Daldal Review: भूमि की बेहतर कोशिश पर कंफ्यूजन के 'दलदल' में फंसे निर्देशक, टीवी के क्राइम शोज इससे बेहतर
Bhumi Pednekar Starrer Daldal Review: भूमि पेडनेकर अभिनीत वेब सीरीज ‘दलदल’ ओटीटी पर रिलीज हो चुकी है। क्या इसमें भूमि का नया अवतार देखने को मिला ? क्या यह सीरीज बांधकर रखती है? ये सारे जवाब मिलेंगे इस रिव्यू में…
विस्तार
‘दलदल’ एक ऐसी सीरीज है जो एपिसोड दर एपिसोड अपने ही बनाए दलदल में धंस जाती है। इसका ट्रेलर देखकर जहां यह महसूस हुआ था कि इसमें जबरदस्त सस्पेंस होगा, वहीं यह उसके उलट इमोशंस पर ज्यादा फोकस करती है। चलिए यहां जानते हैं कैसी है ये सीरीज…
कहानी
कहानी मुंबई क्राइम ब्रांच की डीसीपी रीटा फरेरा (भूमि पेडनेकर) और उनके पहले केस के इर्द-गिर्द बुनी गई है। रीटा आठ हफ्तों तक मुंबई के एक रेड लाइट एरिया में टीचर बनकर रहती हैं और फिर वहां चल रही बाल तस्करी का खुलासा करती हैं। इस ऑपरेशन को देखते हुए रीटा को प्रमोशन मिल जाता है पर उनके साथ पुलिस ऑफिसर विक्रम साठे (चिनमय मंडलेकर) को नहीं मिलता, जिससे विक्रम उनसे चिढ़ने लगता है।
रीटा खुद बचपन में एक बड़े ट्राॅमा से गुजरी है। वो ज्यादा खुश नहीं रहती और उसकी पर्सनल लाइफ भी कुछ खास नहीं चल रही। वह अपने बॉयफ्रेंड से भी जल्द अलग होना चाहती है।
इसी बीच मुंबई में सीरियल किलिंग शुरू हो जाती है। केस सॉल्व करने की जिम्मेदारी रीटा को सौंपी जाती है। रीटा भी इस केस के जरिए खुद को साबित करने लग जाती है। दूसरी तरफ कहानी दिखाई है एक ड्रग एडिक्ट साजिद (आदित्य रावल) और उसकी प्रेमिका अनीता उर्फ अनंत (समारा तिजाेरी) की। अब क्या रीटा उस सीरियल किलर को पकड़ पाएंगी ? वो अपना रिश्ता बचाते हुए खुद को साबित कर पाएंगी ? साजिद और अनीता की क्या रिश्ता है? यह सब जानने के लिए आपको यह सीरीज देखनी होगी।
कुल मिलाकर सीरीज की कहानी आपको तीन जगह लेकर जाती है। पहले भाग में आपको लगता है कि कहानी बाल तस्करी पर है, दूसरे भाग में ये सीरियल किलिंग पर बेस्ड लगती है और अंत में इसे ट्राॅमा से गुजर रहे लोगों की कहानी बना दिया जाता है। अंत तक दर्शक यह तय ही नहीं कर पाते कि इसकी कहानी है किस बारे में ?
प्रेजेंटेशन
अब हमने ताे फिर भी यहां कहानी बताते हुए आपको थोड़ा सस्पेंस में छोड़ दिया पर मेकर्स ने तो सीरीज के दूसरे ही एपिसोड में सारे राज खोल दिए। अब बाकी के पांच एपिसोड आप सिर्फ अपने मन को तसल्ली देने के लिए देखते हो। सात एपिसोड की इस पूरी सीरीज में कई कहानियों का ऐसा 'दलदल' है जिसमें से आपको कोई भी कहानी पूरी तरह समझ नहीं आती।
उल्टा एक समय बाद आप खीझ जाते हैं कि मैं इतना दुख क्यों ही देखूं ? सीरीज में आप हर मोड़ पर यही सोचते है कि कब कोई ऐसा मोड़ आएगा जिससे आपकी रुचि बढ़ेगी? पर इंतजार करते करते सीरीज ही खत्म हो जाती है। कुछ क्राइम सीन बेहतर बने हैं पर इनके पीछे की कहानी अति साधारण है।
पहले एपिसोड में भूमि पेडनेकर के कुछ सीन देखकर लगता है कि यहां वो कुछ ताबड़तोड़ एक्शन करेंगी पर वैसा होता नहीं। सीरीज के अंत तक आपको एक कमजोर पुलिसिया थप्पड़ और दो-चार लात-घूंसों के अलावा और कुछ नहीं मिलता।
सस्पेंस को थीम लाइन लेकर बनाई गई ये वेब सीरीज दूर-दूर तक कहीं भी आपके अंदर रोमांच पैदा नहीं करती।
अभिनय
'दलदल' की कमजोर कहानी का खामियाजा किरदारों को उठाना पड़ता है। सीरीज में भूमि का किरदार चुप रहने वाला है। उसके अंदर एक दर्द है और भूमि ने इसे बड़े ही अच्छे से निभाया। उनका ऐसा किरदार निभाने के लिए हामी भर देना ही बड़ी बात है। हालांकि, एक समय के बाद लगता है कि वो पूरी सीरीज में एक जैसी ही दिख रही हैं और यह उनकी मजबूरी थी क्योंकि उनका किरदार लिखा ही वैसा गया था।
दीपक तिजोरी की बेटी समारा तिजोरी, कुछ सीन में बेहतर हैं पर बाकी जगह ओवरड्रामेटिक हैं। परेश रावल के बेटे आदित्य रावल पूरी सीरीज में नशे में ही रहते हैं। उन्हें देखकर हमें भी कुछ फील ही नहीं होता।
चिनमय का किरदार इस सीरीज में आपको चिढ़ाने के लिए हैं और यह काम वो बखूबी करते हैं। भूमि की साथी इंदू महात्रे के रूप में गीता अग्रवाल का काम बढ़िया है। बाकी कलाकारों में अनंत महादेवन, राहुल भट्ट, सौरभ गाेयल और विजय कृष्णा कुछ कुछ देर के लिए हैं और काम सबका ठीक ही है।
निर्देशन
निर्देशक अमृत राज गुप्ता कई कहानियां संभालने के चक्कर में कोई नहीं संभाल पाए। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने क्या सोचकर एक सस्पेंस सीरीज बनाई जिसमें वे दूसरे ही एपिसोड में सबकुछ बता देते हैं। इसके बाद तो कहानी उनके हाथों से बिखरती ही जाती है।
बीच में अमृत ने कई बार कोशिश की कि वो दर्शकों को इस बात को लेकर कन्फ्यूज करें कि असली किलर कौन है? पर वो भूल गए कि आज का दर्शक बहुत तेज हो गया है।
अंत तक यह इतनी लचर हो जाती है कि आप सीन आगे बढ़ाकर देखने लगते हैं। इसके बाद जब वो कलाकारों के ट्रॉमा की वजह बातते हैं तो वो उनता गहरा असर नहीं करती जितना करना चाहिए।
खामियां
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सात एपिसोड की वेब सीरीज में सस्पेंस की भारी कमी महसूस होती है।
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आधी सीरीज में लाइट की कमी खलती है। कई सीन में चेहरे तक आपको ठीक से नहीं दिखते।
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कई जगह बार-बार फ्लैश बैक दिखाया गया है, वो इरिटेट करता है।
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आखिरी के दो एपीसोड में सीरीज को जबरन खींचा गया है। इसे और जल्दी खत्म कर सकते थे।
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बैकग्राउंड म्यूजिक भी हर सीन में एक सा ही महसूस होता है।
खूबियां
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वेब सीरीज का सबसे अच्छा हिस्सा इसके क्राइम सीन हैं, जो आपके मन में हल्का सा डर पैदा करते हैं।
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कुछ किरदार अच्छे हैं। उनसे आप जुड़ा हुआ भी महसूस करते हैं।
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फ्लैशबैक वाले सीन अच्छे हैं। प्रोडक्शन टीम ने पुराना माहौल दिखाने पर अच्छा काम किया है।
देखें या नहीं
अगर आप इस क्राइम सीरीज की जगह कोई एक एपिसोड वाला क्राइम शो भी देख लेगें तो वो इससे ज्यादा बेहतर होगा। किसी वीकेंड पर देखने के लिए कुछ नया नहीं है तो देख लें। भूमि पेडनेकर को नए रोल में देखना हो तो देख सकते हैं।