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नशे जैसी बुराई पर भी भारी है फूलडोर मेला
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पलवल। पिछले कुछ वर्षों से नशे के कारण होली पर्व के रंग में भंग पड़ने लगा है। वहीं ब्रज क्षेत्र में आज भी ऐसे बड़े गांव हैं, जहां दुल्हैंडी के दूसरे दिन लगने वाला फूलडोर मेला (हुरंगा) नशे जैसी बुराई पर भारी है। फूलडोर मेला वास्तव में ब्रज की होली के उल्लास को संजोय हुए हैं। इन मेलों में सभी जातियों और गांवों के सभी परिवारों के लोग आपसी मतभेद भुलाकर हिस्सा लेते हैं। आस्था के कारण न तो इनमें किसी प्रकार का झगड़ा होता है और न ही व्यवस्था भंग होती है। बाहर से आने वाले मेहमानों की भी खूब खातिरदारी होती है और आपसी भाईचारा बढ़ता है। यहां तक की उस दिन नशा कर कोई व्यक्ति उधम भी मचाता है तो गांव के लोग उसे प्यार से समझाकर उसके घर तक छोड़कर आते हैं, ताकि इस पारंपरिक व ब्रज संस्कृति को बढ़ावा देने वाले पर्व के रंग में भंग न पड़े।
आंखों में आ जाती है दिक्कत, फिर भी नहीं करते शिकायत
पिछले कुछ वर्षों से तो सौंदहद तथा बंचारी में लगने वाले इस फूलडोर मेले के अवसर पर बड़ी-बड़ी पीतल की पिचकारियों से रंग डालने के दौरान लोगों की आंखों में दिक्कत बन जाती है। कई दिन तक तो लोगों को आंखों से दिखाई तक नहीं देता है, लेकिन उसके बावजूद कोई ग्रामीण इसकी शिकायत नहीं करता। इसका कारण ब्रज संस्कृति के इस होली पर्व के प्रति उनकी आस्था है जो उनके सिर चढ़कर बोलती है। फूलडोर मेले पर हुरंगा द्वारा हुरियारियों (महिलाओं) पर डालने को लोग भगवान श्रीकृष्ण व राधा से जोड़कर चलते हैं।
सौंदहद में 25 तो बंचारी में भी 20 से अधिक चौपालों पर बरसता है रंग
फूलडोर मेले के अवसर पर सौंदहद गांव में करीब 25 चौपालों पर रंग बरसाया जाता है। जबकि बंचारी गांव में 20 के करीब चौपालों पर रंग बरसाया जाता है। इन चौपालों पर गांव के बुजुुर्ग व युवा तीन से चार फीट लंबी पीतल की पिचकारियों में रंग भरकर खड़े रहते हैं तथा जैसे ही महिलाओं की टोलियां नाचते-गाते वहां से निकलती हैं तो उन पर रंग बरसाते हैं। बुजुर्ग भी पिचकारियों से रंग के अलावा खूब गुलाल उड़ाते नजर आते हैं। पीतल की पिचकारियों को लिए विशेष आर्डर देकर बनवाया जाता है।
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बसंत पंचमी से शुरू हो जाती है तैयारियां
ब्रज के इन गांवों में फूलडोर मेले की तैयारियां बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती हैं। होलाष्टक लगने के बाद तो इन गांवों में रात्रि को विभिन्न स्थानों पर होली के रसिया, चौपाइयों का कार्यक्रम भी शुरू हो जाता है, जो फूलडोर मेले के बाद एक सप्ताह तक चलता है। लेकिन कभी आपस में खींचतान नहीं होती। मेले का शुभारंभ प्राचीन मंदिरों में पूजा अर्चना के बाद होता है।
दीघोट में निकलती हैं झांकियां
दीघोट गांव के मेले में झांकियां निकलती हैं। आस्था का जादू इस कदर सिर चढ़कर बोलता है कि लोग झांकियों में शामिल कलाकारों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और दिल खोलकर दान भी देते हैं। साधु-संत अपनी कला का प्रदर्शन कर लोगों को धार्मिक प्रवृति से जोड़े रखते हैं। वहीं बड़े गांव औरंगाबाद, मितरौल, मानपुर, बहीन आदि गांवों में चौपाई व होरी आदि कार्यक्रम होली के कई दिन बाद तक माहौल को रंगीन बनाए रखती हैं। चौपाईयों के द्वारा कुरीतियों पर कटाक्ष किए जाते हैं। महिलाएं घूंघट में सिर पर थाली व बेला आदि रखकर लोकनृत्य करती हैं, जबकि बुजुर्ग और नंगाडा पार्टी दूर से ही चौपाई गाते हैं। ग्रामीण छतों पर बैठकर इसका आनंद लेते हैं। भजनोपदेशकों व रागनी गायक भी एतिहासिक किस्सों का वर्णन कर लोगों को अच्छाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वहीं गांव खांबी सहित अन्य गांवों में युवाओं की टोलियां ढोलक झांझ, मंजीरा, चिमटा, हारमोनियम आदि लेकर एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले में समूह बनाकर जाते हैं। इसमें भी भगवान कृष्ण पर आधारित गीत गाए जाते हैं।
तीन से चार फीट लंबी पीतल की पिचकारियां बनवाई जाती हैं। गांव में दुल्हैंडी से ज्यादा फूलडोर का महत्व रहता है। हर घर में पकवान बनते हैं। गांव में किसी का भी कोई रिश्तेदार आ जाए, उसकी हर घर में पूरा मान-सम्मान होता है। फूलडोर मेला भगवान श्रीकृष्ण व राधा को समर्पित रहता है। यह हमारी ब्रज संस्कृति को बढ़ावा देता है।
-धर्मवीर शर्मा सौंदहद
