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Kurukshetra News: चारों वेदों के मंत्रों का घणपाठ किया प्रस्तुत
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शाहाबाद। संगोष्ठी में मुख्य अतिथियों का स्वागत करते प्राचार्य प्रो.डॉ. आरती त्रेहन व अन्य। विज
- फोटो : स्वयं
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शाहाबाद। आर्य कन्या महाविद्यालय में संस्कृत विभाग की ओर से महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन के सहयोग से आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी में दूसरे दिन ''व्यवस्थित समाज का आधार : वैदिक संस्कृति'' विषय पर मंथन किया गया। डॉ. अनयमणि त्रिपाठी और प्रो. वेदमूर्ति शुक्ला की ओर से चारों वेदों के मंत्रों का घणपाठ प्रस्तुत किया गया जिससे वातावरण पूर्णतः वैदिक चेतना से आलोकित हो उठा।
इसके बाद पांच तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया जिनमें वैदिक संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा, सामाजिक संगठन की अवधारणा, नैतिक व मानवीय मूल्यों और उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर गहन व विचारोत्तेजक विमर्श हुआ। इन सत्रों के माध्यम से वैदिक परंपरा की समृद्ध बौद्धिक विरासत को आधुनिक समाज से जोड़ने का सशक्त प्रयास किया गया।
द्वितीय दिवस का शुभारंभ मुख्य अतिथि सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी, जम्मू, सहायक प्राध्यापक डॉ. अनयमणि त्रिपाठी, वैदिक संस्कृति विभाग वेदस्थली शोध संस्थान हरिद्वार से शुक्ला प्राचार्य प्रो. वेदमूर्ति और महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. डॉ. आरती त्रेहन के सान्निध्य में मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन व वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुआ।
द्वितीय दिवस के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता जीएन यूनिवर्सिटी दिल्ली से डॉ. किशन मोहन पांडेय ने की। उन्होंने धर्म व परंपरा से जुड़े रहने का संदेश देते हुए कहा कि जीवन का उद्देश्य आत्मानंद की प्राप्ति है। अतः धर्म और अर्थ दोनों को संतुलित रूप से अपनाकर जीवन यापन करना चाहिए। इस अवसर पर देशभर से आए शिक्षकों, शोधार्थियों व विषय विशेषज्ञों की ओर से शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। प्रस्तुत शोध पत्रों में वैदिक साहित्य के दार्शनिक, शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक पक्षों का सूक्ष्म एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया।
वक्ताओं ने वैदिक ग्रंथों में निहित जीवन-मूल्यों, सामाजिक समरसता व मानव कल्याण की अवधारणाओं को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया। प्रत्येक शोधपत्र प्रस्तुति के बाद सत्र अध्यक्षों की ओर से विद्वतापूर्ण एवं सारगर्भित टिप्पणियां प्रस्तुत की गई और शोध को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए उपयोगी सुझाव दिए गए। द्वितीय दिवस की संगोष्ठी में पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड से आए 12 मुख्य वक्ताओं और 19 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। प्रश्नोत्तरी सत्रों के माध्यम से विद्वानों के मध्य गंभीर व ज्ञानवर्धक विचार-विमर्श हुआ।
मंच संचालन डॉ. स्वरित शर्मा ने किया। अंत में संगोष्ठी की संयोजिका कैप्टन डॉ. ज्योति शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
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इसके बाद पांच तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया जिनमें वैदिक संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा, सामाजिक संगठन की अवधारणा, नैतिक व मानवीय मूल्यों और उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर गहन व विचारोत्तेजक विमर्श हुआ। इन सत्रों के माध्यम से वैदिक परंपरा की समृद्ध बौद्धिक विरासत को आधुनिक समाज से जोड़ने का सशक्त प्रयास किया गया।
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द्वितीय दिवस का शुभारंभ मुख्य अतिथि सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी, जम्मू, सहायक प्राध्यापक डॉ. अनयमणि त्रिपाठी, वैदिक संस्कृति विभाग वेदस्थली शोध संस्थान हरिद्वार से शुक्ला प्राचार्य प्रो. वेदमूर्ति और महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. डॉ. आरती त्रेहन के सान्निध्य में मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन व वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुआ।
द्वितीय दिवस के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता जीएन यूनिवर्सिटी दिल्ली से डॉ. किशन मोहन पांडेय ने की। उन्होंने धर्म व परंपरा से जुड़े रहने का संदेश देते हुए कहा कि जीवन का उद्देश्य आत्मानंद की प्राप्ति है। अतः धर्म और अर्थ दोनों को संतुलित रूप से अपनाकर जीवन यापन करना चाहिए। इस अवसर पर देशभर से आए शिक्षकों, शोधार्थियों व विषय विशेषज्ञों की ओर से शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। प्रस्तुत शोध पत्रों में वैदिक साहित्य के दार्शनिक, शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक पक्षों का सूक्ष्म एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया।
वक्ताओं ने वैदिक ग्रंथों में निहित जीवन-मूल्यों, सामाजिक समरसता व मानव कल्याण की अवधारणाओं को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया। प्रत्येक शोधपत्र प्रस्तुति के बाद सत्र अध्यक्षों की ओर से विद्वतापूर्ण एवं सारगर्भित टिप्पणियां प्रस्तुत की गई और शोध को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए उपयोगी सुझाव दिए गए। द्वितीय दिवस की संगोष्ठी में पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड से आए 12 मुख्य वक्ताओं और 19 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। प्रश्नोत्तरी सत्रों के माध्यम से विद्वानों के मध्य गंभीर व ज्ञानवर्धक विचार-विमर्श हुआ।
मंच संचालन डॉ. स्वरित शर्मा ने किया। अंत में संगोष्ठी की संयोजिका कैप्टन डॉ. ज्योति शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
