भी मिथुन चक्रवर्ती के साथ ही बनी थी। मिथुन की भी ये पहली कमर्शियल मेन लीड वाली फिल्म रही। लेकिन, दुख इस बात का है कि इस फिल्म की कहीं कोई कॉपी अब उपलब्ध नहीं है। इस फिल्म पर और अपने करियर में आए महत्वपूर्ण लोगों पर विनय शुक्ला ने ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से ये लंबी बातचीत कोरोना संक्रमण काल में लॉकडाउन के दौरान की थी। ये बातचीत पहली बार ‘अमर उजाला डॉट कॉम’ पर 31 अक्तूबर 2020 को प्रकाशित हुई।

Trending Videos


सिनेमा के शुरूआती आकर्षण की आपकी यादें क्या हैं?
मैं बचपन में चाइल्ड रेडियो आर्टिस्ट था। स्कूल वगैरह पास करने के बाद जब मैं कॉलेज में आया तो मैं अभिनेता बनना चाह रहा था। हर आदमी की तरह मुझे भी अभिनय का ग्लैमर था। पिताजी राम नारायण शुक्ल रियासत के जमाने में किशनगढ़ के दीवान थे। बाद में वह राजस्थान की प्रशासनिक सेवा में आ गए। मैं कोई 17 -18  साल का था। खूब थिएटर करता था। अभिनय की तारीफ होती थी। मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय या पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट जाने की तैयारी में था पर पिताजी मेरे फैसले से खुश नहीं थे। लेकिन, उन्होंने मुझे रोका नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

और, सिनेमा के शुरुआती शौक के दिनों में उन्होंने डांट फटकार नहीं लगाई?
हम स्कूल से भागकर भी फिल्में देखते थे। घर के पास ही एक थिएटर था जिसके मालिक का बेटा मेरा दोस्त था। उनके प्राइवेट बॉक्स में खूब फिल्में देखते थे। सिनेमा का शौक ऐसा कि जब 'मुगल-ए-आजम' रिलीज हुई 5 अगस्त 1960 को तो हम दो-तीन लोग सुबह नौ साढ़े नौ बजे ही पहुंच गए। हमने सोचा कि जल्दी पहुंचेंगे तो टिकट आसानी से मिल जाएगी, वहां पहुंचे तो देखा कि हमसे भी होशियार लोग वहां पहले से मौजूद थे। सिनेमा के इस शौक की वजह से बाबूजी से मुझे मार भी खानी पड़ी।

फिर, उसी दौर में आपने ‘साहिब, बीबी और गुलाम’ देखी जिसने आपका नजरिया बदल दिया?
उस समय एक अजीब सा दौर था कि मैं हर रोज फिल्म देखने चला जाता था। मैं कोई सी भी फिल्म देखता वही मुझे अच्छी लगती थी। मुझे बस फिल्म देखनी होती थी। उस समय का एक किस्सा है, वहीं से मुझे पता चला कि मुझे किस तरह की फिल्में पसंद हैं। मेरे दोस्तों ने 'साहिब बीवी और गुलाम' फिल्म देख ली थी और मैं उसे देखने जा रहा था तो सबने मना किया कि देखना मत, बकवास फिल्म है। लेकिन, मीना कुमारी को मैं बहुत पसंद करता था। मैं फिल्म देखने गया और मुझे वह बहुत पसंद आई। मैंने वह फिल्म दोबारा जाकर भी देखी। उन्हीं दिनों मेरा फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला हो गया था।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

तो गुरुदत्त ने आपको काफी प्रभावित किया?
मुझे लगता है कि मुंबई के जितने भी फिल्म निर्देशक रहे, उनमें से सबसे ज्यादा जिस निर्देशक ने मेरे दिल को छुआ, वह गुरुदत्त ही रहे। गुरुदत्त, बिमल रॉय और के. आसिफ। मैं कल ही अपनी बड़ी बेटी मंदिरा से बात कर रहा था कि अगर कोई आदमी अपनी जिंदगी में 'मुगल-ए-आजम' जैसी फिल्म बना लेता है तो उसके बाद वह हिमालय जा सकता है। उसे फिर पीछे मुड़ कर देखने की कोई जरूरत नहीं। गुरुदत्त के लिए मैं कहना चाहूंगा कि उनके अंदर एक रूहानी ताकत थी। विजय आनंद ने भी मुझे प्रभावित किया।

राज कपूर ने प्रभावित नहीं किया आपको?
फिल्म इंस्टीट्यूट में प्रवेश से पहले इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरा पसंदीदा निर्देशक कौन है? तो मैंने पलक झपकते ही जवाब दिया ऋषिकेश मुखर्जी और विजय आनंद। गुरुदत्त का शायद नाम नहीं लिया मैंने। हां, राज कपूर का नाम नहीं लिया यह मुझे अच्छे से याद है। राज कपूर सिर्फ दर्शकों के लिए सिनेमा बनाते रहे। ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी फिल्मों में कुछ कहने की कोशिश की। बिमल रॉय भी कुछ कहना चाहते थे। विजय आनंद की फिल्में देखी मैंने, 'गाइड' मुझे बहुत पसंद आई। लेकिन, मुझे राज कपूर की कभी कोई फिल्म पसंद ही नहीं आई।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

विश्व सिनेमा से आपका परिचय कैसे हुआ और क्या असर डाला इसने आपके लेखन और निर्देशन पर?
पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट के अहाते में ही उस दिनों नेशनल फिल्म आर्काइव में पी के नैयर साहब हर रोज फिल्म देखते थे। मैं और मेरे साथ कई और लोग भी थे जो रोज रात को फिल्में देखते थे, सुबह भी देखते थे। वह सिनेमा देखकर मुझे लगा कि हम लोग तो कचरा बनाते हैं। यहां तक कि फिर मुझे ऋषि दा भी बहुत औसत फिल्मकार लगने लगे। मुझे लगने लगा कि उनकी सिनेमाई भाषा का स्तर बहुत ही औसत था। आप ये देखिए कि जिन फिल्मों से प्रेरित होकर मैं फिल्म इंस्टीट्यूट पहुंचा, वही फिल्में अब मुझे काटने को दौड़ रही थीं।

सिनेमा को अपनाने से पहले कोई दूसरा पेशा नहीं अपनाया आपने?
जब मैं रेडियो पर चाइल्ड आर्टिस्ट था तो मेरे मन में कहीं यह भी था कि मैं एक आर्किटेक्ट बन जाऊं। देखिए कि बच्चा किस तरह अपने माता-पिता से प्रभावित होता है। जब मेरे पिताजी ने मुझसे पूछा कि क्या बनना चाहते हो? तो यह तो मैंने बताया नहीं कि मैं एक फिल्म निर्देशक या फिर अभिनेता बनना चाहता हूं। मैंने बताया कि मैं एक आर्किटेक्ट बनना चाहता हूं। इस पर उन्होंने मुझसे अचानक से पूछ लिया कि तुम तो गणित में कमजोर हो फिर आर्किटेक्ट कैसे बन पाओगे? तो मेरे दिमाग में बैठ गया कि मैं नहीं बन सकता। मैं पेंटिंग बहुत अच्छी करता था। अब भी कर लेता हूं मामूली सी। लिखता भी था। मैं सोचता था कि मैं फिल्म इंस्टीट्यूट जाऊं तो एक फिल्म निर्देशक की हैसियत से जाऊं, अभिनेता की नहीं। पहली पसंद निर्देशक और दूसरी अभिनेता। इसका एक कारण यह था कि मैं समझता था कि एक निर्देशक बनने से मेरा लेखन, पेंटिंग, अभिनय और आर्किटेक्ट, सब बनने के सपने पूरे हो जाएंगे।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

