Exclusive: ‘काम मांगने की हिम्मत…’ सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय’ फेम अमोल पाराशर ने सुनाए करियर से जुड़े किस्से
Amol Parashar Exclusive Interview: सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय’ के मुख्य अभिनेता अमोल पाराशर ने हाल ही में अमर उजाला से खास बातचीत की। इस बातचीत में सीरीज और अपने करियर को लेकर कई बातें साझा की हैं।
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सीरीज ‘ट्रिपलिंग’ और फिल्म ‘सरदार उधम’ जैसे प्रोजेक्ट्स में नजर आ चुके अभिनेता अमोल पाराशर इन दिनों अपनी वेब सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय’ के दूसरे सीजन को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में अमर उजाला डिजिटल से बातचीत के दौरान उन्होंने सिर्फ अपनी नई सीरीज ही नहीं, बल्कि संघर्ष के दिनों, इंडस्ट्री में बदलते अनुभव और समाज में तेजी से फैल रही गलत जानकारियों जैसे मुद्दों पर बात की है। पढ़िए, अमोल पाराशर के इंटरव्यू के प्रमुख अंश-
उम्मीद थी कि लोगों को सीरीज पसंद आएगी
‘ग्राम चिकित्सालय’ के दूसरे सीजन को लेकर अमोल पाराशर काफी खुश हैं। वह कहते हैं, ‘उम्मीद तो थी कि लोगों को सीरीज पसंद आएगी लेकिन मैं ऐसा इंसान नहीं हूं जो पहले ही बोल दे कि देखना इसके कई सीजन आएंगे। सोच बस इतनी थी कि अगर हम सब लोग ईमानदारी से अच्छा काम करेंगे तो अच्छा शो बना लेंगे। फिर अगर लोगों को शो पसंद आएगा तो वही लोग शोर मचाएंगे कि दूसरा सीजन कब आ रहा है। अच्छी बात यह रही कि लोगों ने काफी जल्दी वो शोर मचा दिया। कई बार एक सीजन के बाद लंबा इंतजार होता है, लेकिन हमारे केस में लगभग एक साल के अंदर दूसरा सीजन बनकर आ गया।’
मैं 12 साल तक काम नहीं मांग पाया
आज अमोल पाराशर को लोग पहचानते हैं लेकिन शुरुआती दिनों में इंडस्ट्री के लोगों से खुद जाकर बात करना उनके लिए आसान नहीं था। वह कहते हैं, ‘मैं ऐसे बहुत लोगों को जानता हूं जो मुंबई आते ही लोगों के नंबर ढूंढते हैं, तुरंत मैसेज करना शुरू कर देते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पाया। मेरे लिए सामने से जाकर किसी को बोलना मुश्किल था कि काम चाहिए।
वह आगे कहते हैं, ‘करीब 10 या 12 साल मुंबई में रहने के बाद पहली बार लगा कि सभी लोग ऐसा करते हैं तो मुझे भी करना चाहिए। मैंने कुछ लोगों को मैसेज किया कि सर मैं आपका काम पसंद करता हूं, मेरा नाम अमोल है, मैंने यह काम किया है। मजेदार बात यह थी कि ज्यादातर लोगों का जवाब आया कि अरे हम जानते हैं आप कौन हो। आज भी अगर किसी को मैसेज करूंगा तो वैसे ही करूंगा। मैं यह मानकर नहीं चलता कि सामने वाला मुझे जानता ही होगा।’
पहचान बनाने के लिए खुद को साबित करना पड़ता है
ऑडिशन को लेकर अमोल का कहना है कि अब चीजें पहले जैसी नहीं रहीं। वह कहते हैं, ‘अब पहले जितने ऑडिशन नहीं देने पड़ते क्योंकि लोगों ने मेरा काफी काम देखा है। उनको पता है कि मैं क्या कर सकता हूं और क्या नहीं। अगर कोई ऐसा डायरेक्टर हो जिसने मेरा काम नहीं देखा हो या कोई ऐसा रोल हो, जहां मुझे खुद लगे कि मैं पहली पसंद नहीं हूं, तो मैं खुशी से ऑडिशन दूंगा। अगर कोई बोले भगत सिंह जैसे किरदार के लिए ऑडिशन देना है, तो मैं जरूर दूंगा। कुछ रोल ऐसे होते हैं, जहां आपको खुद भी लगता है कि यहां अपने आपको साबित करना पड़ेगा।’
‘सरदार उधम’ फिल्म मिलने पर हैरान हुआ
फिल्म ‘सरदार उधम’ में अमोल पाराशर को जब रोल मिला तो वह हैरान हो गए थे। वह बताते हैं, ‘अगर मुझसे पहले कोई कहता कि मैं उस तरह के रोल में फिट बैठूंगा, तो शायद मैं खुद अपना नाम तीसरे चौथे नंबर पर रखता। कई बार वो डायरेक्टर का विजन होता है। मैं खुद काफी सरप्राइज था। कई बार लगता था कि कहीं डायरेक्टर किसी दिन बोल न दें कि यह एक्टर फिट नहीं हो रहा। बस यही सोचता था कि मौका मिला है तो इसे पूरी शिद्दत से सही साबित करना है।’
नोटबंदी के कारण बंद हुआ था पूरा प्रोजेक्ट
करियर के उतार-चढ़ाव पर बात करते हुए अमोल ने एक पुराना किस्सा भी याद किया। उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रोजेक्ट से निकाल दिया गया हो, लेकिन कई बार प्रोजेक्ट बीच में बंद हो जाते हैं। एक बार नोटबंदी हुई थी। 8 नवंबर को हुई और 9 नवंबर को लोगों ने फोन उठाना बंद कर दिया। शूटिंग रुक गई थी, पूरा प्रोजेक्ट वहीं खत्म हो गया। ऐसी चीजों में आप कुछ नहीं कर सकते हैं।’
लोगों को साइंस पर भरोसा करना ही चाहिए
बातचीत के दौरान जब समाज में बदलाव की बात हुई तो अमोल ने बहुत अच्छा जवाब दिया। वह कहते हैं, ‘मैं चाहूंगा कि लोग साइंस पर भरोसा करना सीखें। ऐसा ही संघर्ष ‘ग्राम चिकित्सालय’ के मेरे किरदार प्रभात का भी है। उसे लगता है कि उसने साइंस पढ़ी है तो लोग उसकी बात सुनेंगे। ऐसी ही सोच मेरी भी है, मैंने भी साइंस बैकग्राउंड से पढ़ाई की है।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अमोल पाराशर कहते हैं, ‘मैं मुंबई के एक स्कूल गया था। वहां एक बच्चे ने मुझसे पूछा कि सर क्या आने वाले 20 या 30 साल में इंसान अंगूठे के साइज के पैदा होने लगेंगे। मैंने पूछा क्यों? उसने कहा इंटरनेट पर पढ़ा है। मैं सोचने लगा कि यह बच्चा कितनी गंभीरता से यह बात पूछ रहा है। हमारे समय इंटरनेट नहीं था, तो शायद वो अच्छा था। आज हर चीज रील बनकर, हेडलाइन बनकर सामने आ जाती है। लोग बहुत कुछ बस देखते जा रहे हैं और वो जाकर दिमाग में बैठ जाता है।’
अमोल पाराशर ने आगे कहा, ‘देखिए, परेशानी तब होती है जब लोग किसी भी बात को साइंस बताने लगते हैं। अगर आप कह रहे हैं कि वैज्ञानिकों ने कहा है, तो ये भी बताइए कि किस वैज्ञानिक ने कहा? कौन सा रिसर्च पेपर छपा? कितने लोगों ने उसे रिव्यू किया? हम इंटरनेट पर कुछ पढ़ लेते हैं और बिना सोचे- समझे उसे सच मान लेते हैं। मेरा मानना है कि लोगों को तर्क के साथ सोचना सीखना होगा।’