He-Man and The Masters of the Universe Review: ही-मैन की भव्य वापसी, क्या नॉस्टैल्जिया ने फिर चलाया जादू?
He-Man and The Masters of the Universe Movie Review: हॉलीवुड फिल्मों का चर्चित सुपरहीरो ही-मैन एक बार फिर बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुका है। 'ही-मैन एंड द मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स' फिल्म आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई। रिव्यू के जरिए जानिए कैसी है ये हॉलीवुड फिल्म?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
'आई हैव द पावर'... यह डायलॉग सुनते ही 80 और 90 के दशक में बड़े हुए लाखों फैंस के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। ही-मैन सिर्फ एक कार्टून किरदार नहीं था, बल्कि उस दौर का सुपरस्टार था।1987 में जब ही-मैन पहली बार बड़े पर्दे पर पहुंचा था, तब उम्मीदें भी बड़ी थीं। लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर टिक नहीं पाई। इसके बावजूद डॉल्फ लुंडग्रेन का ही-मैन आज भी फैंस के बीच याद किया जाता है।
करीब चार दशक बाद 'ही-मैन एंड द मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स' के साथ ही-मैन बड़े पर्दे पर लौट आया है। निर्देशक ट्रैविस नाइट के सामने चुनौती सिर्फ एक फिल्म बनाने की नहीं थी, बल्कि यह साबित करने की भी थी कि ही-मैन का जादू आज भी बरकरार है, ऐसे समय में जब दर्शकों के पास 'ड्यून', 'अवतार' और 'हाउस ऑफ द ड्रैगन' जैसी भव्य फैंटेसी दुनिया मौजूद हैं।
कहानी: खोया हुआ राजकुमार और पुराना रास्ता
नई फिल्म ही-मैन की कहानी को थोड़ा अलग तरीके से दिखाती है। इसमें प्रिंस एडम (निकोलस गैलिट्ज़ीन) शुरुआत से ईटर्निया में नहीं रहता, बल्कि बचपन में अपनी दुनिया से बिछड़कर पृथ्वी पर आ जाता है और वहीं बड़ा होता है। कई साल बाद जब उसके हाथ फिर से स्वॉर्ड ऑफ पावर लगती है तो उसे पता चलता है कि वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि ईटर्निया का उत्तराधिकारी है।
उधर स्केलेटर (जैरेड लेटो) ने ईटर्निया पर कब्जा कर लिया है। दुनिया टूट चुकी है और उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी है। अब एडम को अपने अतीत में लौटकर ही-मैन बनना है और अपने लोगों को बचाना है।
सुनने में कहानी दिलचस्प लगती है, लेकिन इसमें ऐसा बहुत कम है जो पहले कभी न देखा गया हो। चुना हुआ हीरो, खोई हुई पहचान, दुनिया बचाने का मिशन और अच्छाई-बुराई की आखिरी लड़ाई... ये सब पहले भी कई फिल्मों या सीरीज में दिख चुका है। फिल्म उन्हें नए अंदाज में पेश करने की कोशिश तो करती है, लेकिन बहुत आगे नहीं जा पाती।
सबसे बड़ी दिक्कत: कई बार 2026 नहीं, 2006 की फिल्म लगती है
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका पुराना महसूस होना है। टेक्निकली, फिल्म शानदार है..विजुअल इफेक्ट्स अच्छे हैं, सीजीआई प्रभावशाली है और ईटर्निया की दुनिया देखने में खूबसूरत लगती है। लेकिन कहानी कहने का तरीका कई बार पुराने दौर की फैंटेसी फिल्मों जैसा लगता है।
आज के दौर में दर्शक परतदार किरदारों गहराई वाली कहानियों के आदी हो चुके हैं। ऐसे में ही-मैन की दुनिया कई बार जरूरत से ज्यादा सीधी-सादी लगती है। अच्छे लोग बहुत अच्छे हैं, बुरे लोग बहुत बुरे हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे किसी पुराने कार्टून को बड़े बजट और नई तकनीक के साथ दोबारा बना दिया गया हो। कुछ ऑडियंस को शायद यही बात पसंद आएगी। बाकी लोगों को यही सबसे ज्यादा खटक सकती है।
अभिनय: ही-मैन अच्छे, स्केलेटर सबसे ज्यादा याद रहते हैं
