Exclusive: ‘ऐसी फिल्में संघर्ष करती हैं…’, 'बेबी डू डाई डू' पर बोले साकिब; बताई हुमा को कास्ट करने की वजह
Saqib Saleem Exclusive Interview: अभिनेता-निर्माता साकिब सलीम ने हाल ही में अमर उजाला से खास बातचीत में अपने करियर से जुड़े किस्से साझा किए। इसके अलावा उन्होंने 'बेबी डू डाई डू' में हुमा कुरैशी की भूमिका पर भी बात की।
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बॉलीवुड में नेपोटिज्म की बहस वर्षों से जारी है। ऐसे में जब अभिनेता साकिब सलीम अपनी बहन हुमा कुरैशी के साथ 'सलीम सिब्लिंग्स' बैनर तले फिल्म 'बेबी डू डाई डू' लेकर आए, तो सवाल उठना तय था। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले साकिब के प्रोडक्शन से जुड़ी फिल्म 'सिंगल सलमा' में भी हुमा कुरैशी नजर आई थीं। ऐसे में क्या बहन होने का फायदा मिला? क्या यह भी नेपोटिज्म का मामला है? साकिब इन सवालों से बचने की बजाय खुलकर जवाब देते हैं। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने प्रोड्यूसर बनने की जिम्मेदारियों, नेपोटिज्म, कंटेंट सिनेमा, मिड बजट फिल्मों की चुनौतियों और हुमा के साथ काम करने के अनुभव पर बेबाकी से अपनी बात रखी।
'हुमा को मैंने नहीं चुना... उसने खुद इस फिल्म को चुना'
फिल्म में हुमा कुरैशी मुख्य भूमिका निभा रही हैं। इस पर साकिब बिना किसी झिझक के कहते हैं, 'हुमा बहुत अच्छी अभिनेत्री है। उसने पहले इस तरह की फिल्म नहीं की है। यह स्क्रिप्ट वही मेरे पास लेकर आई थी। उसने मुझसे कहा कि इसे पढ़ो। सच कहूं तो उसने खुद इस फिल्म को चुना। मुझे उसे कास्ट करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। मेरे हिसाब से इस किरदार के लिए वही सबसे सही कलाकार थी।'
'भाई-बहन साथ काम कर रहे हैं... नेपोटिज्म का टैग लगने का डर नहीं?'
जब साकिब से पूछा गया कि भाई-बहन मिलकर प्रोडक्शन हाउस चला रहे हैं और फिल्मों में भी साथ काम कर रहे हैं, तो क्या कभी इस बात का डर नहीं लगता कि उन पर नेपोटिज्म का टैग लग सकता है? इस सवाल पर वह हंस पड़ते हैं। वह कहते हैं, 'हमें इंडस्ट्री में 13-14 साल लगे, तब जाकर हम इस मुकाम पर पहुंचे कि अपनी फिल्म बना सकें। हुमा ने भी अपना सफर अपनी मेहनत से तय किया है और मैंने भी।' इसके बाद वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, 'वैसे भी लोग हमारे बारे में इतना सोच नहीं रहे हैं। हमारे बारे में कौन सोच रहा है?'
'अब किसी और को दोष नहीं देना चाहता'
साकिब बताते हैं कि अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू करने का फैसला सिर्फ फिल्में बनाने के लिए नहीं था, बल्कि अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने के लिए भी था। वह कहते हैं, 'कई बार आप बहुत जुनून के साथ काम करते हैं, लेकिन आखिरी फैसले आपके हाथ में नहीं होते। फिर जब चीजें आपकी सोच के मुताबिक नहीं होतीं तो किसी और को दोष देने लगते हैं। एक समय के बाद मुझे लगा कि अब ऐसा नहीं करना है। अगर कुछ अच्छा होगा तो उसका श्रेय भी हमारा होगा और अगर कुछ गलत होगा तो उसकी जिम्मेदारी भी हमारी होगी। अब मैं किसी और को दोष नहीं देना चाहता।'
'आज फिल्म बनाना नहीं... उसे लोगों तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है'
प्रोड्यूसर बनने के बाद सबसे बड़ा बदलाव क्या महसूस हुआ? इस सवाल पर साकिब कहते हैं, 'हर सुबह कोई नई चुनौती सामने होती है। कभी मार्केटिंग, कभी डिस्ट्रीब्यूशन, कभी पीआर, कभी ब्रांड और मीडिया पार्टनरशिप। जब मैं सिर्फ अभिनेता था, तब इस पूरी दुनिया से लगभग अनजान था। अब समझ आया है कि फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के पीछे कितनी मेहनत लगती है।' वह आगे कहते हैं, 'हम एक छोटे, पैशन से चलने वाले प्रोडक्शन हाउस हैं। हमारे साथ कोई बड़ा स्टूडियो नहीं है। ऐसे में मार्केटिंग का बजट भी सीमित होता है। अच्छी फिल्म बना देना ही काफी नहीं है, उसे सही दर्शकों तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है। फिलहाल हम उसी लड़ाई से गुजर रहे हैं।'
'रिस्क नहीं लेंगे तो नया सिनेमा कैसे बनेगा?'