दुल्हैंडी के दूसरे दिन लगने वाला फूलडोर मेला अपने आप में ब्रज की संस्कृति है। इस मेले से गांव में आपसी प्यार-भाईचारा बनता है। हर जाति, धर्म के लोग आपसी मतभेद भुलाकर चौपालों पर आ जाते हैं तथा खुलकर होली खेलते हैं। घरों में बनने वाले पकवानों का आनंद परिवार के लोगों के अलावा बाहर से मेला देखने आने वाले लोग लेते हैं। यह मेला पिछले कुछ वर्ष से बढ़ रहे नशे के प्रचलन पर भी भारी है।
- हरस्वरूप सौंदहद
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आंखों में आ जाती है दिक्कत, फिर भी नहीं करते शिकायत
पिछले कुछ वर्षों से तो सौंदहद तथा बंचारी में लगने वाले इस फूलडोर मेले के अवसर पर बड़ी-बड़ी पीतल की पिचकारियों से रंग डालने के दौरान लोगों की आंखों में दिक्कत बन जाती है। कई दिन तक तो लोगों को आंखों से दिखाई तक नहीं देता है, लेकिन उसके बावजूद कोई ग्रामीण इसकी शिकायत नहीं करता। इसका कारण ब्रज संस्कृति के इस होली पर्व के प्रति उनकी आस्था है जो उनके सिर चढ़कर बोलती है। फूलडोर मेले पर हुरंगा द्वारा हुरियारियों (महिलाओं) पर डालने को लोग भगवान श्रीकृष्ण व राधा से जोड़कर चलते हैं।
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सौंदहद में 25 तो बंचारी में भी 20 से अधिक चौपालों पर बरसता है रंग
फूलडोर मेले के अवसर पर सौंदहद गांव में करीब 25 चौपालों पर रंग बरसाया जाता है। जबकि बंचारी गांव में 20 के करीब चौपालों पर रंग बरसाया जाता है। इन चौपालों पर गांव के बुजुुर्ग व युवा तीन से चार फीट लंबी पीतल की पिचकारियों में रंग भरकर खड़े रहते हैं तथा जैसे ही महिलाओं की टोलियां नाचते-गाते वहां से निकलती हैं तो उन पर रंग बरसाते हैं। बुजुर्ग भी पिचकारियों से रंग के अलावा खूब गुलाल उड़ाते नजर आते हैं। पीतल की पिचकारियों को लिए विशेष आर्डर देकर बनवाया जाता है।
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बसंत पंचमी से शुरू हो जाती है तैयारियां
ब्रज के इन गांवों में फूलडोर मेले की तैयारियां बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती हैं। होलाष्टक लगने के बाद तो इन गांवों में रात्रि को विभिन्न स्थानों पर होली के रसिया, चौपाइयों का कार्यक्रम भी शुरू हो जाता है, जो फूलडोर मेले के बाद एक सप्ताह तक चलता है। लेकिन कभी आपस में खींचतान नहीं होती। मेले का शुभारंभ प्राचीन मंदिरों में पूजा अर्चना के बाद होता है।
दीघोट में निकलती हैं झांकियां
दीघोट गांव के मेले में झांकियां निकलती हैं। आस्था का जादू इस कदर सिर चढ़कर बोलता है कि लोग झांकियों में शामिल कलाकारों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और दिल खोलकर दान भी देते हैं। साधु-संत अपनी कला का प्रदर्शन कर लोगों को धार्मिक प्रवृति से जोड़े रखते हैं। वहीं बड़े गांव औरंगाबाद, मितरौल, मानपुर, बहीन आदि गांवों में चौपाई व होरी आदि कार्यक्रम होली के कई दिन बाद तक माहौल को रंगीन बनाए रखती हैं। चौपाईयों के द्वारा कुरीतियों पर कटाक्ष किए जाते हैं। महिलाएं घूंघट में सिर पर थाली व बेला आदि रखकर लोकनृत्य करती हैं, जबकि बुजुर्ग और नंगाडा पार्टी दूर से ही चौपाई गाते हैं। ग्रामीण छतों पर बैठकर इसका आनंद लेते हैं। भजनोपदेशकों व रागनी गायक भी एतिहासिक किस्सों का वर्णन कर लोगों को अच्छाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वहीं गांव खांबी सहित अन्य गांवों में युवाओं की टोलियां ढोलक झांझ, मंजीरा, चिमटा, हारमोनियम आदि लेकर एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले में समूह बनाकर जाते हैं। इसमें भी भगवान कृष्ण पर आधारित गीत गाए जाते हैं।
तीन से चार फीट लंबी पीतल की पिचकारियां बनवाई जाती हैं। गांव में दुल्हैंडी से ज्यादा फूलडोर का महत्व रहता है। हर घर में पकवान बनते हैं। गांव में किसी का भी कोई रिश्तेदार आ जाए, उसकी हर घर में पूरा मान-सम्मान होता है। फूलडोर मेला भगवान श्रीकृष्ण व राधा को समर्पित रहता है। यह हमारी ब्रज संस्कृति को बढ़ावा देता है।
-धर्मवीर शर्मा सौंदहद
दुल्हैंडी के दूसरे दिन लगने वाला फूलडोर मेला अपने आप में ब्रज की संस्कृति है। इस मेले से गांव में आपसी प्यार-भाईचारा बनता है। हर जाति, धर्म के लोग आपसी मतभेद भुलाकर चौपालों पर आ जाते हैं तथा खुलकर होली खेलते हैं। घरों में बनने वाले पकवानों का आनंद परिवार के लोगों के अलावा बाहर से मेला देखने आने वाले लोग लेते हैं। यह मेला पिछले कुछ वर्ष से बढ़ रहे नशे के प्रचलन पर भी भारी है।
- हरस्वरूप सौंदहद