{"_id":"69ac867a98f6d33c540f4c19","slug":"india-is-the-fifth-largest-economy-in-the-world-courts-cannot-adopt-a-narrow-approach-cji-panchkula-news-c-16-1-pkl1098-965202-2026-03-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, अदालतें संर्कीण दृष्टिकोण नहीं अपना सकतीं: सीजेआई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, अदालतें संर्कीण दृष्टिकोण नहीं अपना सकतीं: सीजेआई
विज्ञापन
विज्ञापन
चंडीगढ़। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुलदीप सिंह के सम्मान में हाईकोर्ट परिसर में नवीनीकृत पुस्तकालय के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि अदालतें हर विकास परियोजना को केवल पर्यावरणीय चिंताओं के कारण संदेह की दृष्टि से नहीं देख सकतीं।
ऐसा दृष्टिकोण देश की वैध विकास आकांक्षाओं में बाधा बन सकता है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, जनसंख्या और लोगों की आकांक्षाएं भी बढ़ी हैं जबकि प्राकृतिक संसाधन लगभग वही हैं। न्यायपालिका आज न तो ऐसा संकीर्ण दृष्टिकोण अपना सकती है जिसमें हर परियोजना पर संदेह किया जाए और न ही ऐसा लापरवाह दृष्टिकोण कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज कर दिया जाए।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जस्टिस कुलदीप सिंह के फैसलों के महत्व को समझने के लिए उस समय की आर्थिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। 1980 और 1990 के दशक में भारत तेजी से औद्योगीकरण और उदारीकरण के दौर में प्रवेश कर रहा था। उस समय न्यायपालिका को यह आशंका थी कि कहीं विकास और आधारभूत ढांचे का विस्तार नदियों, जंगलों और हवा की कीमत पर न हो।
उस समय पर्यावरणीय नियम अपेक्षाकृत नए थे और प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई तथा वैज्ञानिक आधार उतने मजबूत नहीं थे जितने आज हैं। इस वजह से उस दौर में अधिकार आधारित कड़ा पर्यावरणीय न्यायशास्त्र जरूरी था, जिसने अनियंत्रित दोहन के खिलाफ संतुलन का काम किया। आज परिस्थितियां काफी बदली हैं। अदालतों का दायित्व है कि वे पर्यावरण संबंधी कानूनों का गंभीरता से पालन सुनिश्चित करें। साथ ही यह भी समझें कि सतत विकास संविधान की व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। अब ध्यान केवल प्रदूषण होने के बाद कार्रवाई करने पर नहीं, बल्कि इस बात पर है कि विकास परियोजनाएं शुरू से ही इस तरह तैयार की जाएं कि पर्यावरणीय नुकसान की संभावना कम से कम हो।
उन्होंने कहा कि आज अदालतें केवल यह नहीं पूछतीं कि प्रदूषण होने पर कौन भुगतान करेगा, बल्कि यह भी देखती हैं कि परियोजना शुरू करने से पहले प्रदूषण रोकने के लिए सभी संभव कदम उठाए गए या नहीं। नई तकनीकों और बदलते आर्थिक ढांचे के दौर में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कानून वैज्ञानिक वास्तविकताओं से पीछे न रह जाए।
Trending Videos
ऐसा दृष्टिकोण देश की वैध विकास आकांक्षाओं में बाधा बन सकता है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, जनसंख्या और लोगों की आकांक्षाएं भी बढ़ी हैं जबकि प्राकृतिक संसाधन लगभग वही हैं। न्यायपालिका आज न तो ऐसा संकीर्ण दृष्टिकोण अपना सकती है जिसमें हर परियोजना पर संदेह किया जाए और न ही ऐसा लापरवाह दृष्टिकोण कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज कर दिया जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जस्टिस कुलदीप सिंह के फैसलों के महत्व को समझने के लिए उस समय की आर्थिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। 1980 और 1990 के दशक में भारत तेजी से औद्योगीकरण और उदारीकरण के दौर में प्रवेश कर रहा था। उस समय न्यायपालिका को यह आशंका थी कि कहीं विकास और आधारभूत ढांचे का विस्तार नदियों, जंगलों और हवा की कीमत पर न हो।
उस समय पर्यावरणीय नियम अपेक्षाकृत नए थे और प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई तथा वैज्ञानिक आधार उतने मजबूत नहीं थे जितने आज हैं। इस वजह से उस दौर में अधिकार आधारित कड़ा पर्यावरणीय न्यायशास्त्र जरूरी था, जिसने अनियंत्रित दोहन के खिलाफ संतुलन का काम किया। आज परिस्थितियां काफी बदली हैं। अदालतों का दायित्व है कि वे पर्यावरण संबंधी कानूनों का गंभीरता से पालन सुनिश्चित करें। साथ ही यह भी समझें कि सतत विकास संविधान की व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। अब ध्यान केवल प्रदूषण होने के बाद कार्रवाई करने पर नहीं, बल्कि इस बात पर है कि विकास परियोजनाएं शुरू से ही इस तरह तैयार की जाएं कि पर्यावरणीय नुकसान की संभावना कम से कम हो।
उन्होंने कहा कि आज अदालतें केवल यह नहीं पूछतीं कि प्रदूषण होने पर कौन भुगतान करेगा, बल्कि यह भी देखती हैं कि परियोजना शुरू करने से पहले प्रदूषण रोकने के लिए सभी संभव कदम उठाए गए या नहीं। नई तकनीकों और बदलते आर्थिक ढांचे के दौर में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कानून वैज्ञानिक वास्तविकताओं से पीछे न रह जाए।