हिंदी सिनेमा में बायोपिक का चलन ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी और वी शांताराम निर्देशित डॉ. कोटनीस की अमर कहानी (1946) के दिनों से चला आ रहा है। बायोपिक और डॉक्यूमेंट्री का मूल फर्क यही है कि बायोपिक किसी भी इंसान के गुण या दोष के आधार पर बनी फिल्म होती है। यह निर्देशक और निर्माता पर निर्भर करता है कि वह फिल्म में संबंधित शख्सियत के किस पहलू को उजागर करता है। दर्शक भी यही मानकर फिल्म देखने जाता है कि यह निर्देशक का किसी शख्सीयत को देखने का उसका अपना नजरिया है। यही वजह है कि पिछले साल रिलीज हुई संजू देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली तीसरे नंबर की भारतीय फिल्म बनी। अब बारी पीएम नरेंद्र मोदी की है।
Movie Review: फिल्मी परदे पर भी नया इतिहास रचने को तैयार पीएम नरेंद्र मोदी, इतने मिले स्टार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिंदी सिनेमा में बायोपिक का चलन ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी और वी शांताराम निर्देशित डॉ. कोटनीस की अमर कहानी (1946) के दिनों से चला आ रहा है। बायोपिक और डॉक्यूमेंट्री का मूल फर्क यही है कि बायोपिक किसी भी इंसान के गुण या दोष के आधार पर बनी फिल्म होती है। यह निर्देशक और निर्माता पर निर्भर करता है कि वह फिल्म में संबंधित शख्सियत के किस पहलू को उजागर करता है। दर्शक भी यही मानकर फिल्म देखने जाता है कि यह निर्देशक का किसी शख्सीयत को देखने का उसका अपना नजरिया है। यही वजह है कि पिछले साल रिलीज हुई संजू देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली तीसरे नंबर की भारतीय फिल्म बनी। अब बारी पीएम नरेंद्र मोदी की है।
फिल्म पीएम नरेंद्र मोदी एक ऐसे शख्स की गुणगाथा है जिसने बचपन मुफलिसी में गुजारा, जवानी में ही मां का आशीर्वाद लेकर संन्यासी बन गया, गुरु के कहने पर बस्ती में लौटा और अपनी ही पार्टी की अंदरूनी सियासत से जूझकर जननायक बना। बाल नरेंद्र स्टेशन पर चीन सीमा पर जाते फौजियों को जब मुफ्त में चाय पिलाता है, तो ये फिल्म का पहला आधार होता है। फिर वह अपने गुरु को चाकू देते समय इसका दस्ता आगे करता है, तो यह जनहित की दूसरी धुरी बनती है।
दर्शन कुमार को फिर उन्होंने फिल्म में ऐसे उत्प्रेरक के तौर पर इस्तेमाल किया है जो मोदी को खत्म करने की साजिश रचने वालों का मोहरा है। अपने चैनल का वह जमकर दुरुपयोग भी करता है। ओमंग ने इस फिल्म को रिश्तों की डोर से बांधा है, ये रिश्ते मोदी-शाह के रिश्तों को जय वीरू और सचिन सहवाग जैसा रिश्ता बताते हैं। ये भी बताते हैं कि बच्चों को विवेकानंद का साहित्य पढ़ने की सीख देने वाले माता-पिता को तब क्या करना चाहिए, जब उनका अपना बच्चा विवेकानंद जैसा बनने की ठान ले।
मां इस फिल्म की सबसे मजबूत धुरी है। वह हर उस घड़ी में फिल्म को नया मोड़ देती है जब नरेंद्र मोदी के मन में विचारों का तूफान उठता है। विवेक ओबेरॉय को नरेंद्र मोदी के तौर पर स्वीकार करने में थोड़ा वक्त लगता है। लेकिन, ये बस उतनी ही देर तक है जितनी देर फिल्म गांधी में बेन किंगस्ले को मोहनदास के तौर पर स्वीकारने में लगता है। बस यहां कस्तूरबा नहीं हैं। इसके बाद विवेक ओबेरॉय ने नरेंद्र मोदी के तिलिस्म को परदे पर जीवंत कर दिया है। खासतौर से लाइव इंटरव्यू में मोदी बने विवेक ओबेरॉय की अदाकारी तालियों का हकदार बनती है। मां के रूप में जरीना वहाब, शाह के रूप में मनोज जोशी और टीवी पत्रकार के रूप में दर्शन कुमार ने दमदार काम किया है और फिल्म को मजबूत बनाया है।