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लंदन से भारत लाई जाएगी मां सरस्वती की प्रतिमा: हरियाणा के संग्राहलय की बनेगी शोभा, अंग्रेज ले गए थे इंग्लैंड
Sun, 02 Aug 2026 12:13 PM IST
शाहिल शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Sun, 02 Aug 2026 12:13 PM IST
सार
मां सरस्वती की ये प्रतिमा 11वीं सदी की बताई जा रही है जिसे अंग्रेज इंग्लैंड ले गए थे । सरस्वती बोर्ड का लक्ष्य इस प्रतिमा को भारत लाकर सरस्वती सभ्यता से जुड़े क्षेत्रों में प्रदर्शित करना है।
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सरस्वती मां की प्रतिमा
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड ने लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूज़ियम से ग्यारहवीं सदी की प्राचीन मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। यह प्रतिमा मूल रूप से मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मंदिर की है, जिसे औपनिवेशिक काल (लगभग 1886–1891) में अंग्रेजों द्वारा इंग्लैंड ले जाया गया था।बोर्ड के उपाध्यक्ष धूमन सिंह किरमच ने इस संबंध में जानकारी दी।
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किरमच ने बताया कि यह प्रतिमा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व की है। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला परिसर को प्राचीन सरस्वती वाग्देवी मंदिर मानते हुए हिन्दू समाज को पूजा का अधिकार दिया है। इस आदेश के बाद प्रतिमा को वापस लाने की मांग और अधिक प्रासंगिक हो गई है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार विदेशों से प्राचीन धरोहरों को वापस लाने का अभियान चला रही है।
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पिछले कुछ वर्षों में कई दुर्लभ मूर्तियां और कलाकृतियां भारत लाई गई हैं, जिससे इस प्रयास को बल मिला है। हरियाणा सरस्वती बोर्ड ने इस विषय पर मध्य प्रदेश सरकार से संपर्क किया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को भी पत्राचार के माध्यम से अवगत कराया गया है। बोर्ड का लक्ष्य इस प्रतिमा को भारत लाकर सरस्वती सभ्यता से जुड़े क्षेत्रों में प्रदर्शित करना है। अंततः इसे हरियाणा में स्थापित सरस्वती संग्रहालय में प्रतिष्ठित किया जाएगा।
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प्रतिमा का ऐतिहासिक महत्व
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, यह प्रतिमा परमार राजवंश के ग्यारहवीं सदी के काल की है। इसे धार क्षेत्र में पुरातात्विक खुदाई के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने प्राप्त किया था। उस समय दो प्रतिमाएं मिली थीं, जिनमें से एक वर्तमान में भोजशाला में स्थापित है। दूसरी प्रतिमा ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखी गई है। यह प्रतिमा संगमरमर से बनी है और इसमें संस्कृत तथा देवनागरी में शिलालेख अंकित हैं।
शोध और सांस्कृतिक जिम्मेदारी
यदि यह प्रतिमा भारत वापस लाई जाती है, तो इन शिलालेखों पर गहन शोध किया जाएगा। इससे प्राचीन सभ्यता, सरस्वती नदी और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत के बारे में नई जानकारी मिलेगी। किरमच ने कहा कि सरस्वती नदी के तट पर विकसित सभ्यता भारतीय इतिहास की आधारशिला है। ऐसी धरोहरों को देश में वापस लाना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों से इस दिशा में सहयोग का आह्वान किया।