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Ambala News: एक बार बंधक तो हमेशा बंधक सेशन कोर्ट का फैसला बरकरार
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अंबाला सिटी। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश हितेश गर्ग की अदालत ने दुकान के मालिकाना हक और बंधक (मोर्गेज) छुड़ाने के मामले में फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार बंधक तो हमेशा बंधक का कानूनी सिद्धांत अटल है।
कोर्ट ने बचाव पक्ष की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि तीन साल की समय सीमा बीत जाने के बाद मालिक का हक खत्म हो गया है। जानकारी के अनुसार अंबाला सिटी के हिसार रोड निवासी बृज मोहन ने साल 2006 में अपनी एक दुकान गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी के पास 30,000 रुपये में बंधक रखी थी। समझौते के तहत तीन साल बाद पैसे लौटाकर दुकान वापस लेनी थी। समय बीतने पर जब बृज मोहन ने पैसे देने और दुकान खाली करने को कहा तो गुरप्रीत ने दुकान लौटाने से मना कर दिया। इसके बाद पीड़ित ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। निचली अदालत से केस हारने के बाद गुरप्रीत सिंह ने जिला अदालत में अपील दायर की थी।
उनकी दलील थी कि बृज मोहन ने तीन साल के भीतर पैसे जमा नहीं किए, इसलिए अब उसका हक खत्म हो चुका है। कानूनी प्रक्रिया के तहत कोर्ट में पैसे जमा नहीं कराए गए, इसलिए केस चलने योग्य नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि बंधक छुड़ाना एक वैधानिक और निरंतर अधिकार है। इसे केवल अदालत के आदेश से ही खत्म किया जा सकता है, महज समय बीतने से नहीं। अदालत ने यह भी माना कि बंधक राशि मात्र 30,000 रुपये थी और इसमें कोई ब्याज या अन्य विवाद नहीं था, इसलिए निचली अदालत की ओर से सीधे कब्जा दिलाने का फैसला सही है। ब्यूरो
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कोर्ट ने बचाव पक्ष की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि तीन साल की समय सीमा बीत जाने के बाद मालिक का हक खत्म हो गया है। जानकारी के अनुसार अंबाला सिटी के हिसार रोड निवासी बृज मोहन ने साल 2006 में अपनी एक दुकान गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी के पास 30,000 रुपये में बंधक रखी थी। समझौते के तहत तीन साल बाद पैसे लौटाकर दुकान वापस लेनी थी। समय बीतने पर जब बृज मोहन ने पैसे देने और दुकान खाली करने को कहा तो गुरप्रीत ने दुकान लौटाने से मना कर दिया। इसके बाद पीड़ित ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। निचली अदालत से केस हारने के बाद गुरप्रीत सिंह ने जिला अदालत में अपील दायर की थी।
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उनकी दलील थी कि बृज मोहन ने तीन साल के भीतर पैसे जमा नहीं किए, इसलिए अब उसका हक खत्म हो चुका है। कानूनी प्रक्रिया के तहत कोर्ट में पैसे जमा नहीं कराए गए, इसलिए केस चलने योग्य नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि बंधक छुड़ाना एक वैधानिक और निरंतर अधिकार है। इसे केवल अदालत के आदेश से ही खत्म किया जा सकता है, महज समय बीतने से नहीं। अदालत ने यह भी माना कि बंधक राशि मात्र 30,000 रुपये थी और इसमें कोई ब्याज या अन्य विवाद नहीं था, इसलिए निचली अदालत की ओर से सीधे कब्जा दिलाने का फैसला सही है। ब्यूरो