Merry Christmas Review: सस्पेंस फिल्मों के शौकीनों को श्रीराम का बेहतरीन तोहफा, कैटरीना-विजय की दमदार जुगलबंदी
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‘रात जितनी हसीन होगी, सुबह उतनी ही रंगीन होगी’, किसी फिल्म के पोस्टर पर ये लाइन पढ़ने और पोस्टर पर कैटरीना कैफ जैसी खूबसूरत महिला की तस्वीर देखने के बाद भी अगर साथ में निर्देशक श्रीराम राघवन लिखा हो तो दर्शक फिल्म को लेकर कोई ख्याल पकाना भी चाहे तो नहीं पका सकता। यही श्रीराम का सिनेमा है। फिल्म ‘ऐतबार’ में निर्देशक मुकुल आनंद के सहायक के तौर पर शुरु हुआ उनका फिल्मी सफर अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां उनकी फिल्मों के लिए दर्शक दम साधकर इंतजार करते हैं। श्रीराम की पिछली फिल्म ‘अंधाधुन’ को रिलीज हुए पांच साल हुए। इसे बनाने वाली कंपनी वायकॉम18 ने उससे पैसे भी अंधाधुंध कमाए। और, अब बारी टिप्स म्यूजिक कंपनी की है। रमेश तौरानी के लिए ये फिल्म उनकी कंपनी की नई ब्रांडिंग है। टिप्स की पिछली फिल्में ‘रेस 3’, ‘भूत पुलिस’ और ‘गैसलाइट’ रही हैं, उनका हाल सबको पता है, ताजा हाल ये है कि ‘मेरी क्रिसमस’ के सिनेमाघरों तक पहुंचने से पहले ही टिप्स के शेयरों में पांच फीसदी से ज्यादा का उछाल बीते दिन दर्ज किया गया।
कहानी एक रात की साजिश की
फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ फ्रेडरिक दा के लिखे फ्रेंच उपन्यास ला मोंटे चार्ज की कहानी पर आधारित है। क्रिसमस की रात अल्बर्ट शहर घूमने निकलता है। एक महिला भी अपनी छोटी सी बच्ची को लेकर घूमने निकली है। दोनों मिलते हैं। महिला के घर पहुंचते हैं। महिला बच्ची को सुलाकर उसके साथ फिर घूमने निकलती है। दोनों वापस घर पहुंचते हैं। सोफे पर महिला के पति की लाश पड़ी है। अल्बर्ट जिसने खुद को दुबई रिटर्न आर्किटेक्ट बताया था। अब अपनी असली पहचान बताता है और वहां से चला जाता है। थोड़ी देर बाद वही महिला फिर अपनी बच्ची के साथ उसे सड़क पर घूमती दिखती है। अल्बर्ट उसका पीछा करता है। इस बार महिला चर्च में मिले एक कैटरिंग कारोबारी के साथ घर आती है। बच्ची को सुलाती है। फिर उसके साथ बाहर निकलती है। फिर वापस घर लौटती है और फिर सामने सोफे पर पति की लाश पड़ी है। ये नया शख्स वहां से निकलता नहीं है बल्कि महिला की मदद करने के लिए पुलिस के आने तक रुक जाता है। महिला चाहती भी यही है। लेकिन, अल्बर्ट इस बार भी पुलिस के आने से पहले सीन से लापता है क्योंकि उसका अतीत उसके सामने खड़ा है। इस चोर पुलिस के खेल के बीच ही वह पता लगा लेता है कि आखिर माजरा है क्या..?
