Dasvi Review: फिल्म अभिषेक की, तारीफें ले उड़ीं निमृत कौर, ‘दसवीं’ में दशा और दिशा का संकट
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अभिषेक बच्चन से लोगों को उम्मीदें बहुत रही हैं। मेहनत भी वह बहुत करते हैं अपने किरदारों को परदे पर जीवंत करने में। उनकी शख्सीयत के चारों तरफ एक आवरण सा दिखता है। वह लोगों से खुलकर मिलना चाहते हैं। उनके भीतर का बच्चन उन्हें ऐसा करने से लगातार रोकता रहता है। सोच और सलाह का ये द्वंद्व अभिषेक के जीवन में शुरू से रहा है। मणिरत्नम जैसे निर्देशक बिरले ही उनके जीवन को छूकर निकले। ‘युवा’ और ‘गुरु’ उनके अभिनय का आसमान हैं। लेकिन, तुषार जलोटा जैसे निर्देशक उनकी धरती पर तब आते हैं जब उन्हें दूसरा कोई हीरो मिलता नहीं है। अनुराग बसु और संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशकों के सहायक रहे तुषार का सिनेमा हिंदी सिनेमा के बने बनाए खांचों से खिलने की कोशिश करता दिखता है। समर्पण में उनके कमी नहीं है लेकिन उनकी कल्पनाएं ना तो विलक्षण हैं और न ही नई। फिल्म ‘दसवीं’ यहीं सिनेमा की केजी में पहुंच जाती है।
जानी पहचानी कहानी
गंगा राम चौधरी नाम का एक मुख्यमंत्री है। बोली और पहनावे से हरियाणा का लगता है। बीवी उसकी बिल्कुल गाय है। छुट्टा तो नहीं है लेकिन स्वभाव उसका शुरू में वैसा ही जान पड़ता है। चौधरी जेल जाता है तो उसका भाग्य जागता है। सिनेमा में रानियों के सोने पर दासियों के भाग जगने की कहानियां खूब देखी सुनी गई हैं। वैसे ही ये जेल जाने वाले मुख्यमंत्री वाला एंगल भी खूब घिसा जा रहा है। दर्शक जानता है कि अब बीवी मुख्यमंत्री बनेगी। उसे ये भी पता है कि ओम प्रकाश चौटाला ने जेल में रहते हुए हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी। लेकिन, ये फिल्म हकीकत से पानी नहीं लेती। ये रितेश शाह जैसे दिग्गज पटकथा लेखक की चाय से उड़ती भाप पर बैठने की कोशिश करती है। सुरेश नायर का भी खासा नाम रहा है। लेकिन फिल्म ‘दसवीं’ में दोनों अपना नाम पूरा पानी में मिला दिए हैं।
निर्देशन में नवीनता का अभाव
फिल्म ‘दसवीं’ की कहानी पहले फ्रेम से लेकर क्लाइमेक्स तक हिंदी सिनेमा के सुधी दर्शक को परदे पर घटनाएं घटने से पहले समझ आती रहती है। फिल्म यहीं हार जाती है। अभिषेक बच्चन और यामी गौतम के साथ के एक दो सीन छोड़ दें तो फिल्म कहीं भी चौंकाती नहीं है। बतौर निर्देशक तुषार जलोटा ने अपनी डेब्यू फिल्म के लिए ये फिल्म क्यों बनाई, ये फिल्म की अधीरता और इसकी गति से समझ आता है। सिनेमा सिर्फ फिल्म बनाने के लिए बने तो गड़बड़ है। तुषार ने फिल्म की कहानी बहुत ही सादी चुनी है। वह चाहते तो हैं कि इसमें वह तड़का लेकर आएं लेकिन दाल ही बासी हो तो फिर उसे कितना भी ‘गार्निश’ करो, स्वाद आता नहीं है। निर्देशन के मामले में वह अपने उस्तादों अनुराग और भंसाली का भी कुछ असर फिल्म में दिखा नहीं पाते हैं।
निमृत कौर ने लूट ली महफिल
फिल्म को देखने के बाद इसके कलाकारों पर तरस आता है। अभिषेक बच्चन, निमृत कौर और यामी गौतम तीनों को पता है कि फिल्म का हश्र क्या होने वाला है। ये इसके निर्माताओं जियो स्टूडियोज और मैडॉक फिल्म्स के कर्ता धर्ताओं को भी पता ही होगा, तभी फिल्म का कहीं कोई प्रचार प्रसार नहीं है। ओटीटी पर इस तरह की फिल्में जो देखते हैं, उन्हें बुधवार तक ये नहीं पता था कि फिल्म नेटफ्लिक्स पर आएगी, जी5 पर दिखेगी या फिर डिज्नी+ हॉटस्टार पर इसका बाजा बजने वाला है। अभिषेक बच्चन मेहनती कलाकार हैं। यहां भी वह खूब मेहनत करते दिखे लेकिन ‘दसवीं’ देखा जाए तो निमृत कौर की फिल्म है। असल अदाकारी फिल्म में निमृत ने ही की और ये सिर्फ उनका किरदार ही है जो फिल्म देखने की वजह आखिर तक बनाए रखता है। यामी गौतम की मेहनत भी गौर करने लायक है पर इसका असर फेसक्रीम जैसा ही है, बस।
दिशा से भटकी, दशा में दम नहीं
फिल्म ‘दसवीं’ की दशा और दिशा दोनों गड़बड़ है और सचिन जिगर का संगीत फिल्म की बड़ी बाधा है। ढोल ताशे इस बार भी दोनों ने खूब बजाए हैं लेकिन उनका संगीत फिल्म पर पैबंद की तरह लगता है, वह फिल्ममेकिंग का हिस्सा जैसा नहीं है। सिनेमैटोग्राफी भी औसत है और कहीं कोई ऐसा कैमरा संचलन फिल्म में दिखता नहीं है जो ‘वाह’ कहने पर मजबूर कर दे। संपादन सुस्त है। ओटीटी की फिल्म को बहुत चुस्त होना चाहिए और अवधि के मामले में दुरुस्त रहना चाहिए। जियो स्टूडियोज को अपनी सिनेमा स्लेट पर फिर से गौर करना चाहिए और कंपनी के लिए कॉन्टेंट फाइनल करने वाले अपने सिपहसालारों को थोड़ा और जिम्मेदार बनाने के लिए सतर्क करना चाहिए।