तो फिर किस तरह का सिनेमा रास आया आपको?
फिल्म इंस्टीट्यूट की रैगिंग में मुझसे पूछा गया कि मैं यहां क्यों आया हूं? मैंने कहा कि मुझे सीखना है कि फिल्म कैसे बनाते हैं। मुझसे पूछा गया कि तुम किस तरह की फिल्में बनाना चाहते हो? मुझे मेरा जवाब अब भी याद है। मैंने कहा था एब्स्ट्रेक्ट। उन्होंने पूछा कि एब्स्ट्रेक्ट से क्या मतलब है? मुझे अब भी हैरानी होती है कि मैंने अजीब सा जवाब दिया था। मैंने कहा कि बिना अभिनेता की फिल्म हो, पत्ते हिल रहे हों, पहाड़ हों, जंगल हों। इस तरह की फिल्में बनाना चाहता हूं मैं।

जो आपकी रैगिंग ले रहे थे, उनका नाम याद है आपको?
जिन्होंने मुझसे यह सवाल पूछा था उनका मुझे नाम याद है। विष्णु माथुर नाम था उनका। उन्होंने एक दो फिल्में भी बनाई हैं लेकिन कामयाब नहीं हो पाए। निर्देशन में ही थे और सीनियर थे। खैर, उसके बाद फिल्म इंस्टीट्यूट में मेरी ट्रेनिंग हुई और यह सभी निर्देशक मुझे कमजोर लगने लगे। मैंने सोचा कि यह तो गड़बड़ है। फिर मैं सोचने लगा था कि मैं ऐसा कुछ करूंगा, या फिर वैसा कुछ करूंगा या ऐसा कुछ करूंगा। फिर यहां मैं मुंबई आया। मैंने कभी फिल्म इंडस्ट्री में जैसे सब करते हैं, वैसे दाखिल होने की कोशिश नहीं की। मुझे लगता है कि यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। मुझे चाहिए था कि मैं उस समय अगर किसी कमर्शियल निर्देशक के साथ जुड़ जाता और मैं यहां के तौर तरीकों को समझने की कोशिश करता तो मेरे लिए बेहतर रहता।

पहला ब्रेक आपको हिंदी सिनेमा में कैसे मिला?
मेरा पहला ब्रेक अगर देखा जाए तो मेरे बहुत अच्छे दोस्त सिनेमैटोग्राफर के के महाजन ने दिलाया। मेरे सीनियर थे और उन्होंने अपना नाम कर लिया था। के के महाजन ने मृणाल सेन की सारी फिल्में शूट कीं। उन्होंने बासु चटर्जी की बहुत सारी फिल्में कीं और उन्होंने रमेश सिप्पी का सीरियल 'बुनियाद' शूट किया। उन्हें सिनेमैटोग्राफी के लिए चार नेशनल अवॉर्ड भी मिले। वह ऑफबीट भी थे और कमर्शियल फिल्में भी कीं। मुझे पहला ब्रेक उन्होंने एक सहायक निर्देशक के रूप में दिलाया। ये फिल्म थी 'परिणय'। रोमेश शर्मा और शबाना आजमी, दोनों ही फिल्म इंस्टीट्यूट से निकले कलाकार इसमें लीड रोल कर रहे थे।

और, आपने अपनी पहली ही फिल्म के लेखन में लंबी लाइन खींच दी?
इस बारे में तो मैं कुछ नहीं कहना चाहता। मूल रूप से इस फिल्म की कहानी लिख रहे थे हरेन मेहता। उनके साथ एक पारसी लेखक भी थे। फिल्म को पहले तो गुलजार साहब को ही लिखना था। सेट पर हुआ ये कि इसकी शूटिंग एक गांव में हो रही थी। शबाना और रोमेश दोनों फिल्म इंस्टीट्यूट में गोल्ड मेडलिस्ट थे। दोनों समझदार थे। उन्होंने जब संवाद पढ़े तो उन्होंने फिल्म के निर्देशक कांतिलाल से कहा कि कांति भाई, यह संवाद तो अच्छे नहीं हैं। इस पर कांति भाई ने कहा कि आप लोग अपने आप इनमें थोड़ा सुधार कर लो। पता नहीं, मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि किस्मत खुद ही इशारा करती है आपकी तरफ। तो शबाना ने कहा कि विनय से लिखवा दीजिए। हो ऐसा रहा था कि मैं रोज सेट पर जाता था और जो संवाद पसंद नहीं आते थे उन्हें मैं नए सिरे से लिख देता था। तीसरे या चौथे दिन शबाना ने कांति भाई से कहा कि आप विनय से क्यों नहीं कह देते कि वह एक बार में ही सारे संवाद लिख दें। इस तरह से मुझे वह लिखने का मौका मिला। मेरा उस फिल्म 'परिणय' के लिए जो क्रेडिट है, वह एडिशनल है। सहायक निर्देशक, पटकथा और संवाद लेखक।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल की फिल्म का सीन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

मतलब कि काम पहली बार में ही आपके पास चलकर आ गया!
पहल अब भी मैं कम ही करता हूं। मेरे अंदर वह है ही नहीं। अपने आप काम आ जाए तो ठीक है। कोशिश नहीं करता मैं। मेरी बस एक ही कोशिश थी और वह थी के के महाजन। वह उस समय बहुत फिल्में कर रहा था। मेरी जैसे ही एक फिल्म खत्म होती, मैं उससे कहता था कि काम दिला दे। हम लोगों की बातें तू तड़ाक से ही होती थीं। उन दिनों एक फिल्म बन रही थी 'मुक्ति'। शशि कपूर, संजीव कुमार और विद्या सिन्हा। उसे बना रहे थे राज तिलक। बी आर चोपड़ा के दामाद। के के ने उस फिल्म के लिए मेरा नाम दे दिया। मैं जाकर राज तिलक से मिला और उन्होंने मुझे रख लिया। इस फिल्म 'मुक्ति' के दौरान हुआ ये कि उसने मेरी जिंदगी का कोर्स बदल दिया। प्राण मेहरा उस फिल्म के वीडियो संपादक थे। वह फिल्मों के स्टार एडीटर थे। प्राण साहब जब फिल्में संपादित करते थे तो सहायकों को इजाजत नहीं थी कि वह वहां बैठें। मैं एक तरफ खड़ा हुआ था।

हां, ये किस्सा काफी मशहूर रहा है हिंदी सिनेमा में, हम भी जानना चाहेंगे?
राज तिलक और प्राण साहब बैठे हुए थे। उस वक्त स्टीनबैक (रील पर फिल्म एडिट करने की एक मशीन जिसका आकार बहुत बड़ा होता था) मुंबई में दो तीन लोगों के ही पास था। बॉम्बे लैब में प्राण साहब एडिट कर रहे थे। उन्होंने एक जगह जैसे ही कट लगाया मेरा बेसाख्ता रिएक्शन निकला कि आप यहां से नहीं काट सकते। प्राण साहब ने अपनी ऐनक नीचे की। भौहों और चश्मे के बीच बनी जगह से मेरी तरफ झांका और डायरेक्टर राज तिलक से पूछा, ये कौन है? राज तिलक ने हाथ जोड़कर कहा कि प्राण साब जाने दीजिए, फिल्म इंस्टीट्यूट से है, माफ कर दीजिए। लेकिन प्राण साब ने मुझसे पूछा कि मैं यहां से क्यों नहीं काट सकता? तो मैंने कहा कि वह जो आठ फ्रेम हैं (फिल्म के एक सेकेंड में ठहरे हुए चित्रों के 24 फ्रेम होते हैं) तो अगर आपने काटा तो गाने के बोल 'कदमों के निशान', वो इसमें आ जाएगा। मेरे मुंह से आठ फ्रेम ही निकला था फिर उन्होंने फ्रेम गिनना शुरु कर दिया। मैंने मन ही मन सोचा कि विनय शुक्ला आज तो तू गया। लेकिन, ठीक आठ फ्रेम बाद एंट्री हो गई कदमों के निशान की। इसके बाद न तो उन्होंने मेरी तरफ देखा और न ही मुझसे बात की।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
साहिर लुधियानवी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिर तो प्राण मेहरा आपको चाहने लगे होंगे?
हां, कुछ कुछ। तो उस दिन एडिटिंग खत्म होने के बाद प्राण मेहरा ने मुझसे पूछा कि कहां रहते हो? मैंने कहा कि सांताक्रुज। कैसे जाते हो? मैंने कहा बस से। उन्होंने पूछा कि सांताक्रुज में कहां रहते हो? मैंने कहा कि नॉर्थ एवेन्यू। वह बोले कि नॉर्थ एवेन्यू में तो मैं भी रहता हूं। चलो मेरे साथ। इसके बाद ऐसा हो गया था कि जब भी प्राण साहब एडिटिंग के लिए आते थे तो मैं उनके साथ घर जाता था। एक दिन वह मुझसे कहने लगे कि भाई मेरी एक तमन्ना है कि मैं एक फिल्म का निर्माण करूं और उस फिल्म को तुम निर्देशित करो। किसी को निर्देशक बनाने की ऐसी बात कौन सोच सकता है भला! लेकिन, उन्होंने कहा कि उन्हें एक पार्टनर चाहिए। मैंने के के से बात की। के के ने कहा कि ठीक है। तू निर्देशित कर रहा है तो मैं निर्माता बन जाता हूं। प्राण मेहरा ने मेरी पहली फिल्म भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में दिखाई थी दिल्ली में, नाम था 'समीरा' इस फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती थे, शबाना थीं, परीक्षित साहनी थे और अमोल पालेकर थे। यह फिल्म कभी रिलीज नहीं हुई। उसकी भी एक कहानी है।

इस फिल्म के गाने साहिर लुधियानवी लिखने वाले थे?
हां, उस फिल्म के गाने साहिर साहब लिखने वाले थे। साहिर साहब प्राण साहब के बहुत अच्छे दोस्त रहे। साहिर साहब से जब फिल्म के गाने लिखने की बात हुई तो उन्होंने प्राण मेहरा से कहा कि विनय को मेरे घर भेज दें। वह जुहू में ही रहते थे। ‘परछाइयां’ नाम की इमारत में वह टॉप फ्लोर पर रहते थे। मैंने वहां पहुंचकर कहानी सुनानी शुरू की। मैंने अपनी पूरी पटकथा शुरू की और खत्म भी कर दी। मेरे चुप होते ही वह बोले कि खड़ा हो जा। मैं सोच रहा था कि पता नहीं क्या गलती हो गई मुझसे? मैं खड़ा हो गया। वह भी खड़े हो गए और फिर मेरी झप्पी ले ली। और, बोले कि तू यहां क्या कोई रिवॉल्यूशन करने आया है? मैं चुप रहा। उसके बाद दुर्भाग्य से हुआ ये कि साहिर साहब बीमार पड़ गए। हार्ट अटैक आ गया उनको। ब्रीच कैंडी अस्पताल में उन्होंने मुझे मिलने बुलाया और कहा कि विनय, अब मैं तेरे गाने नहीं लिख पाऊंगा। मुझे हर गाना लिखते वक्त ऐसा लगता है कि यह गाना मैं नहीं लिख पाऊंगा। फिर, कोई कोई गाने में मैं महीना भर भी ले लेता हूं, कोई कोई गाना मैं 10 दिन में लिखता हूं और किसी गाने को मैं 10 मिनट में भी लिख देता हूं। इसलिए मैं गारंटी नहीं ले सकता कि तेरे गाने लिखने में मुझे कितना वक्त लगेगा? साहिर साब की ये बात कि हर गीत लिखने से पहले उन्हें ऐसा लगता था कि वह उस गाने को नहीं लिख पाएंगे, बहुत बड़ा सबक है। हर एक अच्छा अभिनेता मंच पर जाने से पहले नर्वस जरूर होता है। वह चाहे कितना भी आत्मविश्वास से भरा हुआ दिखे। 

और, फिल्म का क्या हुआ फिर?
वह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई। इफ्फी में दिखाई गई थी। पता नहीं, क्या कारण रहा होगा कि नेशनल आर्काइव वालों ने भी उसकी कॉपी नहीं मांगी जबकि यह तो अनिवार्य है। फिल्म के निर्माताओं के आपस में झगड़े हो गए थे और इस तरह से चक्कर चल रहा था। इसलिए, उस फिल्म की अब न तो कोई कॉपी है और न ही कहीं कुछ और ही है। खत्म हो गई वह फिल्म।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
हम पांच - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

