सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chandigarh ›   Panchkula News ›   ICAR experiment in Chandigarh Red apples will now flourish in Shivalik foothills

चंडीगढ़ में आईसीएआर का सफल प्रयोग: अब शिवालिक की तलहटी में भी लहलहाएंगे लाल सेब, कम ठंड में होगी बंपर पैदावार

दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला Published by: Nivedita Updated Mon, 09 Mar 2026 03:28 PM IST
विज्ञापन
सार

आमतौर पर सेब को 1000 से 1500 घंटे की ठंड चाहिए होती है, लेकिन ये खास किस्में महज 100 से 300 घंटों की ठंड में भी शानदार फल देने में सक्षम हैं। यह सफल परीक्षण उत्तर-पश्चिम भारत के गर्म मैदानी इलाकों और शिवालिक की तलहटी में रहने वाले किसानों के लिए बागवानी के क्षेत्र में एक नई क्रांति लेकर आएगा।

ICAR experiment in Chandigarh Red apples will now flourish in Shivalik foothills
सेब। - फोटो : अमर उजाला/फाइल
विज्ञापन

विस्तार

कभी ठंडे पहाड़ों की पहचान माने जाने वाले सेब अब शिवालिक की पहाड़ियों और मैदानी इलाकों की गर्मी में भी महकेंगे। भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान चंडीगढ़ के पंचकूला माता मनसा देवी स्थित अनुसंधान फार्म में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक और किस्मों का सफल परीक्षण किया है, जो बागवानी के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं।

Trending Videos


अन्ना, गोल्डन डोरसेट और एचआरएमएन-99 जैसी लो-चिलिंग किस्मों के पौधों ने यह साबित कर दिया है कि शिवालिक की तलहटी में भी सेब की खेती व्यावसायिक रूप से सफल हो सकती है। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक (बागवानी) डॉ. राम प्रसाद ने बताया कि आमतौर पर सेब को 1000 से 1500 घंटे की ठंड चाहिए होती है, लेकिन ये खास किस्में महज 100 से 300 घंटों की ठंड में भी शानदार फल देने में सक्षम हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह सफल परीक्षण उत्तर-पश्चिम भारत के गर्म मैदानी इलाकों और शिवालिक की तलहटी में रहने वाले किसानों के लिए बागवानी के क्षेत्र में एक नई क्रांति लेकर आएगा। संस्थान अब इस सफल मॉडल को किसानों तक ले जाने की योजना बना रहा है, ताकि पंचकूला और प्रदेश के आसपास के शिवालिक बेल्ट के किसान इसे अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकें।

एमएम-111 रूट स्टॉक का कमाल

संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक (बागवानी) डॉ. राम प्रसाद के अनुसार, फरवरी 2025 में 0.17 हेक्टेयर क्षेत्र में इन पौधों का रोपण किया गया था। खास बात यह है कि इन्हें सेमी ड्वार्फ (एमएम-111) रूट स्टॉक पर तैयार किया गया है। यह रूट स्टॉक न केवल ऊनी एफिड्स और क्राउन रूट रोट जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है, बल्कि इसके पौधों को किसी सहारे की भी जरूरत नहीं होती। इससे हाई-डेंसिटी प्लांटेशन यानी कम जगह में अधिक पौधे लगाना आसान हो गया है।

चुनौतियों से निपटने का प्लान तैयार

वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि गर्मी और अनियमित बारिश एक चुनौती है, लेकिन सही वॉटर मैनेजमेंट और मल्चिंग जैसी तकनीकों से इसे हल किया जा सकता है। संस्थान के डॉ. दिनेश कुमार के अनुसार, मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए कंटूर प्लांटिंग और पोषक तत्वों के प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है।

क्यों खास है यह तकनीक?

 जल्दी पैदावार : पहाड़ों के सेब से पहले तैयार हो जाती है फसल।
बीमारी मुक्त : एमएम-111 तकनीक से कीटों का खतरा बेहद कम।
कम जगह, ज्यादा मुनाफा: 3x3 मीटर की दूरी पर पौधे लगाकर प्रति एकड़ अधिक आय
शुद्ध आय : सब्जियों के मुकाबले कम लागत और लंबे समय तक मुनाफा

सेब की इन नई किस्मों को अपनाकर किसान अपनी किस्मत बदल सकते हैं। बस जरूरी है कि मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए मल्चिंग और समय पर खाद-पानी का ध्यान रखा जाए। -डॉ. राम प्रसाद, वैज्ञानिक।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed