Beast Movie Review: ‘बीस्ट’ में एक्शन के अलावा कुछ भी नहीं जानदार, पूजा ने इस बार विजय का किया बंटाधार
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तमिल, तेलुगू, कन्नड़ हर दक्षिण भारतीय राज्य की भाषा की फिल्में अब हिंदी में हिट होना चाहती हैं। अपनी मूल भाषा के साथ साथ ही ये सिनेमाघरों तक भी हिंदी में डब होकर पहुंच रही हैं। फिल्म ‘बीस्ट’ को हिंदी में ‘रॉ’ के नाम से रिलीज किया गया है। निर्माता निर्देशक नीरज पांडे और शिवम नायर ने अपनी सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ में रॉ के बारे में जो कुछ दिखाया है, उससे लोगों की दिलचस्पी इस संस्था में ‘टाइगर’ से आगे बढ़ी है। सलमान खान के बाद ऋतिक रोशन से लेकर शाहरुख खान, सिद्धार्थ मल्होत्रा और दीपिका पादुकोण तक सब ‘रॉ’ के जासूस बन रहे हैं। विदेश में चुपचाप रहकर अपने काम को अंजाम देने वाले रॉ एजेंट्स के फिल्मी रूप खूब धूम धड़ाका पहले भी करते रहे हैं। तमिल सुपरस्टार विजय की नई फिल्म ‘बीस्ट’ (हिंदी में ‘रॉ’) की भी कुछ वैसी ही कहानी है। विजय की साल 2021 में रिलीज हुई फिल्म ‘मास्टर’ को भी हिंदी में डब करके मूल फिल्म के साथ ही रिलीज किया गया था लेकिन तेलुगू सितारों को हिंदी भाषी दर्शक जिस तरह बांहें पसार कर आगोश में ले रहे हैं, वैसी सफलता तमिल सितारों को नहीं मिल पा रही है। वजह? आइए जानने की कोशिश करते हैं।
पूजा फिर विफल
फिल्म ‘बीस्ट’ की कहानी, पटकथा, निर्देशन, संगीत और तकनीकी पहलुओं पर बात करने से पहले चर्चा सबसे पहले उस अहम बात की जिसे लेकर हिंदी फिल्म जगत में फिल्म ‘राधेश्याम’ के बाद से माहौल गर्म है। फिल्म ‘राधेश्याम’ की हीरोइन पूजा हेगड़े अब सलमान खान की फिल्म ‘कभी ईद कभी दिवाली’ की हीरोइन शायद ही बन सके। सलमान फिल्म से इसके निर्माता और निर्देशक की छुट्टी पहले ही कर चुके हैं। इंतजार था फिल्म ‘बीस्ट’ का और इसमें पूजा का काम देखकर उनका हिंदी सिनेमा का सफर वाकई मुश्किल होने वाला है। फिल्म ‘मोहनजोदारो’ में भी पूजा हेगड़े की मौजूदगी को ही फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी माना गया। फिल्म ‘बीस्ट’ में भी पूजा का हाल ऐसा ही है। फिल्म की कहानी से उनका किरदार निकाल दिया जाए तो भी फिल्म पर कोई फर्क पड़ता नहीं।
कथा, पटकथा, निर्देशन से निराशा
फिल्म ‘बीस्ट’ की सबसे कमजोर कड़ी है, इसकी कहानी। फिल्म ‘अटैक पार्ट वन’ में हीरो एक मुस्लिम आतंकवादी के बच्चे को छोड़ देता है और वह बाद में हीरो के लिए मुसीबत बन जाता है। यहां हीरो ऑपरेशन जोधपुर में एक मुस्लिम आतंकवादी को पकड़ लेता है। महीनों बाद इस आतंकवादी को छुड़ाने के लिए उसके साथी एक मॉल में मौजूद सारे लोगों को बंधक बना लेते हैं। कहानी का हीरो वीरा राघवन भी इसी मॉल में मौजूद मिलता है। बाकी की कहानी समझने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग पर जोर डालने की जरूरत है नहीं। और, कहानी चूंकि ट्रेलर में ही पूरी खुल जाती है, लिहाजा सिनेमा हॉल में भी ‘बीस्ट’ देखने वालों की ज्यादा तादाद है नहीं। ‘मास्टर’ की ही तरह विजय की फिल्म ‘बीस्ट’ की हिंदी पट्टी में ओपनिंग कुछ खास होती नहीं दिख रही।