मिड बजट और इंडिपेंडेंट फिल्मों के सामने बढ़ती चुनौतियों पर साकिब साफ कहते हैं कि नया सिनेमा बिना जोखिम लिए संभव नहीं है। वह कहते हैं, 'जिंदगी में हमेशा सुरक्षित खेलकर आगे नहीं बढ़ सकते। हमने यह फिल्म बिना किसी बड़े स्टूडियो के बनाई है। हमें इसकी कहानी पर पूरा भरोसा है। लोग अक्सर कहते हैं कि कुछ नया देखना है, लेकिन जब अलग तरह की फिल्म आती है तो उसे सबसे ज्यादा स्ट्रगल करना पड़ता है। अगर ऑडियंस ऐसी फिल्मों को अपनाएंगे तो नए फिल्मकारों का हौसला बढ़ेगा। सिनेमा हर तरह का होना चाहिए। मैं 'वेलकम' जैसी फिल्म भी उतना ही पसंद करता हूं और अलग तरह की फिल्में भी।'
'मेरे लिए कंटेंट हमेशा सबसे बड़ा स्टार रहेगा'
आज भले ही 'कंटेंट इज किंग' की चर्चा हर तरफ होती हो, लेकिन साकिब के लिए यह सिर्फ कहने की बात नहीं है। वह कहते हैं, 'मेरे लिए हमेशा कंटेंट सबसे ऊपर है। आखिरकार अच्छी कहानी ही लोगों तक पहुंचती है। मैं हमेशा ऐसी फिल्में बनाना चाहूंगा जिनमें कंटेंट सबसे मजबूत हो।'
'फिल्मों का खर्च कम करना जरूरी है'
हाल के दिनों में फिल्मों के बढ़ते बजट और कलाकारों की फीस पर लगातार बहस हो रही है। इस मुद्दे पर साकिब भी अपनी राय रखते हैं। वह कहते हैं, 'बतौर प्रोड्यूसर, मेरी फिल्म में ऐसा कोई अनुभव नहीं रहा। सभी कलाकार बेहद प्रोफेशनल थे। लेकिन इतना जरूर मानता हूं कि फिल्मों की लागत कम करनी होगी। तभी फिल्मों का आर्थिक गणित बेहतर होगा। इस समस्या को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।'
'सेट पर हुमा सिर्फ मेरी बहन नहीं, एक प्रोफेशनल एक्टर थीं'
हुमा के साथ शूटिंग का अनुभव साझा करते हुए साकिब के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वह कहते हैं, 'घर पर वह जैसी हैं, वैसी सेट पर बिल्कुल नहीं थीं। उन्होंने कभी भाई-बहन वाला रिश्ता काम के बीच नहीं आने दिया। हमेशा समय पर पहुंचीं और पूरी तरह प्रोफेशनल रहीं। हमने करीब 40 दिन शूटिंग की और उन्होंने मुझे परेशान होने का एक भी मौका नहीं दिया।'
40 दिन, 70 से ज्यादा लोकेशन... यूं पर्दे पर उतरी मुंबई
साकिब बताते हैं, 'हमने करीब 40 दिनों तक शूटिंग की और मुंबई की 70-75 अलग-अलग लोकेशनों पर फिल्म शूट की। आखिर यह मुंबई की कहानी है, इसलिए हम चाहते थे कि शहर का असली रंग पर्दे पर नजर आए। मुंबई सिर्फ फिल्म की लोकेशन नहीं, बल्कि इस कहानी का अहम हिस्सा है।'