‘हम पांच’ का किस्सा क्या है, उसके संवाद तो डॉ. राही मासूम रजा लिख रहे थे?
उन दिनों मेरे पास काम कुछ नहीं था। मैं शबाना आजमी से मिलने पहुंचा था जानकी कुटीर। वहां पहले से ही बोनी कपूर मौजूद थे। 'हम पांच' फिल्म बन रही थी। बोनी ने कहा कि मैं अपने पिताजी के प्रोडक्शन हाउस में एक फिल्म बनाने जा रहा हूं। यह मेरी पहली ही फिल्म होगी और मैं चाहता हूं कि आप इस फिल्म में मेरी मदद करें। मेरी फिल्म के निर्देशक बापू हैं जो दक्षिण भारत से हैं। उन्हें हिंदी नहीं आती। मैं चाहता हूं कि आप इसमें मेरी मदद करें। मुझे तो काम चाहिए था। मैंने फौरन हां कर दी। हां, ये सच है कि 'हम पांच' के संवाद राही मासूम रजा साहब लिख रहे थे। दो-तीन ऐसे लेखक रहे जिनके साथ मेरे बड़े भाई और पिता जैसे संबंध रहे। एक थे कमलेश्वर जी, एक थे राही साहब। फिल्म के निर्देशक बापू ने जब फिल्म ‘हम पांच’ के संवाद सुने तो उन्होंने बोनी कपूर से कहा, अगर फिल्म के संवाद ये रहेंगे तो मैं यह फिल्म नहीं करूंगा। 10 दिन बाद ही फिल्म की शूटिंग शुरू होनी थी। बापू मुझे जानते नहीं थे, फिर भी उन्होंने कहा कि अगर विनय इस फिल्म के संवाद लिखेगा तो वह फिल्म कर लेंगे।

बोनी ने शायद बापू को आपके बारे में पहले ही बता दिया होगा?
नहीं, बापू की बात पर बोनी ने कहा कि बापू साहब, एक काम करते हैं, फिल्म का पहला शेड्यूल विनय से लिखवा लेते हैं और बाकी का काम बाद में ठीक-ठाक कर लेंगे। 10 दिन का ही शेड्यूल था। मैंने उसके संवाद लिख दिए। मुझे कभी यह लगा ही नहीं कि संवाद लिखना भी कोई काम है। हो सकता है कि मैं रेडियो पर एक चाइल्ड आर्टिस्ट था तो उसकी वजह से संवाद कैसे होने चाहिए, उसकी एक आदत सी पड़ गई और समझ हो गई थी। इसका एक कारण ये भी था कि मेरे माता-पिता उत्तर प्रदेश से थे। मेरे पिताजी जसवंतनगर, इटावा से और मेरी माता जी फिरोजाबाद के पास एक गांव से थीं। एक मेरे मामा थे जो ललितपुर में रहते थे। मेरा जन्म भी वहीं हुआ। मेरी माता जी ब्रज बोलती थीं तो जबान में एक रवानी थी। मेरी पढ़ाई लिखाई अंग्रेजी माध्यम में हुई। घर में लेकिन पूरी तरह से हिंदी का माहौल था। मेरे लिखे संवाद बापू को इतने पसंद आए कि उन्होंने कहा कि पूरी फिल्म मैं ही लिख दूं। जब फिल्म पूरी हुई तो राही साहब ने कह दिया कि यह संवाद उन्होंने तो लिखे नहीं हैं। इसलिए, उस फिल्म के संवाद लेखन में एडिशनल तौर पर मेरा नाम आ गया। उसकी पटकथा में भी मेरा नाम रहा।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
शबाना आजमी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

