Vaani Kapoor: ट्रोलिंग पर सख्त कानून चाहती हैं वाणी, बोलीं- हमें सोशल मीडिया को जिम्मेदार बनाना होगा
Vaani Kapoor Interview: अपनी हालिया रिलीज सीरीज ‘मंडला मर्डर्स’ को लेकर चर्चाओं में बनी अभिनेत्री वाणी कपूर ने ट्रोलिंग और हेट स्पीच पर कानून बनाने की मांग की है। जानिए सोशल मीडिया को लेकर और क्या बोलीं एक्ट्रेस।
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वेब सीरीज ‘मंडला मर्डर्स’ से वाणी कपूर ओटीटी की दुनिया में कदम रख रही हैं। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने अपने किरदार की गहराइयों, मानसिक चुनौतियों, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और उससे उबरने के सफर को साझा किया। साथ ही उन्होंने साइबर ट्रोलिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाने की भी खुली अपील की।
जब सीरीज ऑफर हुई तो क्या लगा था कि ये रोल करियर के लिए अहम साबित हो सकता है?
सच कहु तो, मैं किसी प्रोजेक्ट को ये सोचकर साइन नहीं करती कि इसके बाद मुझे लाइन लग जाएंगी या बहुत सारे प्रोजेक्ट्स आ जाएंगे। मेरे लिए उस कहानी और किरदार से एक इमोशनल जुड़ाव होना जरूरी होता है। ऐसी कहानियां मुझे आकर्षित करती हैं जिनमें किरदार की भावनाएं थोड़ी उलझी होती हैं। यह भी कुछ ऐसा ही था। इसमें बहुत सारी परतें थीं, बहुत कुछ एक्सप्लोर करने को था, कहानी में भी और मेरे किरदार में भी।
ये एक ऐसा फिक्शनल वर्ल्ड था जो बहुत ही खूबसूरती से रचा गया था। इसमें माइथोलॉजी भी है, ड्रामा भी है और बहुत गहराई भी। इसमें इंसानी जज्बातों को समझने की कोशिश की गई है। ये कोई आम क्राइम शो नहीं है, बल्कि हर चीज के पीछे एक वजह है। ऐसे सवाल हैं जो हम अपने मन में सोचते हैं। एक किस्म की मिस्ट्री जिसे सुलझाना भी जरूरी है।
इस तरह के डार्क और इंटेंस कॉन्सेप्ट से जब आप जुड़ती हैं, तो क्या उसका असर निजी जिंदगी पर भी पड़ता है?
बिल्कुल पड़ता है। खासकर क्योंकि मैंने अब तक फिल्में ही की थीं, और ये मेरी पहली सीरीज है। सीरीज का मीडियम अलग होता है- जैसे फिल्म एक स्प्रिंट होती है, वैसे सीरीज एक मैराथन की तरह चलती है। इसमें एक इमोशनल कंसिस्टेंसी बनाए रखना होता है, क्योंकि आठ एपिसोड शूट करने हैं। आपको पूरे समय उसी किरदार जैसा महसूस करना होता है। ये एक तरह का मानसिक और साइकोलॉजिकल टोल भी लेता है, क्योंकि कहानी बहुत इंटेंस है।
मैं अक्सर किरदारों की बैकस्टोरी खुद लिखती हूं। जैसे उसकी जिंदगी में ऐसा क्या हुआ होगा जो उसने उसे ऐसा बना दिया। उसके आत्मविश्वास की जड़ें कहां हैं। कौन-से पल उसकी जिंदगी के बेस्ट थे और कौन-से बेहद नीचे गिरा देने वाले। मैं रोज-रोज तो नहीं लिखती थी, लेकिन डायरेक्टर्स से बात करके अपने किरदार को और गहराई से समझने की कोशिश जरूर करती थी।
फिल्मों और वेब सीरीज के काम करने के तरीके में आपको क्या फर्क लगा?
