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विजय दिवसः हरियाणा का वो जिला जहां के 12 जवानों ने दिया था अपना सर्वोच्च बलिदान, पढ़ें गौरवगाथा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भिवानी (हरियाणा) Published by: रोहतक ब्यूरो Updated Fri, 26 Jul 2019 02:31 AM IST
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vijay kargil diwas, Story Of kargil martyr
कारगिल विजय दिवस - फोटो : फाइल फोटो
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कारगिल युद्ध के ऑपरेशन विजय को 20 वर्ष हो गए हैं। जिले के 12 जवानों ने कारगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए और देश पर अपनी जान न्यौछावर कर दी। एक जवान गंभीर रूप से घायल भी हुआ। मातृभूमि पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले वीर बलिदानी आज हमारे बीच नहीं है मगर उनकी यादें सभी के दिलों में बसी है। ये सभी साहस और युद्ध कौशल की मिसाल है। पूरा देश आज इन पर गर्व कर रहा है।

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पांच भाइयों ने लड़ा कारगिल युद्ध, एक तिरंगे में लिपटकर लौटा

कारगिल युद्ध के ऑपरेशन विजय में पांच भाइयों ने दुश्मनों से लोहा लिया और एक भाई तिरंगे में लिपटकर लौटा था। वो पल सेना में देश सेवा के प्रति समर्पित शेखावत परिवार के लिए ऐतिहासिक था। हर आंख नम थी, मगर हर किसी को कंवरपाल की शहादत पर गर्व था।

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भिवानी की जगत कॉलोनी में रहने वाले पवन कुमार शेखावत ने बताया कि पांच भाइयों प्रताप सिंह, लक्ष्मण, रामअवतार, कंवरपाल और वह खुद कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए उनकी गोलियों का सामना किया था। इस युद्ध में उसके भाई कंवरपाल शहीद हुए थे। गांव बनगोठड़ी के बस स्टैंड पर आज भी कंवरपाल की प्रतिमा गांव के युवाओं में देशभक्ति का जज्बा जगा रही है।

शहादत का नहीं मिला शेखावत परिवार को सम्मान

पवन का कहना है कि शहीद कंवरपाल भले ही देश के काम आए हों, मगर आज भी गांव में किसी भी संस्था पर शहीद का नाम अंकित नहीं है। जिससे उनकी भावनाएं आहत हो रही हैं। गांव के सरकारी स्कूल का नाम शहीद के नाम पर किया था, मगर यह मामला भी न्यायालय में चला गया। कोर्ट के आदेश पर नाम हटा दिया गया और शहीद के आश्रितों को नौकरी भी नहीं मिली।


सिद्धकाम ने ऑपरेशन विजय में खुद को किया सिद्ध
माटी के लाल सिद्धकाम ने कारगिल युद्ध के ऑपरेशन विजय में जो काम अपने हाथों में लिया, उसे पूरा करने के लिए आखिरी सांस तक दुश्मन के सामने डटे रहे। भिवानी के न्यू भारत नगर कॉलोनी में सिद्धकाम का परिवार आज भी उनकी वीरगाथा को याद कर रोमांचित हो उठता है। बवानीखेड़ा क्षेत्र के गांव पुर निवासी सिद्धकाम वशिष्ठ 18 ग्रेनेडियर पलटन में हलवदार के तौर पर तैनात थे।

 

उन्हें पलटन में शेरखां के नाम से जाना जाता था। शेर खां ने गोलीबारी के बीच घुसपैठियों को मार गिराने के बाद उन्हें घसीटकर लाने और जिंदा पकड़वाने में मदद की थी। 14 जून 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान 4590 प्वाइंट दुश्मनों से खाली कराने के समय सिद्धकाम देश के काम आए। सिद्धकाम की वीरांगना उर्मिला देवी ने बताया कि उन्हें आज भी वो लम्हा अच्छी तरह याद है जब सेना के अधिकारी उनके पति को शहादत के बाद तिरंगे में लिपटा हुआ लेकर लौटे थे।

उनकी आंखों में आंसू तो थे, मगर उन्हें अपने पति की शहादत पर भी गर्व था। अपने पोते कुनाल, निश्त्यांत व पोती अनामिका को दादी सेना में वीरता की कहानियां सुनाकर उनके अंदर भी देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भर रही हैं। जिले के जोगेंद्र कुमार, सुरेश कुमार, राजवीर सिंह, राम कुमार, राज कुमार, सिद्धराम, कुलदीप, संजय सिंह, लाल सिंह, सुरेंद्र सिंह ने शहादत प्राप्त की। कुछ घायल भी हुए।
 

कारगिल युद्ध में तिरंगा लहराने वाला अशोक व्यवस्था से हारा
कारगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाला जांबाज जवान अशोक कुमार देश की व्यवस्था से हार गया है। कारगिल जीत का तिरंगा फहराने वाला अशोक कुमार अब नौकरी की लिए भटक रहा है। पुश्तैनी जमीन पर खेती करने की सोची तो उस पर भू माफियाओं का कब्जा मिला। सीएम से लेकर पीएम तक से गुहार लगाई। मगर आश्वासन ही मिला।
 

 

अधिकारी ये तो मानते है कि जमीन अशोक के परिवार की है मगर कब्जा नहीं दिला पा रहे। जिले के गांव तिगड़ाना निवासी अशोक कुमार ने 1999 में कारगिल युद्ध की अंतिम जंग लड़ी थी। 24-26 जुलाई तक वह 5363 सैडल रिज चोटी पर डटकर दुश्मनों को खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई।
 

 

अशोक को भी तीन गोलियां लगी। बमबारी में उसका बायां पांव भी बुरी तरह जख्मी हो गया। अब वह व्यवस्थाओं से हार गया है। अशोक ने बताया कि गुरुग्राम के डूमा गांव में उसकी 28 एकड़ पुश्तैनी जमीन है। जिस पर अवैध कब्जा है। 2006 में जब उसने खेती करने की सोची तो वहां अवैध कब्जा था। अवैध कब्जा हटाने के राष्ट्रपति को शिकायत की। प्रशासनिक अधिकारियों, मुख्यमंत्री को शिकायत की। फरद उसके दादा के नाम है।

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