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Digital Review: भंसाली की अब तक की सारी फिल्मों का कोलाज है करण जौहर के 'कलंक' का टीजर
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिप्रा सक्सेना
Updated Tue, 12 Mar 2019 02:39 PM IST
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सार
- डिजिटल रिव्यू: कलंक (टीजर)
- कलाकार: माधुरी दीक्षित, सोनाक्षी सिन्हा, आलिया भट्ट, आदित्य रॉय कपूर, संजय दत्त और वरुण धवन।
- निर्देशक: अभिषेक वर्मन
- बैनर: फॉक्सस्टार स्टूडियोज, धर्मा प्रोडक्शंस, नाडियाडवाला ग्रांडसंस
Kalank teaser poster
- फोटो : twitter
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विस्तार
यह भी सही ही है। किसी ने तो संजय लीला भंसाली को उनके ही खेल में मात देने का बीड़ा उठाया। भंसाली 'हम दिल दे चुके सनम' से लेकर 'बाजीराव-मस्तानी' और 'पद्मावत' तक बड़े पर्दे पर सिनेमा का जो तिलिस्म गढ़ चुके हैं, उसकी तुलना बीते जमाने की 'मुगले आजम' और 'पाकीजा' जैसी फिल्मों से की जाती है। अब उनकी फिल्मों से तुलना 'कलंक' की होने जा रही है। करण जौहर के लिए यह कसौटी आसान नहीं है।
'कलंक' का टीजर 'देवदास' जैसे फ्रेम से खुलता है। 'खामोशी' और 'ब्लैक' जैसे शॉट डिवीजन से आगे बढ़ता है। 'बाजीराव- मस्तानी' का रंग गुलाल बिखेरता है। 'हम दिल दे चुके सनम' की लम्हों की चोरियां दिखाता है और, फिर आ जाता है 'पद्मावत' के जानवर और इंसान के द्वंद्व पर। ऐसा हो सकता है अभिषेक वर्मन ने ये सारी दृश्यावली खुद से ही सजाई हो या हॉलीवुड की पीरियड फिल्मों के संदर्भ से बनाई हो। खास बात यह है कि भंसाली जैसा असर तब तक नहीं आता, जब तक आप भारत की मिट्टी की गंध नहीं पहचानते।
इस देश में एक अलग ही खुशबू है, इसका अलग ही मिजाज है। संगीत यहां धमनियों में बहता है। सुर बनाने नहीं पड़ते, क्रोंच पक्षी का रुदन देख खुद ब खुद कंठ से फूटते हैं। भंसाली ने अपनी फिल्मों में यही सूत्र पकड़े रखा है। उनकी फिल्म का कैनवास संगीत से सांसें लेता है, वह अलग से जोड़ा नहीं लगता। 'कलंक' का टीजर किसी खास संगीत लहरी पर तैर नहीं रहा है। अलग-अलग दृश्यों और दमदार संवादों को मनकों जैसा पिरोने के लिए अभिषेक को मखमल के धागों जैसा संगीत लगाना था।
फिल्म का टीजर बताता है कि फिल्म बहुत भव्य है। सिनेमा और दर्शक का रिश्ता भी बहुत नाजुक होता है, वह निभाना नहीं चुकाना पड़ता है। कीमत जो अब महंगी हो चली है।
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'कलंक' का टीजर 'देवदास' जैसे फ्रेम से खुलता है। 'खामोशी' और 'ब्लैक' जैसे शॉट डिवीजन से आगे बढ़ता है। 'बाजीराव- मस्तानी' का रंग गुलाल बिखेरता है। 'हम दिल दे चुके सनम' की लम्हों की चोरियां दिखाता है और, फिर आ जाता है 'पद्मावत' के जानवर और इंसान के द्वंद्व पर। ऐसा हो सकता है अभिषेक वर्मन ने ये सारी दृश्यावली खुद से ही सजाई हो या हॉलीवुड की पीरियड फिल्मों के संदर्भ से बनाई हो। खास बात यह है कि भंसाली जैसा असर तब तक नहीं आता, जब तक आप भारत की मिट्टी की गंध नहीं पहचानते।
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इस देश में एक अलग ही खुशबू है, इसका अलग ही मिजाज है। संगीत यहां धमनियों में बहता है। सुर बनाने नहीं पड़ते, क्रोंच पक्षी का रुदन देख खुद ब खुद कंठ से फूटते हैं। भंसाली ने अपनी फिल्मों में यही सूत्र पकड़े रखा है। उनकी फिल्म का कैनवास संगीत से सांसें लेता है, वह अलग से जोड़ा नहीं लगता। 'कलंक' का टीजर किसी खास संगीत लहरी पर तैर नहीं रहा है। अलग-अलग दृश्यों और दमदार संवादों को मनकों जैसा पिरोने के लिए अभिषेक को मखमल के धागों जैसा संगीत लगाना था।
फिल्म का टीजर बताता है कि फिल्म बहुत भव्य है। सिनेमा और दर्शक का रिश्ता भी बहुत नाजुक होता है, वह निभाना नहीं चुकाना पड़ता है। कीमत जो अब महंगी हो चली है।
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