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Mahendragarh-Narnaul News: गुरुग्राम के ध्यानार्थ...जाटवास निवासी एसीपी सुखबीर को राष्ट्रपति के हाथों मिलेगा पुलिस पदक
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महेंद्रगढ़। जिला के गांव जाटवास निवासी और गुरुग्राम एसीपी सुखबीर सिंह का पुलिस पदक के लिए चयन हुआ है। गणतंत्र दिवस पर सुखबीर सिंह को राष्ट्रपति के हाथों पुलिस पदक से सम्मानित किया जाएगा।
बता दें कि सुखबीर का पैतृक गांव महेंद्रगढ़ जिले का जाटवास है। उनके पिता बलबीर सिंह रोहतक शहर पुलिस थाने में इंस्पेक्टर थे। वर्ष 1985 में बलबीर सिंह किसी सरकारी काम से चंडीगढ़ जा रहे थे। उसी दौरान करनाल के घरौंडा के पास सड़क हादसे में बलबीर सिंह की मौत हो गई थी। उस दौरान सुखबीर सिंह नौवी कक्षा में पढ़ते थे और पूरी फैमिली रोहतक में रहती थी। हादसे के परिवार को गहरा सदमा लगा, लेकिन उनकी माता बर्फ काैर ने हिम्मत जुटाकर अपने तीन बच्चों का पालन-पोषण किया। साल 1993 में सुखबीर सिंह बतौर एएसआई पुलिस में भर्ती हुए। इसके बाद उन्होंने पलवल, भिवानी, फरीदाबाद, सिरसा, नूह में अपनी सेवाएं दी। अपनी मेहनत के बल पर साल 2012 में वे एसीपी बने।
एसीपी सुखबीर सिंह ने बताया कि अपना फर्ज निभाते हुए उनकी दो बार जान जाते हुए बची है। इसमें पहला मामला साल 2014 का है। इस दौरान एक दंगे में उनको विशेष बल का हिस्सा बनाया गया। उस दौरान उनके सिर में छर्रा लगा था। इसके बाद नोहर के फायरिंग के आरोपी को पकड़ने के दौरान उन्होंने आरोपियों के साथ फायरिंग की। इसमें भी उनकी जान बाल बाल बची। इसके अलावा भी काफी साहसिक कार्य किए हैं। इसके आधार पर ही उनका चयन इस पदक के लिए हुआ है।
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बता दें कि सुखबीर का पैतृक गांव महेंद्रगढ़ जिले का जाटवास है। उनके पिता बलबीर सिंह रोहतक शहर पुलिस थाने में इंस्पेक्टर थे। वर्ष 1985 में बलबीर सिंह किसी सरकारी काम से चंडीगढ़ जा रहे थे। उसी दौरान करनाल के घरौंडा के पास सड़क हादसे में बलबीर सिंह की मौत हो गई थी। उस दौरान सुखबीर सिंह नौवी कक्षा में पढ़ते थे और पूरी फैमिली रोहतक में रहती थी। हादसे के परिवार को गहरा सदमा लगा, लेकिन उनकी माता बर्फ काैर ने हिम्मत जुटाकर अपने तीन बच्चों का पालन-पोषण किया। साल 1993 में सुखबीर सिंह बतौर एएसआई पुलिस में भर्ती हुए। इसके बाद उन्होंने पलवल, भिवानी, फरीदाबाद, सिरसा, नूह में अपनी सेवाएं दी। अपनी मेहनत के बल पर साल 2012 में वे एसीपी बने।
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एसीपी सुखबीर सिंह ने बताया कि अपना फर्ज निभाते हुए उनकी दो बार जान जाते हुए बची है। इसमें पहला मामला साल 2014 का है। इस दौरान एक दंगे में उनको विशेष बल का हिस्सा बनाया गया। उस दौरान उनके सिर में छर्रा लगा था। इसके बाद नोहर के फायरिंग के आरोपी को पकड़ने के दौरान उन्होंने आरोपियों के साथ फायरिंग की। इसमें भी उनकी जान बाल बाल बची। इसके अलावा भी काफी साहसिक कार्य किए हैं। इसके आधार पर ही उनका चयन इस पदक के लिए हुआ है।