Mayasabha Movie Review: हैरान करते हैं जावेद जाफरी, बीच में कहीं भटके राही पर शानदार है क्लाइमैक्स
Mayasabha Movie Review: जावेद जाफरी अभिनीत फिल्म ‘मयसभा’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। ‘तुम्बाड’ फेम डायरेक्टर अनिल राही बर्वें की इस फिल्म का कोई खास प्रमोशन नहीं किया गया। यहां जानिए कैसी है यह फिल्म…
विस्तार
साल 2018 में अनिल राही बर्वे की एक फिल्म रिलीज हुई थी, नाम था 'तुम्बाड'। इस फिल्म की कहानी सोने की मुद्रा और उसको पाने के लालच के इर्द-गिर्द बुनी गई थी। अब अनिल अपनी अगली फिल्म ‘मयसभा’ लेकर आए हैं। कहानी में लालच और सोना तो है पर इसका ट्रीटमेंट ‘तुम्बाड’ जैसा नहीं है। हालांकि, कहानी और उसे पेश करने का तरीका ‘तुम्बाड’ जैसा ही अलग और दमदार है। फिर भी अगर आप इसे ‘तुम्बाड’ जैसा ही समझकर देखने जा रहे हों तो न जाएं। क्याें? यहां जानिए…
कहानी
‘मयसभा: द हॉल ऑफ इल्यूजन’ मात्र 100 मिनट की फिल्म है। कहानी एक रात और चार लोगों परमेश्वर खन्ना (जावेद जाफरी), जीनत (वीना जामकर), वासु (मोहम्मद समद) और रावराणा (दीपक दामले) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। परमेश्वर किसी दौर में एक बड़ा निर्माता था पर अब अपने वर्षों से बंद पड़े अपने थिएटर में ही घर बनाकर रहता है। उसका बेटा वासु भी उसके साथ ही रहता है। मानसिक तौर पर कमजोर परमेश्वर, वासु के साथ अक्सर मारपीट करता है। वासु का एक दोस्त है रावराणा और उसकी बहन है जीनत। पिता से परेशान होकर वासु उनको बताता है कि परमेश्वर ने थिएटर में 40 किलो सोना छिपा रखा है। इसके बाद तीनों उसे पाने के लालच में क्या क्या करते हैं? यही पूरी कहानी है।
अभिनय
इस फिल्म को 90 प्रतिशत जावेद जाफरी ने अपने कंधों पर खींचा है। पूरी फिल्म में वो ही सबसे ज्यादा बोलते हैं और आप सिर्फ देखते रह जाते हैं। वर्षों बाद एक बार फिर उन्होंने साबित किया है कि उनकी रेंज कितनी दूर तक की है। उनका कमाल का अभिनय देखकर अफसोस होता है कि बॉलीवुड ने अब तक उन्हें वो मौके नहीं दिए, जिसके वो हकदार हैं। यह वाकई उनके करियर का बेस्ट है। मोहम्मद समद का किरदार मासूम है और उनका अभिनय ‘तुम्बाड’ जैसा ही है। वीना जामकर ने बढ़िया काम किया है। वहीं ‘तुम्बाड’ में विनायक के दोस्त राघव का रोल करने वाले एक्टर दीपक दामले के आप यहां पहचान ही नहीं पाएंगे। वो स्टाइलिश लगे हैं और उनका अभिनय भी स्क्रिप्ट के हिसाब से बेहतर ही है।
निर्देशन
राही ने यहां जो स्क्रिप्ट गढी है वो दमदार तो हैं। वो फिल्म के अंत तक सस्पेंस बनाने में कामयाब भी रहते हैं पर कुछ चीजें कमजोर हैं। पूरी फिल्म में चारों किरदार एक दूसरे को अपनी कहानी सुनाते हैं और इमेजिन आपको करना है। कई जगह क्रिएटिव होने के चलते उन्होंने लॉजिक भी नहीं लगाया। ‘तुम्बाड’ में अनिल ने जो परफेक्ट काम किया था, वो यहां कुछ जगह मिसिंग है। हालांकि, क्लाइमैक्स वाला ट्विस्ट देखते हुए राही की सारी गलतियां माफ की जा सकती हैं।
देखें या नहीं
आर्ट, क्रिएटिव और अलग तरह की फिल्में देखना पसंद करते हैं तो थिएटर जा सकते हैं।
