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मां को अयोग्य साबित किए बिना बच्चे को अलग नहीं रख सकते: हाईकोर्ट
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हाईकोर्ट ने पांच साल के बच्चे को मां को सौंपने का दिया आदेश
पति की मौत के बाद ससुराल से अलग हुई थी महिला
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पांच साल के बच्चे की अभिरक्षा से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उच्च न्यायालय ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में मां को दादा-दादी की तुलना में बच्चे की अभिरक्षा में प्राथमिकता मिलती है। जब तक मां को बच्चे की देखभाल में अक्षम साबित न किया जाए, उसे बच्चे से अलग नहीं रखा जा सकता।
न्यायमूर्ति जसजीत सिंह बेदी ने यह आदेश एक महिला की याचिका पर सुनाया। न्यायालय ने बच्चे की अभिरक्षा उसके दादा-दादी से लेकर मां को सौंपने का निर्देश दिया। गुरदासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया। उन्हें बच्चे की अभिरक्षा सौंपे जाने के एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। महिला की शादी मई 2020 में हुई थी और फरवरी 2021 में उसने बेटे को जन्म दिया। नवंबर 2025 में उसकी बेटी का जन्म हुआ और दिसंबर 2025 में उसके पति का निधन हो गया। महिला ने आरोप लगाया कि पति की मृत्यु के बाद ससुराल में उसके साथ ठीक व्यवहार नहीं किया गया। जून 2026 में वह अपनी नवजात बेटी के साथ ससुराल से अलग हो गई पर उसका पांच साल का बेटा दादा-दादी के पास रह गया।
बच्चे के दादा-दादी की दलीलें
दादा-दादी ने दलील दी कि बच्चे को बटाला के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में दाखिल कराया गया है। उन्होंने कहा कि इस समय उसकी अभिरक्षा बदलने से उसकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। बच्चे की दिनचर्या और भावनात्मक स्थिति पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और वर्तमान व्यवस्था उसके हित में है।
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न्यायालय का निर्देश
उच्च न्यायालय ने दादा-दादी के भावनात्मक संबंधों को भी ध्यान में रखा। आदेश में कहा गया कि बच्चे की अभिरक्षा मां को सौंपे जाने के बावजूद उसे अपने दादा-दादी से मिलने का अवसर दिया जाना चाहिए। मां को दादा-दादी को बच्चे से मिलने की अनुमति देनी होगी।
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पति की मौत के बाद ससुराल से अलग हुई थी महिला
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पांच साल के बच्चे की अभिरक्षा से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उच्च न्यायालय ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में मां को दादा-दादी की तुलना में बच्चे की अभिरक्षा में प्राथमिकता मिलती है। जब तक मां को बच्चे की देखभाल में अक्षम साबित न किया जाए, उसे बच्चे से अलग नहीं रखा जा सकता।
न्यायमूर्ति जसजीत सिंह बेदी ने यह आदेश एक महिला की याचिका पर सुनाया। न्यायालय ने बच्चे की अभिरक्षा उसके दादा-दादी से लेकर मां को सौंपने का निर्देश दिया। गुरदासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया। उन्हें बच्चे की अभिरक्षा सौंपे जाने के एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। महिला की शादी मई 2020 में हुई थी और फरवरी 2021 में उसने बेटे को जन्म दिया। नवंबर 2025 में उसकी बेटी का जन्म हुआ और दिसंबर 2025 में उसके पति का निधन हो गया। महिला ने आरोप लगाया कि पति की मृत्यु के बाद ससुराल में उसके साथ ठीक व्यवहार नहीं किया गया। जून 2026 में वह अपनी नवजात बेटी के साथ ससुराल से अलग हो गई पर उसका पांच साल का बेटा दादा-दादी के पास रह गया।
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बच्चे के दादा-दादी की दलीलें
दादा-दादी ने दलील दी कि बच्चे को बटाला के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में दाखिल कराया गया है। उन्होंने कहा कि इस समय उसकी अभिरक्षा बदलने से उसकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। बच्चे की दिनचर्या और भावनात्मक स्थिति पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और वर्तमान व्यवस्था उसके हित में है।
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न्यायालय का निर्देश
उच्च न्यायालय ने दादा-दादी के भावनात्मक संबंधों को भी ध्यान में रखा। आदेश में कहा गया कि बच्चे की अभिरक्षा मां को सौंपे जाने के बावजूद उसे अपने दादा-दादी से मिलने का अवसर दिया जाना चाहिए। मां को दादा-दादी को बच्चे से मिलने की अनुमति देनी होगी।