श्रीराम राघवन की फिल्में अगर ध्यान से देखेंगे तो उनकी फिल्मों की कहानी का केंद्रबिंदु हमेशा से एक महिला ही रही है। हीरो फिल्म की कहानी की सजावट के तौर पर इस्तेमाल होता है। यहां भी वैसा ही कुछ है। कैटरीना कैफ को श्रीराम राघवन ने उनके अब तक के बेहतरीन किरदार में पेश किया है। मारिया का ये किरदार कैटरीना के लिए उनकी शादी के बाद की दूसरी पारी का वह स्प्रिंग बोर्ड है जिस पर से छलांग लगाकर अब वह अभी कुछ साल और तैर सकती हैं। फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ सस्पेंस के शौकीनों की फिल्म है। मसाला इसमें भी भरपूर है लेकिन ये डिश बन मस्का जैसी है, इसका असली मजा ईरानी चाय के साथ ही लिया जा सकता है। मुंबई जब बंबई हुआ करता था, वाले दिनों की इस कहानी में मोबाइल नहीं है, सोशल मीडिया नहीं है और अफरातफरी भी नहीं है। एक महीने भर की प्लानिंग से होने वाला मर्डर है और दूसरा बस फटाक से हो गया कत्ल। दोनों का सूत्र एक ही है। दोनों जगह मामला एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर का भी है। श्रीराम और उनकी लेखन टीम ने सबकुछ हाथ से बुने गए स्वेटर जैसा गढा है और इसकी कढ़ाई भी बहुत नफीस रखी है।
पुरानी वाइन जैसे श्रीराम राघवन का सिनेमा
बतौर निर्देशक श्रीराम राघवन फिल्म दर फिल्म महकते जा रहे हैं। पुरानी वाइन की तरह। पूजा लढा सुरती उनके इस सफर की परमानेंट हमसफर हैं। एक एडिटर और एक डायरेक्टर की इससे बेहतरीन जोड़ी शायद बिमल रॉय और ऋषिकेश मुखर्जी की ही रही होगी। सिनेमा गढ़ना क्या होता है ये श्रीराम राघवन से फिल्म स्कूल के बच्चे सीखते हैं। उनका सपना होता है मुंबई आने पर उनसे मिल भर लेने का। और, श्रीराम मिलते हैं तो कतई फिल्मी नहीं लगते। फिल्मी सितारों के इंटरव्यू करते करते वह फिल्ममेकर बने हैं। उनके हर फ्रेम में कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता है जो एक आम फिल्म दर्शक को नजर नहीं आता, लेकिन जो गुणी दर्शक हैं, वह इसे पकड़ लेते हैं। सात साल बाद जेल से छूटे शख्स की पहली आजाद रात की ये कहानी है और सुबह होते होते ये एक रात की प्रेम कहानी में तब्दील हो जाती है। पता नहीं पहली बार प्रपोज करने के लिए खरीदी गई अल्बर्ट की अंगूठी अभिशप्त है या फिर उसकी किस्मत ही खराब है, लेकिन नियति को उसने स्वीकार कर लिया है।
टीस की तरह उठती प्रेम कहानी
फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ लोग देखने आएंगे विजय सेतुपति की वजह से लेकिन जब फिल्म देखकर निकलेंगे तो याद रह जाएंगी कैटरीना कैफ। कैटरीना कैफ से श्रीराम राघवन ने उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय कराया है। अपने बॉयफ्रेंड के दोस्त से शादी करने वाली मारिया का ये किरदार एक मां की लाचारी से उपजा है। अपनी बच्ची को अपने ही पति से बचाने की कोशिश में वह जो कुछ कर गुजरती है, उसको देखकर दर्शक उसके साथ हो लेता है। कातिल से यहां घृणा नहीं होने पाती। और, यही वजह विजय सेतुपति के किरदार अल्बर्ट को रोजी से मारिया तक ले आता है। दोनों के बीच का सामंजस्य फिल्म की अंतर्धारा है और फिल्म के क्लाइमेक्स में अल्बर्ट जब मारिया को अंगूठी पहनाने के बाद पुलिस थाने में ही समर्पण के अंदाज में बेंच पर जाकर बैठ जाता है, तो उस दृश्य की कसक उन सारे दर्शकों को भीतर तक महसूस होगी जिन्होंने प्रेम का असली अर्थ जीवन में समझा है, तत् सुखे, सुखे त्वम! विजय सेतुपति के अभिनय की यही जीत है।
दो घंटे 14 मिनट की कसी हुई फिल्म
कहने को फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ दो घंटे 14 मिनट की एक सस्पेंस थ्रिलर है लेकिन एक निर्जीव टेडी बीयर को लेकर भी अल्बर्ट के संवाद फिल्म में ठहाके लगाने के भी मौके तलाश लेती है। फिल्म के वनलाइनर बहुत शानदार लिखे गए हैं। पूरी फिल्म एक रात की कहानी है लिहाजा दर्शकों को ये आखिर तक बांधे रखती है। इसमें इसकी पटकथा और संपादन दोनों की जीत है। कलात्मक निर्देशन, चुस्त पटकथा, सामान्य से सुनाई देने वाले लेकिन गहरे अर्थ वाले संवाद, कैटरीना और विजय का शानदार अभिनय, और साथ में अरिजीत व पैपॉन की स्वर लहरियां फिल्म को सिनेमाई आनंद देने वाली कहानी बना देते हैं। फिल्म के सहायक कलाकारों में बच्ची बनी परी, पुलिस अफसरों के किरदार में विनय पाठक व प्रतिमा कन्नन, कैटरिंग कारोबारी बने संजय कपूर और उनकी पत्नी के किरदार में अश्विनी कलसेकर ने बहुत बढ़िया काम किया है। और हां, राधिका आप्टे भी तो हैं। रोजी का उनका किरदार बहुत थोड़ी देर का है लेकिन असल कैटलिस्ट फिल्म का वही तो है..!