एक्शन और इमोशन का कनेक्ट गायब
फिल्म ‘बीस्ट’ को पैन इंडिया फिल्म की तरह सोचा भी नहीं गया है और लिहाजा इसका असर भी वैसा है नहीं। अखिल भारतीय स्तर की फिल्म बनाने के लिए जरूरी तत्वों का इसकी कहानी में अभाव है। फिल्म की पटकथा भी एक बिंदु पर आकर ठहर जाती है। फिल्म कभी ‘मनी हाइस्ट’ की नकल करती दिखती है तो कभी विजय की बेस्ट फिल्मों का रिपीट ट्रेलर दिखाई देने लगती है। नेल्सन दिलीप कुमार का बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड अच्छा रहा है। उनकी और विजय की जुगलबंदी देखने की उत्सुकता भी दर्शकों के मन में रही, लेकिन नेल्सन निर्देशन में कुछ भी नया पेश कर पाने में कामयाब नहीं हो सके। फिल्म का एक्शन और फिल्म की कहानी दोनों में तारतम्यता की भारी कमी है। एक्शन में धमाके बहुत हैं, लेकिन फिल्म का एक्शन दर्शकों को अपने साथ शामिल नहीं कर पाता, ये फिल्म की बहुत बड़ी कमजोरी है।
विजय की स्टाइल पर मेहनत
विजय का अपना स्टाइल है और उनके इस स्टाइल के देश दुनिया में लाखों दीवाने भी हैं। एक कमजोर कहानी को भी मनोरंजक बनाए रखने की मेहनत भी वह पूरी करते हैं। फिल्म को आखिर तक देखने का इकलौता बहाना भी इस फिल्म में विजय ही हैं। उनके अलावा सेल्वाराघवन का अभिनय गौर करने लायक है। पेशे से वह फिल्म निर्देशक हैं, लेकिन यहां उनका अभिनय असर लाने की कोशिश पूरी करता है। बाकी नेल्सन की अपनी पूरी हास्य मंडली तो यहां है ही। हालांकि, वीटीवी गणेश इन सब पर अकेले भारी हैं।
सिनेमैटोग्राफी भी कमजोर कड़ी
नेल्सन दिलीपकुमार चूंकि फिल्म ‘बीस्ट’ के लेखक भी हैं लिहाजा फिल्म के निर्देशन व पटकथा में कमजोर होने का ठीकरा भी उन्हीं के सिर फूटना है। फिल्म का संगीत तमिलभाषी दर्शकों के ही अनुरूप है और अनिरुद्ध ने इसके लिए खासी मेहनत भी की है। फिल्म में एक दो गानों का फिल्मांकन भी अच्छा है। खासतौर से अरबी संगीत की थीम पर बने गाने में विजय और पूजा हेगड़े से ज्यादा खूबसूरत इसके सेट्स दिखाई देते हैं। मनोज परमहंस की सिनेमैटोग्राफी की एक खास कमजोरी फिल्म ‘राधेश्याम’ के बाद ये समझ आती है कि उनका कैमरा निर्देशक के दृष्टिकोण का ही अनुसरण करता रहता है, वह दर्शकों का दृष्टिकोण बनकर कहानी में शामिल होने की कोशिश नहीं करता। फिल्म का संपादन चुस्त है।
देखें कि ना देखें..?
करीब एक करोड़ रुपये प्रति मिनट के खर्च से बनी फिल्म ‘बीस्ट’ 159 मिनट की फिल्म है। सिनेमाघरों में देखने के लिए फिल्म में विजय और उनके एक्शन के अलावा दूसरा कुछ खास है नहीं। फिल्म की एंटरटेनमेंट की कोई खास वैल्यू नहीं है। इसको देखते हुए इसे न देखने की ही सलाह दी जाती है।