मिथुन चक्रवर्ती से आपकी दोस्ती इसी फिल्म से शुरू हुई, बताते हैं बड़ा भरोसा रहा उनका आपके ऊपर?
मिथुन मेरे साथ मेरी फिल्म में काम कर चुका था। हुआ यह कि फिल्म ‘हम पांच’ में संजीव कुमार, नसीर, राज बब्बर, शबाना सब दिग्गज लोग थे। मिथुन उस वक्त बी ग्रेड की फिल्मों में आ रहा था हीरो बनकर और बहुत लोकप्रिय भी था। उसने कहा कि मैं इस फिल्म में कोई किरदार क्यों करूं जब इसमें पहले से ही इतने बड़े-बड़े लोग हैं। मेरा क्या काम रहेगा इसमें? उसने बोनी से कहा कि विनय दा को भेज दो। उस समय वह मुझे विनय दा कहता था। उसने मुझे नाश्ते पर बुला लिया। मैं गया और उसने मुझसे सिर्फ एक ही बात पूछी। विनय दा, मुझे यह फिल्म क्यों करनी चाहिए? और मैंने इसका जवाब सिर्फ एक ही लाइन में दे दिया। मैंने कहा कि सिर्फ आपका ही किरदार इस फिल्म में ऐसा है जो परिवर्तन के दौर से गुजरता है। उसके बाद उसने कहा कि अब मुझे कुछ नहीं सुनना। अब आप कुछ बताओ ही मत। इसके बाद फिल्म हो गई। 'हम पांच' के बाद मिथुन 'बॉक्सर' बनाने वाला था। उसने कहा कि विनय दा, आप इसके संवाद लिखो। उसने मेरी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत तारीफ की। मेरे राइटिंग करियर को लांच करने में मिथुन चक्रवर्ती का सबसे बड़ा हाथ रहा है।

अब शबाना आजमी की भी कुछ बात करते हैं... 
शबाना के बारे में तो क्या ही मैं बोलूं। 48 साल की दोस्ती है हमारी। हर आदमी की जिंदगी में दो-तीन दोस्त ऐसे होते हैं जिन्हें आप अपने से अलग नहीं कर सकते। उनमें शबाना है। मैंने एक फिल्म 'विरासत' लिखी थी। अनिल कपूर वाली। उस वक्त मुशीर रियाज ने मुझसे कहा है कि विनय जी, अगली फिल्म हम आपके साथ करते हैं। उन्होंने कहा कि कहानी बताइए। मैंने एक कहानी बता दी जो उन्हें पसंद आ गई। उन्होंने कहा तो इसके लिए कौन चाहिए? मैंने कहा कि तब्बू को ले लेते हैं। तब्बू उस समय फिल्म की डबिंग कर रही थीं। हम पहुंच गए और उनसे बात की। उन्होंने कहानी के लिए हां कर दी। उसी वक्त मेरी मुलाकात शबाना से हुई तो शबाना ने मुझसे पूछा कि क्या कर रहे हो? मैंने कहा कि फिल्म बना रहा हूं। क्या फिल्म बना रहा हो? कहानी सुनाओ? मैंने उसकी कहानी सुना दी। शबाना ने कहा कि यह तुम तो नहीं हो। तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा कि तुम कोई मदद तो करती नहीं हो। उल्टा तुमने मेरा बलून बर्स्ट कर दिया। शबाना बोली कि तुमने मेरे लिए कभी कुछ लिखा ही नहीं। तुम कुछ लिखो जो मुझे उत्साहित करे तो, मैं उसे जरूर करूंगी। मैं वादा करती हूं। इस तरह से 'गॉडमदर' हुई।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

फिल्म ‘गॉडमदर’ की प्रेरणा आपको कहां से मिली थी?
हुआ कुछ ऐसा था कि शबाना और जावेद साहब ने मुझे एक कहानी बताई। जावेद साहब ने कहा कि विनय साहब, एक उपन्यास है कृष्ण चंदर का। उसके अधिकार मैं आपको दिलवा दूंगा। आप उसे पढ़िए और हो सकता है कि आपको अच्छा लगे। उपन्यास था 'धनगांव की रानी'। उर्दू में उसका शीर्षक था 'जरगांव की रानी'। वह उपन्यास मैंने पढ़ा और मुझे वह बहुत नकारात्मक लगा। मैंने सोचा कि यह तो मैं नहीं कर पाऊंगा। उस वक्त एक बात मेरे समझ में आ गई थी कि वह कुछ ऐसा करना चाह रहे हैं जो नकारात्मक हो और ताकतवर हो। तो मैं सोचने लगा कि ऐसा क्या हो सकता है?