फिल्मों में शूटिंग जल्दी पूरी हो जाती है। किरदार के साथ आपका रिश्ता कुछ हफ्तों का होता है। आप रोल में उतरते हैं, उसे निभाते हैं और फिर अगली फिल्म की तरफ बढ़ जाते हैं। लेकिन वेब सीरीज एक लंबा सफर होती है। इसमें किरदार के साथ महीनों बिताने होते हैं। उसकी सोच, उसका मूड, उसका हर उतार-चढ़ाव आपको लगातार निभाना पड़ता है। यही चीज इस मीडियम को और भी दिलचस्प बनाती है, क्योंकि आप एक ही किरदार में धीरे-धीरे गहराई से उतरते हैं, बतौर ऐक्टर ये बहुत कुछ सिखा जाता है।
करियर की शुरुआत में आपको भी ट्रोलिंग या निगेटिव कमेंट्स का सामना करना पड़ा? उस वक्त आप कैसे डील करती थीं?
हां, बिलकुल हुआ है। शुरू में इसका असर भी होता था, क्योंकि जो कुछ भी कहा जाता है, वो सीधा आपके दिल को लग जाता है। लेकिन धीरे-धीरे मैंने ये समझा कि हर बात को सीरियस लेना जरूरी नहीं होता। अब मैं पहचान पाती हूं कि कौन सी बात में सुधार की गुंजाइश है और कौन सी बस यूं ही बोली गई है। अगर कोई मेरे काम को लेकर कुछ कहता है, तो मैं उस पर ध्यान देती हूं। लेकिन जब कोई ऐसी बात बोले जो मेरे हाथ में नहीं हैं, तो अब मैं उसे दिल पर नहीं लेती। कभी-कभी लोग बहुत पर्सनल हो जाते हैं और यही सबसे ज्यादा तकलीफ देता है।
आजकल सोशल मीडिया हर किसी की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। मुझे लगता है कि वहां कुछ नियम होने चाहिए। क्योंकि जो ट्रोलिंग और हेटफुल बातें कही जाती हैं, वो सिर्फ एक्टर्स को नहीं, बल्कि स्कूल-कॉलेज के बच्चों और आम लोगों को भी बहुत परेशान करती हैं।
हमें इस बारे में खुलकर बात करनी चाहिए और साथ ही ये भी देखना चाहिए कि कुछ सख्त कानून बनें, ताकि ऐसे लोगों को रोका जा सके जो जानबूझकर दूसरों को दुख पहुंचाते हैं। आगे चलकर हमें सोशल मीडिया को एक जिम्मेदार और सुरक्षित जगह बनाना होगा।
सीरीज के किरदार की तरह क्या आपकी पर्सनल लाइफ में भी कभी कोई ऐसा अधूरा पल या क्लोजर न मिलने वाली स्थिति आई है?
हां, कई बार ऐसा होता है। जब आप किसी गहरे रिश्ते में होते हैं, चाहे वो दोस्ती हो या कुछ भी। अगर वो रिश्ता किसी कारणवश टूट जाए, तो सवाल तो मन में उठते हैं। क्या मेरी गलती थी, क्या सामने वाला बदल गया, या हालात ऐसे हो गए थे? हर बार क्लोजर नहीं मिलता। कभी आप वजह जान लेते हैं और कभी बस स्वीकार करना होता है कि अब ये रिश्ता यहीं तक था। मैंने सीखा है कि उस अधूरेपन को अपनाना और आगे बढ़ना ही सबसे बेहतर तरीका होता है। मैं चीजों को गहराई से महसूस करती हूं, इसीलिए बहुत सोचती हूं और अपने आसपास बहुत कम लोगों को आने देती हूं।
मुझे लगता है कि अब लोग पहले से ज्यादा मुखर हो गए हैं। लेकिन पहले भी लोग इससे गुजरते थे, बस बात नहीं करते थे। जैसे मेरी मां या मेरी बहन, शायद उन्होंने भी ऐसे लम्हों का सामना किया हो। हम फैमिली में इस पर बात करते हैं, लेकिन बाहर जाकर कभी जिक्र नहीं करते। अब मैं मानती हूं कि अगर कुछ ठीक नहीं लग रहा है, तो मदद लेना जरूरी है। किसी थेरेपिस्ट से या किसी अपने से जिसके सामने आप खुलकर बात कर सकें। हमें दूसरों के प्रति ज्यादा दयालु होना चाहिए। हर कोई किसी न किसी लड़ाई से गुजर रहा है। अगर किसी का एक मैसेज, एक अच्छा कमेंट आपका दिन बेहतर बना सकता है, तो हम वो कर सकते हैं।