Cocktail 2 Review: यह कॉकटेल नहीं...फीका मॉकटेल है; फिल्म में सब कुछ है, फिर असर क्यों नहीं? पढ़िए पूरा रिव्यू
Cocktail 2 Movie Review in Hindi: फिल्म 'कॉकटेल 2' आज शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। कृति सेनन, रश्मिका मंदाना और शाहिद कपूर अभिनीत यह फिल्म कैसी है? पढ़िए रिव्यू…
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
एक बात पहले ही साफ कर देते हैं। 'कॉकटेल 2', 2012 में आई फिल्म 'कॉकटेल' का ना तो रीमेक है और ना ही सीक्वल। मेकर्स इसे सिर्फ स्पिरिचुअल सीक्वल बता रहे हैं। मतलब कहानी नई है, लेकिन दोस्ती, प्यार, दिल टूटना और रिश्तों की उलझन वाला वही पुराना फॉर्मूला फिर से उठाया गया है।
अब यहां एक मजेदार चीज होती है। आजकल फिल्म इंडस्ट्री में नया तरीका चल पड़ा है। पुरानी हिट फिल्म का नाम इस्तेमाल करो, उसी तरह का माहौल बनाओ और रिलीज से पहले बोल दो कि तुलना मत कीजिए। लेकिन भाई, तुलना तो होगी ही। नाम भी वही, रिश्तों का झोल भी वही, बेचने की कोशिश भी वही, तो दशर्क पहली वाली को याद क्यों ना करें ?
साल 2012 में होमी अदजानिया 'कॉकटेल' लेकर आए थे। सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण और डायना पेंटी - तीनों के रिश्ते उलझे हुए थे, गलतियां थीं, दिल टूटते थे और कई फैसले ऐसे थे, जिनसे आप सहमत भी नहीं होते थे। लेकिन फर्क यह था कि सब कुछ सच्चा लगता था। उन किरदारों में कमियां थीं, लेकिन कम से कम नकली नहीं लगते थे।
अब 14 साल बाद होमी फिर लौटे हैं। इस बार शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना के साथ। इरादा शायद आज की पीढ़ी के रिश्तों पर कुछ नया कहने का था। लेकिन फिल्म देखकर ऐसा लगता है जैसे पहली कॉकटेल से सारी भावनाएं निकाल ली गईं और बदले में सिर्फ विदेशी लोकेशन, महंगे कपड़े और चमक-दमक डाल दी गई। मतलब बोतल वही रखी गई है, लेकिन अंदर का स्वाद पूरी तरह बदल चुका है। सबसे बड़ी दिक्कत यही है।
कहानी: विचार ठीक था, बस उसे ठीक से लिखा नहीं गया
कहानी कुणाल (शाहिद कपूर), दिया (रश्मिका मंदाना) और एली (कृति सेनन) के आसपास घूमती है। कुणाल और दिया रिश्ते में हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही दिक्कत शुरू हो जाती है जो आजकल हर दूसरी फिल्म में दिखाई जाती है - सब ठीक है, बस अब रिश्ते में पहले वाला रोमांच नहीं बचा। फिर एली की एंट्री होती है। दिया, कुणाल को परखने के लिए एली को आगे करती है। यहां तक सब ठीक लगता है। लेकिन उसके बाद सिर्फ दो दिन साथ घूमने के बाद एली को कुणाल से प्यार हो जाता है और वो भी सच्चा प्यार। अब प्यार हो जाना गलत नहीं है, लेकिन फिल्म इसे जिस रफ्तार से दिखाती है, वहां देखकर लगता है कि इमोशंस को समय नहीं मिला, पटकथा को जल्दी थी। इसके बाद झगड़े होते हैं, रिश्ते टूटते हैं, लोग रोते हैं, इमोशनल सीन्स आते हैं, लेकिन अजीब बात यह है कि पर्दे पर इतना कुछ चल रहा होता है और आप कुछ महसूस ही नहीं करते। मतलब फिल्म आपको बार-बार कह रही होती है - 'यहां दुखी हो जाओ… यहां भावुक हो जाओ…यहां हंसो..' लेकिन दिल है कि मानता ही नहीं।
अभिनय: शाहिद ओवर कर गए, रश्मिका सबसे कमजोर कड़ी
शाहिद कपूर वैसे अच्छे अभिनेता हैं, इसमें कोई शक नहीं। और शायद इसलिए यहां उन्हें देखकर निराशा ज्यादा होती है। पूरी फिल्म में कई जगह ऐसा लगता है जैसे वह किरदार निभाने नहीं, हर सीन में यह साबित करने आए हैं कि - 'देखो, हम कितना अभिनय कर सकते हैं।' समस्या यह है कि कई जगह यह अभिनय नहीं, सीधी ओवरएक्टिंग लगने लगती है। हल्के-फुल्के सीन्स में वह हंसाने की कोशिश बहुत करते हैं, लेकिन हंसी आने के बजाय कई बार अजीब सा सन्नाटा महसूस होता है। जहां भावुक होना चाहिए, वहां भी कई जगह आंखों में आंसू कम और चेहरे पर जोर ज्यादा दिखाई देता है।
रश्मिका मंदाना इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी हैं। सबसे पहली दिक्कत है उनका लहजा। हिंदी बोलते वक्त कई जगह उनका तरीका इतना अटपटा लगता है कि गंभीर सीन्स भी असर नहीं छोड़ पाते। फिल्म उन्हें मासूम दिखाना चाहती है, लेकिन कई जगह वह मासूम कम और बेवजह उलझी हुई ज्यादा लगती हैं। कृति के सामने उनका किरदार इतना कमजोर लिखा गया है कि कई सीन्स में वह असर छोड़ ही नहीं पातीं।
कृति सेनन: नई वेरोनिका बनाने की कोशिश, लेकिन बात बनी नहीं
फिल्म साफ तौर पर कृति सेनन को इस पीढ़ी की वेरोनिका बनाना चाहती है। लेकिन यही सबसे बड़ी समस्या है। पहली कॉकटेल में दीपिका पादुकोण का वेरोनिका वाला किरदार टूटा हुआ था, अकेला था, बिखरा हुआ था, लेकिन उसके भीतर मासूमियत थी। आप उसके दर्द को महसूस कर सकते थे। यहां कृति का किरदार आकर्षक है, ग्लैमरस है, कॉन्फिडेंट है, लेकिन इमोशनल रूप से पूरी तरह खाली है। जहां पहली फिल्म की वेरोनिका टूटी हुई, लेकिन सच्ची लगती थी, यहां कृति का किरदार कई जगह जरूरत से ज्यादा चालाक लगता है। ऊपर से ग्लैमर इस कदर ठूंसा गया है कि कई बार लगता है फिल्म रिश्तों पर नहीं, फैशन ब्रांड्स पर बनी है।
सपोर्टिंग कास्ट: अच्छे कलाकार थे, काम किसी को नहीं मिला
सपोर्टिंग कास्ट के साथ तो फिल्म ने और भी ज्यादा नाइंसाफी की है। टीकू तलसानिया जैसे अनुभवी अभिनेता को सिर्फ शाहिद कपूर के पिता बनाकर खड़ा कर दिया गया है, जैसे उनकी मौजूदगी सिर्फ फ्रेम भरने के लिए हो। नीलू कोहली जैसी अच्छी अभिनेत्री को देखकर तो यही लगता है कि उन्हें बस शादी वाले माहौल में भीड़ बढ़ाने के लिए रख लिया गया। किरदार ऐसा कि अगर फिल्म से हटा भी दें तो शायद किसी को फर्क न पड़े। और पुलकित सम्राट कैमियो में आते हैं, लेकिन उनका किरदार भी कहानी में कोई खास फर्क पैदा नहीं करता।
निर्देशन और स्क्रीनप्ले: चमक-दमक ज्यादा, कहानी पर पकड़ कम
सबसे हैरानी की बात यही है कि पहली फिल्म और यह फिल्म - दोनों होमी अदजानिया ने बनाई हैं। पहली फिल्म में रिलेशनशिप को सांस लेने की जगह दी गई थी। यहां सब कुछ जरूरत से ज्यादा चमकदार है। फिल्म खुद तय नहीं कर पाती कि इसे प्रेम कहानी बनना है, दिल टूटने की कहानी बनना है या किसी आलीशान लाइफस्टाइल का विज्ञापन। फिल्म का पहला भाग देखकर कई बार लगता है जैसे कहानी नहीं, किसी टूरिज्म कंपनी का विज्ञापन चल रहा हो। स्क्रीनप्लेकी हालत और खराब है। रिश्ते धीरे-धीरे बनते नहीं, अचानक बदल जाते हैं। टकराव अपने आप पैदा नहीं होता, जबरदस्ती पैदा किया जाता है। कई जगह साफ दिखता है कि कहानी अपने हिसाब से नहीं चल रही, लेखक उसे धक्का देकर आगे बढ़ा रहे हैं।
म्यूजिक: सुनते वक्त ठीक, बाहर निकलते ही खत्म
पहली कॉकटेल का म्यूजिक आज भी याद किया जाता है। प्रीतम के संगीत से सजा वह एल्बम फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक था। ‘तुम ही हो बंधु’, ‘दारू देसी’, ‘सेकेंड हैंड जवानी’ जैसे गाने आज भी लोग सुनते हैं। इस बार भी संगीत की जिम्मेदारी प्रीतम के ही कंधों पर है। ‘जब तलक’ में अरिजीत सिंह और आकासा, ‘तुझको’ में अरिजीत सिंह और सुनिधि चौहान जैसे अच्छे नाम जुड़े हैं। दिक्कत यह नहीं कि गाने खराब हैं। दिक्कत यह है कि असर छोड़ते नहीं हैं। थिएटर में सुनते वक्त सब ठीक लगता है। लेकिन बाहर निकलने के पांच मिनट बाद अगर कुछ याद रह जाता है तो शायद सिर्फ ‘तुम ही हो बंधु’…
एक अच्छी बात भी है: आखिरी 10 मिनट
हां, फिल्म में एक हिस्सा ऐसा आता है जहां लगता है कि लेखक आखिरकार जाग गए। आखिरी 10 मिनट में फिल्म सोशल मीडिया और रिश्तों की आज की सच्चाई पर बात करती है। यह समझाने की कोशिश होती है कि हर रिश्ते में हर समय रोमांच होना जरूरी नहीं है। प्यार का मतलब सिर्फ हर वक्त कुछ नया महसूस करना नहीं होता। ठहराव भी रिश्तों का हिस्सा होता है। यहीं आकर पहली बार लगता है कि फिल्म के पास सच में कुछ कहने को है। बस दिक्कत यह है कि इस हिस्से तक पहुंचने के लिए ऑडियंस को पूरी फिल्म झेलनी पड़ती है।
देखें या नहीं देखें?
अगर आपने पहली कॉकटेल देखी है और उससे आपको लगाव है, तो ज्यादा उम्मीद लेकर मत जाइए। फिल्म देखने के बाद सबसे ज्यादा यही महसूस होता है कि मेकर्स ने हर चीज पर मेहनत की… बस कहानी पर थोड़ी कम कर दी। खूबसूरत लोकेशन हैं, अच्छे कपड़े हैं, अच्छे दिखने वाले कलाकार हैं, गाने भी ठीक हैं… लेकिन इतनी सारी चीजों के बावजूद फिल्म दिल तक पहुंचती ही नहीं। दो घंटे 30 मिनट के बाद एहसास बस इतना होता है कि सब कुछ था, लेकिन कुछ महसूस नहीं हुआ।