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Karnal News: नए ऑर्डर मिल रहे पर माल भेजने से डर रहे निर्यातक
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करनाल। कर्ण नगरी के बासमती चावल की मांग देश ही नहीं बल्कि गल्फ देशों में लगातार बढ़ती जा रही है। युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशिया के देशों से चावल के नए ऑर्डर भी आ रहे हैं लेकिन वहां जारी युद्ध और अस्थिर हालात ने चावल व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि ऑर्डर मिलने के बावजूद कई निर्यातक माल भेजने से बच रहे हैं या बेहद सतर्कता बरत रहे हैं। उन्हें सबसे ज्यादा डर भुगतान फंसने और माल की सुरक्षित डिलीवरी को लेकर है।
चावल निर्यातकों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण वहां के कई व्यापारियों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था भी पूरी तरह सामान्य नहीं है। ऐसे में पहले से भेजे गए माल का भुगतान समय पर नहीं मिल पा रहा है, जबकि कुछ भुगतान पूरी तरह अटक गए हैं। इसी वजह से व्यापारी अब नए ऑर्डर पर उधार में माल भेजने से कतरा रहे हैं।
बंदरगाहों पर फंसा था दो लाख टन चावल :
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल बताते हैं कि युद्ध और समुद्री मार्गों में बढ़े जोखिम के कारण देश के विभिन्न बंदरगाहों पर करीब दो लाख टन चावल का स्टॉक अटक गया था। इसमें से लगभग आधा चावल अब धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर रवाना हो चुका है। कुछ खेप समुद्र में रास्ते में है जबकि बड़ी मात्रा में चावल अभी भी बंदरगाहों और गोदामों में पड़ा हुआ है। निर्यातकों का कहना है कि जहाजों की उपलब्धता, बढ़ा हुआ बीमा खर्च और समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने व्यापार की लागत को भी बढ़ा दिया है। इससे कई सौदों की लाभप्रदता प्रभावित हो रही है। उनका मानना है कि चावल की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है लेकिन भुगतान और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं के कारण कारोबार की गति धीमी पड़ रही है। कई निर्यातक अब केवल अग्रिम भुगतान या बैंक गारंटी के आधार पर ही माल भेजने पर विचार कर रहे हैं।
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गल्फ देशों में सबसे अधिक जाता है करनाल का बासमती :
जिले में विशेष तौर धान कटोरा कहे जाने वाले तरावड़ी जैसे क्षेत्र से तैयार होने वाला बासमती चावल बड़ी मात्रा में गल्फ देशों को निर्यात किया जाता है। इनमें बहरीन, इराक, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) प्रमुख बाजार हैं। इन देशों में भारतीय बासमती की गुणवत्ता और स्वाद के कारण हमेशा अच्छी मांग रहती है। व्यापारियों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में ऑर्डर की कमी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी चुनौती भुगतान की सुरक्षा और माल की समय पर डिलीवरी है। अगर युद्ध और तनाव जल्द समाप्त हो जाता है तो चावल निर्यात फिर से सामान्य गति पकड़ सकता है लेकिन फिलहाल कारोबार अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। चावल व्यापारियों का कहना है कि कुछ सप्ताह में कई खरीदारों ने नए ऑर्डर दिए हैं लेकिन पुराने भुगतानों के अटकने से भरोसे का संकट पैदा हो गया है।
चावल निर्यातकों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण वहां के कई व्यापारियों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था भी पूरी तरह सामान्य नहीं है। ऐसे में पहले से भेजे गए माल का भुगतान समय पर नहीं मिल पा रहा है, जबकि कुछ भुगतान पूरी तरह अटक गए हैं। इसी वजह से व्यापारी अब नए ऑर्डर पर उधार में माल भेजने से कतरा रहे हैं।
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बंदरगाहों पर फंसा था दो लाख टन चावल :
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल बताते हैं कि युद्ध और समुद्री मार्गों में बढ़े जोखिम के कारण देश के विभिन्न बंदरगाहों पर करीब दो लाख टन चावल का स्टॉक अटक गया था। इसमें से लगभग आधा चावल अब धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर रवाना हो चुका है। कुछ खेप समुद्र में रास्ते में है जबकि बड़ी मात्रा में चावल अभी भी बंदरगाहों और गोदामों में पड़ा हुआ है। निर्यातकों का कहना है कि जहाजों की उपलब्धता, बढ़ा हुआ बीमा खर्च और समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने व्यापार की लागत को भी बढ़ा दिया है। इससे कई सौदों की लाभप्रदता प्रभावित हो रही है। उनका मानना है कि चावल की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है लेकिन भुगतान और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं के कारण कारोबार की गति धीमी पड़ रही है। कई निर्यातक अब केवल अग्रिम भुगतान या बैंक गारंटी के आधार पर ही माल भेजने पर विचार कर रहे हैं।
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जिले में विशेष तौर धान कटोरा कहे जाने वाले तरावड़ी जैसे क्षेत्र से तैयार होने वाला बासमती चावल बड़ी मात्रा में गल्फ देशों को निर्यात किया जाता है। इनमें बहरीन, इराक, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) प्रमुख बाजार हैं। इन देशों में भारतीय बासमती की गुणवत्ता और स्वाद के कारण हमेशा अच्छी मांग रहती है। व्यापारियों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में ऑर्डर की कमी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी चुनौती भुगतान की सुरक्षा और माल की समय पर डिलीवरी है। अगर युद्ध और तनाव जल्द समाप्त हो जाता है तो चावल निर्यात फिर से सामान्य गति पकड़ सकता है लेकिन फिलहाल कारोबार अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। चावल व्यापारियों का कहना है कि कुछ सप्ताह में कई खरीदारों ने नए ऑर्डर दिए हैं लेकिन पुराने भुगतानों के अटकने से भरोसे का संकट पैदा हो गया है।