निकोलस गैलिट्जिन ही-मैन के रूप में ठीक लगते हैं। उनके पास स्क्रीन प्रेजेंस है और एक्शन सीन्स में वह किरदार के साथ न्याय करते हैं। हालांकि स्क्रिप्ट उन्हें बहुत ज्यादा चमकने का मौका नहीं देती। कैमिला मेंडेस की टीला सिर्फ हीरो के साथ खड़ी रहने वाली किरदार नहीं हैं। वह मजबूत और आत्मविश्वासी और लड़ाई के सीन्स में पूरी तरह फिट नजर आती हैं। वहीं इद्रिस एल्बा अपने अनुभव का पूरा फायदा उठाते हैं। उनके किरदार में एक गंभीरता है जो फिल्म को सहारा देती है।
फिल्म में अगर कोई सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है तो वह स्केलेटर है। जैरेड लेटो इस किरदार में पूरी तरह डूबे नजर आते हैं। उनके डायलाग बोलने का अंदाज, हावभाव और स्क्रीन पर मौजूदगी प्रभाव छोड़ती है। कई बार वह ही-मैन से भी ज्यादा याद रह जाते हैं।
पुराने फैंस के लिए एक और सरप्राइज है। 1987 की फिल्म में ही-मैन बने डॉल्फ लुंडग्रेन का कैमियो छोटा जरूर है, लेकिन अच्छा लगता है। यह पल पुराने फैंस के चेहरे पर मुस्कान ला सकता है।
निर्देशन: दुनिया शानदार, कहानी साधारण
निर्देशक ट्रैविस नाइट की मेहनत स्क्रीन पर साफ दिखाई देती है। उन्होंने ईटर्निया को बड़े पर्दे पर शानदार तरीके से उतारा है। विशाल महल, जादुई शक्तियां, अजीबोगरीब जीव और बड़े युद्ध सीन फिल्म को भव्य बनाते हैं। लेकिन जितनी मेहनत दुनिया को बनाने में दिखती है, उतनी कहानी में नहीं। फिल्म सुरक्षित रास्ते पर चलती है। यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। कई मोड़ों का अंदाजा पहले ही लग जाता है। आगे क्या होने वाला है, यह समझने के लिए ऑडियंस को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। ईटर्निया की दुनिया याद रह जाती है, लेकिन उसकी कहानी नहीं।
जहां फिल्म पूरी ताकत दिखाती है
अगर कहानी और स्क्रीनप्ले फिल्म की कमजोर कड़ी हैं तो टेक्निकल पार्ट इसकी सबसे बड़ी ताकत है। वीएफएक्स और सीजीआई फिल्म के विजुअल इफैक्ट्स अच्छे हैं। ईटर्निया की दुनिया बड़ी और जीवंत लगती है। युद्ध दृश्य भी प्रभावशाली हैं और बड़े पर्दे पर अच्छा अनुभव देते हैं।
आजकल कई फैंटेसी फिल्में धुंधले रंगों में खो जाती हैं। यहां ऐसा नहीं है। यह फिल्म रंगों का खुलकर इस्तेमाल करती है। ईटर्निया रंगीन, जीवंत और आकर्षक दिखती है। प्रोडक्शन डिजाइन, कॉस्ट्यूम, हथियार, सेट और कैसल ग्रेस्कल का डिजाइन शानदार है। फिल्म देखने के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि मेकर्स ने मेहनत नहीं की।
तो फिर मिक्स रिएक्शन क्यों? क्योंकि फिल्म दो अलग-अलग ऑडियंस को खुश करने की कोशिश करती है। एक तरफ वे लोग हैं जो बचपन का ही-मैन वापस देखना चाहते थे। दूसरी तरफ वे ऑडियंस हैं जो अगला 'ड्यून' या 'लॉर्ड ऑफ द रिंग्स' तलाश रहे हैं। पहले वर्ग को फिल्म काफी पसंद आ सकती है। दूसरे वर्ग को लग सकता है कि फिल्म खूबसूरत है, लेकिन उतनी गहरी नहीं।
अगर ही-मैन आपके बचपन का हिस्सा रहा है तो फिल्म देखने की एक वजह तो अपने आप बन जाती है। बड़े पर्दे पर ईटर्निया की दुनिया को देखना अच्छा लगता है और स्केलेटर के साथ ही-मैन की टक्कर भी एंटरटेन करती है। मगर दिक्कत यह है कि फिल्म जितनी मेहनत अपनी दुनिया को खूबसूरत बनाने में करती है, उतनी कहानी को दिलचस्प बनाने में नहीं। कई मोड़ दूर से आते दिखाई देते हैं। फिल्म आपको चौंकाने की कोशिश कम बचपन का ही-मैन याद दिलाने की कोशिश ज्यादा करती है।
ये फिल्म पुराने फैंस के लिए एक ठीक-ठाक नॉस्टेल्जिया ट्रिप है। लेकिन जो ऑडियंस अगली बड़ी फैंटेसी फिल्म की तलाश में आए हैं, उन्हें शायद थोड़ा और इंतजार करना पड़े।
कुल मिलाकर, ही-मैन लौट तो आया है, ईटर्निया बच भी जाती है, लेकिन फिल्म ऑडियंस को जीत नहीं पाती है।