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16 साल बाद दुष्कर्म का आरोपी बरी: हाईकोर्ट ने मृत्यु पूर्व बयान को माना संदिग्ध, कहा-दोषसिद्धि सुरक्षित नहीं
Tue, 18 Aug 2026 09:13 AM IST
Nivedita
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Tue, 18 Aug 2026 09:13 AM IST
सार
अगस्त 2010 में रोहतक पीजीआई में महिला ने मृत्यु पूर्व बयान दिया था कि वह घर में अकेली थी। इसी दौरान आरोपी वहां पहुंचा और उसके साथ दुष्कर्म किया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट भी की गई।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के करीब 16 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए गए संदीप उर्फ काला को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला जिस कथित मृत्यु पूर्व बयान पर आधारित था, वह भरोसा पैदा नहीं करता। जांच एजेंसी के पास पर्याप्त अवसर होने के बावजूद पीड़िता का बयान न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने का कोई प्रयास नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इसे अभियोजन के मामले में गंभीर कमी माना।
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हाईकोर्ट ने कहा कि जब अभियोजन किसी आरोपी की दोषसिद्धि के लिए मृत्यु पूर्व बयान पर निर्भर करता है तो उसका न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज न कराया जाना महत्वपूर्ण है। पीठ ने संदेह का लाभ देते हुए निचली अदालत की ओर से सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।
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पीजीआई में दर्ज हुआ था बयान
मामले की शुरुआत दो अगस्त 2010 को रोहतक स्थित पीजीआई में दर्ज कराए गए बयान से हुई थी। अभियोजन के अनुसार, महिला घर में अकेली थी। इसी दौरान आरोपी वहां पहुंचा और उसके साथ दुष्कर्म किया। आरोप था कि विरोध करने पर उसके साथ मारपीट भी की गई।
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इसके बाद महिला ने चाय के साथ एल्युमिनियम फॉस्फाइड की दो गोलियां खा लीं। उसका चिकित्सकीय परीक्षण शाम 7:22 बजे हुआ। इसके बाद रात 8:35 बजे चिकित्सकीय सूचना भेजी गई और रात 9:45 बजे उसका बयान दर्ज किया गया। इसी बयान के आधार पर तीन अगस्त की रात 12:30 बजे भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 309 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया। उपचार के दौरान रात 12:05 बजे महिला की मौत हो गई।
रोहतक के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 23 दिसंबर 2013 को संदीप उर्फ काला को दोषी ठहराते हुए 12 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
पोस्टमार्टम में शरीर पर नहीं मिले चोट के निशान
हाईकोर्ट के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक के बयान का भी उल्लेख किया गया। चिकित्सक ने बताया कि महिला के शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी। दोनों कलाइयों पर भी चोट के निशान नहीं थे। आरोपी की चिकित्सकीय जांच करने वाली डॉक्टर ने भी उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं पाए थे।
मृत्यु पूर्व बयान अकेला आधार बन सकता है लेकिन विश्वसनीय होना जरूरी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार स्वैच्छिक, सत्य और विश्वसनीय मृत्यु पूर्व बयान अकेले भी दोषसिद्धि का आधार बन सकता है। लेकिन इसके लिए अदालत को यह विश्वास होना चाहिए कि बयान पूरी तरह भरोसेमंद है।
अदालत ने कहा कि मृत्यु पूर्व बयान देने वाले व्यक्ति से आरोपी को जिरह का अवसर नहीं मिलता, इसलिए ऐसे बयान की विश्वसनीयता परखते समय अदालत को विशेष सावधानी बरतनी होती है। मौजूदा मामले में बयान की विश्वसनीयता को लेकर संदेह होने के कारण आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया।