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सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना दिव्यांग अधिकार कानून के तहत मौलिक अधिकार नहीं : हाईकोर्ट
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- दृष्टिबाधित और 70% से अधिक दिव्यांग कर्मचारियों को 60 वर्ष तक सेवा का अधिकार नहीं
- हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार का फैसला रखा बरकरार, कर्मचारियों को झटका
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसके तहत दृष्टिबाधित और 70 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांग सरकारी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु तक सेवा में बने रहने की विशेष छूट समाप्त कर दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत 60 वर्ष तक नौकरी करने का कोई वैधानिक या मौलिक अधिकार नहीं मिलता। सरकार सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति की आयु में बदलाव करने के लिए सक्षम है।
हाईकोर्ट ने राजनिश कुमार व अन्य कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि तीन फरवरी 2026 को जारी अधिसूचना वैध है। इसके जरिए हरियाणा सिविल सेवा (सामान्य) नियम, 2016 के नियम 143 में संशोधन कर दिव्यांग और दृष्टिबाधित कर्मचारियों को 60 वर्ष तक सेवा विस्तार देने वाले प्रावधान हटा दिए गए थे।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत सरकार पर दिव्यांग कर्मचारियों को उचित समायोजन (रीजनबल एकॉमोडेशन) उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है। इसलिए 60 वर्ष तक सेवा का लाभ समाप्त करना उनके अधिकारों का हनन है। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। काेर्ट ने कहा कि उचित समायोजन का अर्थ कार्यस्थल पर आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना है, जैसे ब्रेल, स्क्रीन रीडर, सहायक उपकरण, सुगम कार्यालय, लचीली कार्य व्यवस्था आदि। इसका अर्थ सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना नहीं है।
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अदालत ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम में कहीं भी 60 वर्ष तक सेवा जारी रखने का अधिकार नहीं दिया गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधित नियम लागू होने के बाद कोई भी कर्मचारी 60 वर्ष तक सेवा जारी रखने का दावा नहीं कर सकता, चाहे वह 58 वर्ष की आयु पार कर चुका हो। हालांकि, जिन कर्मचारियों ने अदालत के अंतरिम आदेश के कारण 58 वर्ष के बाद भी काम किया है, उन्हें उस अवधि का वेतन, पेंशन और अन्य सेवा लाभ वापस नहीं लिए जाएंगे। अदालत ने अंत में सभी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि सरकार की ओर से विशेष सेवा विस्तार की सुविधा वापस लेना न तो दिव्यांग कर्मचारियों के किसी अर्जित अधिकार का उल्लंघन है और न ही यह संविधान या दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के विपरीत है।
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- हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार का फैसला रखा बरकरार, कर्मचारियों को झटका
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसके तहत दृष्टिबाधित और 70 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांग सरकारी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु तक सेवा में बने रहने की विशेष छूट समाप्त कर दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत 60 वर्ष तक नौकरी करने का कोई वैधानिक या मौलिक अधिकार नहीं मिलता। सरकार सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति की आयु में बदलाव करने के लिए सक्षम है।
हाईकोर्ट ने राजनिश कुमार व अन्य कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि तीन फरवरी 2026 को जारी अधिसूचना वैध है। इसके जरिए हरियाणा सिविल सेवा (सामान्य) नियम, 2016 के नियम 143 में संशोधन कर दिव्यांग और दृष्टिबाधित कर्मचारियों को 60 वर्ष तक सेवा विस्तार देने वाले प्रावधान हटा दिए गए थे।
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याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत सरकार पर दिव्यांग कर्मचारियों को उचित समायोजन (रीजनबल एकॉमोडेशन) उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है। इसलिए 60 वर्ष तक सेवा का लाभ समाप्त करना उनके अधिकारों का हनन है। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। काेर्ट ने कहा कि उचित समायोजन का अर्थ कार्यस्थल पर आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना है, जैसे ब्रेल, स्क्रीन रीडर, सहायक उपकरण, सुगम कार्यालय, लचीली कार्य व्यवस्था आदि। इसका अर्थ सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना नहीं है।
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अदालत ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम में कहीं भी 60 वर्ष तक सेवा जारी रखने का अधिकार नहीं दिया गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधित नियम लागू होने के बाद कोई भी कर्मचारी 60 वर्ष तक सेवा जारी रखने का दावा नहीं कर सकता, चाहे वह 58 वर्ष की आयु पार कर चुका हो। हालांकि, जिन कर्मचारियों ने अदालत के अंतरिम आदेश के कारण 58 वर्ष के बाद भी काम किया है, उन्हें उस अवधि का वेतन, पेंशन और अन्य सेवा लाभ वापस नहीं लिए जाएंगे। अदालत ने अंत में सभी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि सरकार की ओर से विशेष सेवा विस्तार की सुविधा वापस लेना न तो दिव्यांग कर्मचारियों के किसी अर्जित अधिकार का उल्लंघन है और न ही यह संविधान या दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के विपरीत है।