'बॉलीवुड के पीछे नहीं भागूंगा', शाहिद कपूर के साथ काम कर चुके एक्टर राहुल देशपांडे बोले- संगीत ही मेरी पहचान
Rahul Deshpande Interview: ‘ओ रोमियो’ में शाहिद कपूर और नाना पाटेकर जैसे कलाकारों के साथ राहुल देशपांडे ने काम किया है। लेकिन फिर भी वो बॉलीवुड और एक्टिंग को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं मानते। जानिए एक्टिंग के लिए उन्होंने क्या कुछ कहा…
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'ओ रोमियो' में अभिनय और शाहिद कपूर के साथ काम करने के बाद राहुल देशपांडे एक बार फिर चर्चा में हैं। हालांकि, उनका कहना है कि अभिनय उनके लिए एक रचनात्मक माध्यम जरूर है, लेकिन प्राथमिकता आज भी संगीत ही है। अमर उजाला से खास बातचीत में राहुल ने बॉलीवुड, राष्ट्रीय पुरस्कार, 'अभंगवारी' के 11 साल और सोशल मीडिया के दौर में संगीत पर बेबाकी से अपनी बात रखी।
मैं बॉलीवुड में जगह बनाने वालों में से नहीं हूं
बॉलीवुड में फुल-टाइम करियर बनाने के सवाल पर राहुल देशपांडे का जवाब बिल्कुल साफ था। 'फुल-टाइम? कभी नहीं। एक्टिंग मेरी प्राथमिकता नहीं है और शायद कभी होगी भी नहीं। अगर कोई अच्छा किरदार होगा, कोई ऐसा निर्देशक होगा जिसके साथ मुझे काम करने में खुशी महसूस हो, तो जरूर करूंगा। लेकिन मैं बॉलीवुड में जगह बनाने या उसके पीछे भागने वालों में से नहीं हूं। मेरे लिए संगीत हमेशा पहले आएगा।'
नेशनल अवॉर्ड मिला, लेकिन मैंने खुद को नहीं बदला
'मी वसंतराव' के लिए सर्वश्रेष्ठ प्लेबैक सिंगर का नेशनल अवॉर्ड जीतने के बाद आए बदलाव पर उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि मैं पहले से अलग हो गया हूं। मैं कभी लोगों को खुश करने या अलग दिखने के लिए फैसले नहीं लेता। मेरे अंदर का कलाकार जिस माध्यम में ईमानदारी से कुछ कह सकता है, मैं वही करता हूं। इसलिए कभी संगीत, कभी नाटक, कभी म्यूजिकल और कभी फिल्म, मेरे लिए हर माध्यम सिर्फ अभिव्यक्ति का जरिया है।'
मैं पहले शास्त्रीय गायक हूं, अभिनेता बाद में
अभिनय और संगीत के बीच अपनी पहली पहचान चुनने की बात आई तो राहुल ने बिना किसी झिझक के कहा, 'सबसे पहले मैं एक शास्त्रीय गायक हूं। वही मेरी असली पहचान है। अभिनय मुझे पसंद है, लेकिन मैं सिर्फ इसलिए अभिनय नहीं करूंगा कि लोग मुझे स्क्रीन पर देखना चाहते हैं। मैं वही काम करता हूं, जहां मुझे लगता है कि मैं कला के प्रति पूरी ईमानदारी रख सकता हूं।'
11 साल की 'अभंगवारी', देशभर से मिल रहा प्यार
'अभंगवारी' के 11 साल पूरे होने पर राहुल इस सफर को याद करते हुए कहते हैं, 'मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि 'अभंगवारी' को इतना प्यार मिलेगा। आज महाराष्ट्र के बाहर दिल्ली, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी लोग इसे सुनने आते हैं। यह मेरे लिए बहुत विनम्र कर देने वाला अनुभव है। मुझे लगता है कि भक्ति की भाषा दिल से निकलती है और सीधे दूसरे दिल तक पहुंचती है।'
संतों की वाणी आज भी युवाओं को जोड़ रही है
'वन अभंग, वन स्टोरी' की सोच पर बात करते हुए राहुल का कहना है, 'हर संत का मूल संदेश एक जैसा है - समानता, निस्वार्थ प्रेम और इंसानियत। ये बातें किसी एक धर्म या भाषा तक सीमित नहीं हैं। लोग जब सिर्फ अभंग सुनते हैं तो उन्हें अच्छा लगता है, लेकिन जब उसके शब्दों का अर्थ समझते हैं, तब वह दिल को बिल्कुल अलग तरीके से छूता है।'
मुझे ट्रोलिंग परेशान नहीं करती
रीमिक्स कल्चर, ट्रोलिंग और सोशल मीडिया पर राहुल का कहना है, 'मुझे इनमें से कोई चीज परेशान नहीं करती। अगर मैं इस बात पर ध्यान देने लगूं कि कौन मुझे ट्रोल कर रहा है, कौन क्या कह रहा है या कौन मेरे काम को जज कर रहा है, तो मैं अपनी कला पर ध्यान ही नहीं दे पाऊंगा। मैं खुद को सिर्फ एक गानेवाला मानता हूं। जब तक मैं अपनी कला और अपने मन के प्रति ईमानदार हूं, तब तक बाकी सब मेरे लिए सिर्फ शोर है।'