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Chandigarh-Haryana News: सामाजिक-आर्थिक अंकों का लाभ पाकर वरिष्ठता पाने वालों को हाईकोर्ट से झटका
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- अंकों के लाभ के आधार पर बनी वरिष्ठता सूची को हाईकोर्ट ने दिया असंवैधानिक करार
- 2019 के विज्ञापन के तहत नियुक्त क्लर्कों की वरिष्ठता सूची संशोधित करने का आदेश
चंडीगढ़। हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग की ओर से 2019 में विज्ञापित भर्ती में नियुक्त सैकड़ों क्लर्कों को पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने झटका दिया है। हाईकोर्ट ने सामाजिक व आर्थिक आधार पर अंकों का लाभ देकर बनाई गई वरिष्ठता सूची को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है और इसे संशोधित करने का निर्देश दिया है।
कैथल निवासी ललित शर्मा ने 2019 में निकली क्लर्क भर्ती के तहत तैयार वरिष्ठता सूची को चुनौती थी। पिहोवा नगर कमेटी में क्लर्क याची ने बताया कि 538 क्लर्कों की वरिष्ठता सूची में लिखित परीक्षा में कम अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को सामाजिक व आर्थिक श्रेणी के तहत 5 से 10 बोनस अंक देकर उनसे ऊपर रखा गया जो कानूनन गलत है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सामाजिक व आर्थिक अंक केवल चयन और नियुक्ति तक सीमित होने चाहिए। इन्हीं अंकों के आधार पर विभागीय वरिष्ठता तय करना और फिर पदोन्नति देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि सामाजिक-आर्थिक मानदंडों पर अंक देना पहले ही असंवैधानिक ठहराया जा चुका है और इस पर सर्वोच्च न्यायालय की भी मुहर लग चुकी है।
राज्य सरकार और आयोग ने तर्क दिया कि नीरज मामले में समीक्षा याचिकाएं लंबित हैं इसलिए मामला विचाराधीन है। हालांकि कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा कि समीक्षा याचिका लंबित होने के नाम पर असंवैधानिकता को जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग को आदेश दिया कि वह चार सप्ताह में केवल लिखित परीक्षा के अंकों के आधार पर संशोधित मेरिट सूची तैयार करे और उसे शहरी स्थानीय निकाय निदेशक को भेजे। इसके बाद निदेशक को संशोधित मेरिट के अनुसार वरिष्ठता तय कर चार सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करने होंगे।
कोर्ट ने कहा कि आदेश की अवहेलना की स्थिति में याचिकाकर्ता को अवमानना कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता होगी। यह फैसला 2019 की भर्ती के तहत नियुक्त सभी कर्मचारियों की वरिष्ठता और पदोन्नति प्रक्रिया पर इसका सीधा असर डालेगा। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे निर्णय केवल मूल याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि सभी समान रूप से प्रभावित कर्मचारियों पर लागू होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक-आर्थिक मानदंडों और अनुभव के आधार पर दिए गए बोनस अंक विभागीय वरिष्ठता और पदोन्नति तय करने के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि चयन के लिए दिए गए बोनस अंक विभागीय वरिष्ठता और पदोन्नति का आधार नहीं बन सकते।
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- 2019 के विज्ञापन के तहत नियुक्त क्लर्कों की वरिष्ठता सूची संशोधित करने का आदेश
चंडीगढ़। हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग की ओर से 2019 में विज्ञापित भर्ती में नियुक्त सैकड़ों क्लर्कों को पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने झटका दिया है। हाईकोर्ट ने सामाजिक व आर्थिक आधार पर अंकों का लाभ देकर बनाई गई वरिष्ठता सूची को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है और इसे संशोधित करने का निर्देश दिया है।
कैथल निवासी ललित शर्मा ने 2019 में निकली क्लर्क भर्ती के तहत तैयार वरिष्ठता सूची को चुनौती थी। पिहोवा नगर कमेटी में क्लर्क याची ने बताया कि 538 क्लर्कों की वरिष्ठता सूची में लिखित परीक्षा में कम अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को सामाजिक व आर्थिक श्रेणी के तहत 5 से 10 बोनस अंक देकर उनसे ऊपर रखा गया जो कानूनन गलत है।
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याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सामाजिक व आर्थिक अंक केवल चयन और नियुक्ति तक सीमित होने चाहिए। इन्हीं अंकों के आधार पर विभागीय वरिष्ठता तय करना और फिर पदोन्नति देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि सामाजिक-आर्थिक मानदंडों पर अंक देना पहले ही असंवैधानिक ठहराया जा चुका है और इस पर सर्वोच्च न्यायालय की भी मुहर लग चुकी है।
राज्य सरकार और आयोग ने तर्क दिया कि नीरज मामले में समीक्षा याचिकाएं लंबित हैं इसलिए मामला विचाराधीन है। हालांकि कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा कि समीक्षा याचिका लंबित होने के नाम पर असंवैधानिकता को जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग को आदेश दिया कि वह चार सप्ताह में केवल लिखित परीक्षा के अंकों के आधार पर संशोधित मेरिट सूची तैयार करे और उसे शहरी स्थानीय निकाय निदेशक को भेजे। इसके बाद निदेशक को संशोधित मेरिट के अनुसार वरिष्ठता तय कर चार सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करने होंगे।
कोर्ट ने कहा कि आदेश की अवहेलना की स्थिति में याचिकाकर्ता को अवमानना कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता होगी। यह फैसला 2019 की भर्ती के तहत नियुक्त सभी कर्मचारियों की वरिष्ठता और पदोन्नति प्रक्रिया पर इसका सीधा असर डालेगा। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे निर्णय केवल मूल याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि सभी समान रूप से प्रभावित कर्मचारियों पर लागू होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक-आर्थिक मानदंडों और अनुभव के आधार पर दिए गए बोनस अंक विभागीय वरिष्ठता और पदोन्नति तय करने के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि चयन के लिए दिए गए बोनस अंक विभागीय वरिष्ठता और पदोन्नति का आधार नहीं बन सकते।