'Delulu is the Solulu': यूनिवर्स सब दिला देगा, कितना सच है Gen Z का Manifestation का दावा?
क्या सिर्फ सोचने से सपने सच हो सकते हैं? Gen Z की दुनिया में 'Delulu is the Solulu' और Manifestation का ट्रेंड यही दावा करता है कि अगर आप खुद को पहले से सफल मान लें, तो यूनिवर्स भी आपके लिए रास्ते खोल देता है। लेकिन क्या यह सिर्फ पॉजिटिव सोच की ताकत है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार भी है? आइए जानते हैं कि सोशल मीडिया का यह वायरल ट्रेंड कितना सच है और कितनी है इसकी हकीकत।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
'अगर तुम पहले से मान लो कि तुम्हारा सपना पूरा हो चुका है, तो यूनिवर्स उसे सच कर देगा।' अगर आपने इंस्टाग्राम या सोशल मीडिया पर समय बिताया है, तो शायद आपने 'Delulu is the Solulu' जरूर सुना होगा। Gen Z की भाषा में इसका मतलब है थोड़ा Delusional (भ्रम में) होना ही Solution (समाधान) है।
सपनों की नौकरी चाहिए? रिलेशनशिप में आना है? करोड़पति बनना है? बस उसे ऐसे महसूस करो जैसे वह पहले से तुम्हारे पास है। यही है Manifestation का कॉन्सेप्ट, जो सोशल मीडिया पर इस समय सबसे बड़े वेलनेस ट्रेंड्स में से एक बन चुका है।
Manifestation आखिर है क्या?
Manifestation का सीधा मतलब है, जिस चीज को पाना चाहते हैं, उसकी बार-बार कल्पना करना, उस पर पूरा विश्वास रखना और खुद को पहले से उस स्थिति में महसूस कराना। इस विचार को मानने वाले कहते हैं कि हमारी सोच और भावनाएं एक तरह की ऊर्जा (Energy) हैं। यूनिवर्स उसी ऊर्जा के हिसाब से हमें मौके और नतीजे देता है। अगर आपकी Manifestation पूरी नहीं हो रही, तो सोशल मीडिया के कई लोग इसका कारण आपकी नकारात्मक ऊर्जा या Low Frequency बताते हैं।
Manifestation ट्रेंड आया कहां से?
Manifestation कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं है। इसकी जड़ें 19वीं सदी के New Age Spirituality में मिलती हैं। 2006 में रोंडा बर्न की किताब द सीक्रेट ने इसे पूरी दुनिया में लोकप्रिय बना दिया। किताब का दावा था कि Law of Attraction के जरिए सिर्फ पॉजिटिव थिंकिंग और विज्युलाइजेशन से कोई भी अपनी मनचाही चीज हासिल कर सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दावे के समर्थन में मजबूत वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं।
क्या साइंस भी कहती है कि सोच बदलो, जिंदगी बदल जाएगी?
हां...लेकिन ये आधी बात है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि Visualization और Positive Self-talk से आत्मविश्वास बढ़ता है। अगर आपको अपनी क्षमता पर भरोसा होगा, तो आप ज्यादा मेहनत करेंगे और लक्ष्य हासिल करने की संभावना भी बढ़ जाएगी। लेकिन रिसर्च यह भी कहती है कि सिर्फ सोचने से कुछ नहीं बदलता। असली बदलाव तभी आता है जब सोच के साथ एक्शन भी हो। यानी Vision Board बनाना ठीक है... लेकिन उसके बाद उसे फॉलो भी करना पड़ता है।
क्या Manifestation नुकसान भी पहुंचा सकती है?
यहीं से कहानी का दूसरा पहलू शुरू होता है। हाल के शोध बताते हैं कि जो लोग Manifestation पर बहुत ज्यादा भरोसा करते हैं, वे कई बार अपनी सफलता की संभावना का जरूरत से ज्यादा अनुमान लगाने लगते हैं। कुछ लोग जल्दी अमीर बनने वाले दावों या Success Guru की बातों में भी आसानी से आ जाते हैं। यानी Confidence बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन अगर वह Reality से कट गए, तो दिक्कत शुरू हो सकती है।
क्या हर सकारात्मक सोच गलत है?
बिल्कुल नहीं... समस्या तब होती है जब कोई व्यक्ति यह मानने लगे कि अगर मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई, तो सिर्फ मेरी सोच गलत थी या Universe मेरे खिलाफ है। कुछ शोधों में यह भी पाया गया कि जरूरत से ज्यादा Positive Affirmations कुछ लोगों, खासकर मानसिक तनाव या अवसाद से जूझ रहे लोगों को और ज्यादा निराश कर सकती हैं।
तो सही तरीका क्या है?
दिलचस्प बात यह है कि अब कई सोशल मीडिया क्रिएटर्स भी Manifestation का ज्यादा Practical Version सिखा रहे हैं। वे कहते हैं कि सीधे करोड़पति बनने की कल्पना करने के बजाय पहले छोटी-छोटी उपलब्धियों पर काम करो। यही तरीका मनोवैज्ञानिक Carol Dweck के Growth Mindset से भी मेल खाता है, जिसमें सफलता का रास्ता मेहनत, सीखने और लगातार सुधार से होकर गुजरता है।
"Delulu is the Solulu" सुनने में मजेदार लगता है और थोड़ी उम्मीद देना भी गलत नहीं है। लेकिन अगर Manifestation आपको Action लेने के लिए प्रेरित करे, तो यह मददगार हो सकती है। वहीं अगर यह आपको सिर्फ सपनों की दुनिया में रखे और मेहनत की जगह ले ले, तो यही ट्रेंड आपको Reality से दूर भी ले जा सकता है।