और कोई असली जिंदगी का किरदार?
हो सकता है कि आपने नाम सुना हो, एक जीना मासी थी मुंबई में। जीना मासी देसी शराब की तस्करी करती थीं। मझगांव में रहती थीं। बहुत ताकतवर औरत थीं वह। बहुत दबदबा था उनका। उनका पहनावा सफेद सलवार, शरारा, पान खाती थीं, हाथ में पान की चांदी की डिब्बी। अगर उनके किसी आदमी को पुलिस ने शराब ले जाते हुए पकड़ लिया तो वह पुलिस स्टेशन में जाकर पुलिस वाले से गालियां देकर बात करती थीं। इस किरदार ने मुझे बहुत प्रभावित किया। हैरानी की बात है कि जीना मासी के पति को ऐसे ही लोगों ने मार मार डाला था। उसकी मौत के बाद उसकी जगह इन्होंने ले ली। मैं सोचने लगा कि जीना मासी अगर आज की तारीख में होतीं तो एक राजनीतिज्ञ होतीं। यहीं से एक बीज ने जन्म लिया। उसके बाद मुझे पता चला कि ऐसा एक किरदार पहले से है। इस पर मैंने शोध किया और मैं पहुंच गया। फिल्म 'गॉडमदर' के लिए मेरी प्रेरणा संतोक बेन कभी नहीं थीं।

special interview of writer and director Vinay Shukla with amar ujala pankaj shukla
विनय शुक्ल - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आपने बताया कि मैं ऐसा कुछ नहीं लिखना चाहता जिससे चीजों का मूल्य घटता हो। अब तो कोई भी कुछ भी लिख दे रहा है, आपको कष्ट तो होता होगा?
यह हमेशा से ही ऐसा रहा है। उस समय में एक साहिर थे और दूसरे और भी बहुत से ऐसे लेखक होंगे जिनका आज हम नाम भी नहीं जानते। आज समाज में आए बदलाव से और तकनीकी से सिनेमा में भी कई बदलाव आए हैं। मैं आज ही सोच रहा था कि आज के समय में इस तरह का गाना कोई नहीं लिखेगा, 'तेरे बचपन में मैं जवानी की दुआ मांगती हूं और दुआ देकर परेशान सी हो जाती हूं….!' यह फिल्म ‘मुझे जीने दो’ का गाना है जिसे साहिर साहब ने लिखा है। आप यह देखिए कि अब इस तरह के गीतों की स्थिति ही नहीं बनती कि इस तरह का कोई गीत लिखा जा सके।

बदलाव को कितना मानते हैं आप?
जमाना बदला है तो शब्द बदल गए हैं शब्दकोश बदल गए हैं। यह हमेशा से बदलता आया है और बदलते भी रहना चाहिए। आज हम जो भाषा बोलते हैं उसमें हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू तीनों शामिल हैं। उसमें भी वो शब्द नहीं हैं जो श्रेष्ठ माने जाते हैं। आज के चलन में सहजता आ गई है। एक जमाने में जो शब्द आम होते थे वह अब मुश्किल माने जाते हैं। अब कौन बोलता है आज कि जीने से चढ़कर जाओ। आज बोलते हैं सीढ़ियां या फिर स्टेप्स। जीना तो शब्द ही नहीं रहा अब। कौन कहता है आज कि गुसलखाना कहां है? मैं तो समझता हूं कि पुराने समय में जो लेखक हुआ करते थे, उनके मुकाबले आज के समय के लेखकों में कल्पना करने की शक्ति ज्यादा है। 


पढ़ें: मशहूर निर्माता-निर्देशक दिनेश गांधी का निधन, किया था कई शानदार कन्नड़ फिल्मों का निर्देशन
विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें मनोरंजन समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे बॉलीवुड न्यूज़, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट हॉलीवुड न्यूज़ और मूवी रिव्यु आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

Election
एप में पढ़ें

Followed