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Panchkula News: क्या एफआईआर दर्ज न होना मानवाधिकार उल्लंघन है, हाईकोर्ट करेगा तय
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चंडीगढ़। 2007 से चले आ रहे भूमि विवाद में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर दर्ज एफआईआर में किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने आयोग और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार शुरू किया है कि क्या एफआईआर दर्ज न होना मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है। साथ ही क्या मानवाधिकार आयोग ऐसे सिविल विवादों में हस्तक्षेप कर सकता है।
हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए आयोग के अधिकार क्षेत्र, उसकी कार्यवाही और उसके आदेश पर दर्ज एफआईआर को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि यह मामला मूल रूप से संपत्ति से जुड़ा दीवानी विवाद है जिसे मानवाधिकार उल्लंघन का स्वरूप देकर आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई। मानवाधिकार आयोग एक सिफारिशी संस्था है लेकिन यहां आयोग ने एफआईआर दर्ज करने के निर्देश तक दे दिए।
विवाद अप्रैल 2007 में लुधियाना स्थित तीन एकड़ से अधिक भूमि के सौदे से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता न तो उस लेन-देन का हिस्सा था और न ही उसे कोई राशि मिली। इसके बावजूद उसे परेशान करने के उद्देश्य से कई आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गईं। उन्होंने कहा कि लुधियाना पुलिस ने जांच के बाद मामला सिविल प्रकृति का मानते हुए एफआईआर दर्ज करने से इन्कार कर दिया था। इसके बावजूद करीब 17 वर्ष बाद दिसंबर 2024 में दिल्ली में उसी संपत्ति को लेकर एफआईआर दर्ज कर ली गई जबकि पूरा विवाद लुधियाना से संबंधित था। इस एफआईआर को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है।
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इसके बाद अगस्त 2025 में शिकायतकर्ता पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग पहुंचा जहां विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया गया। याचिकाकर्ता कई बार एसआईटी के समक्ष पेश हुआ लेकिन उसे शिकायत की प्रति तक उपलब्ध नहीं कराई गई और जांच उसके पीछे की गई। 27 फरवरी को एकपक्षीय रिपोर्ट पेश की गई जिसमें उसके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। 10 मार्च को आयोग ने एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया और उसी आधार पर 12 अप्रैल को नया मामला दर्ज कर लिया गया।
हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए आयोग के अधिकार क्षेत्र, उसकी कार्यवाही और उसके आदेश पर दर्ज एफआईआर को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि यह मामला मूल रूप से संपत्ति से जुड़ा दीवानी विवाद है जिसे मानवाधिकार उल्लंघन का स्वरूप देकर आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई। मानवाधिकार आयोग एक सिफारिशी संस्था है लेकिन यहां आयोग ने एफआईआर दर्ज करने के निर्देश तक दे दिए।
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विवाद अप्रैल 2007 में लुधियाना स्थित तीन एकड़ से अधिक भूमि के सौदे से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता न तो उस लेन-देन का हिस्सा था और न ही उसे कोई राशि मिली। इसके बावजूद उसे परेशान करने के उद्देश्य से कई आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गईं। उन्होंने कहा कि लुधियाना पुलिस ने जांच के बाद मामला सिविल प्रकृति का मानते हुए एफआईआर दर्ज करने से इन्कार कर दिया था। इसके बावजूद करीब 17 वर्ष बाद दिसंबर 2024 में दिल्ली में उसी संपत्ति को लेकर एफआईआर दर्ज कर ली गई जबकि पूरा विवाद लुधियाना से संबंधित था। इस एफआईआर को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है।
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