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भाषा प्रयोग करने से सीखी जाती : मनोज वशिष्ठ

संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी Updated Tue, 02 Jun 2026 05:28 PM IST
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Language is learned by using it: Manoj Vashishtha
स्कूल में आयोजित ग्रीष्म शिविर। स्रोत : स्कूल
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संवाद न्यूज एजेंसी


रेवाड़ी। भाड़ावास गेट स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में आयोजित भारतीय भाषा ग्रीष्म शिविर के दूसरे दिन विद्यार्थियों ने भाषा और संवाद कौशल को खेल-खेल में सीखा। मनोज वशिष्ठ ने कहा कि भाषा रटने से नहीं बल्कि उसे जीने और प्रयोग करने से सीखी जाती है।
शिविर में कक्षा 6 से 12 तक के 17 विद्यार्थियों ने पांच शिक्षकों के सहयोग से विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। दूसरे दिन की थीम शहर और बातचीत रही। विद्यार्थियों को भारत के प्रमुख शहरों की जानकारी, संवाद कौशल, प्रश्न पूछने और उत्तर देने का आत्मविश्वास विकसित करने के साथ-साथ मंच पर बोलने का अभ्यास कराया गया।
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कार्यक्रम की शुरुआत भारत दर्शन गतिविधि से हुई जिसमें विद्यार्थियों को दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और जयपुर जैसे प्रमुख शहरों की विशेषताओं से परिचित कराया गया। इसके बाद शहर पहचानो खेल और बाजार-स्कूल में संवाद गतिविधि के माध्यम से बच्चों ने रोजमर्रा की बातचीत का अभ्यास किया। रोल-प्ले के जरिए विद्यार्थियों ने बाजार, स्कूल और रास्ता पूछने से जुड़े संवाद प्रस्तुत किए।
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सवाल-जवाब रैली और समूह चर्चा चक्र जैसी गतिविधियों में विद्यार्थियों ने आत्मविश्वास के साथ अपने विचार व्यक्त किए। मेरा पसंदीदा शहर विषय पर बच्चों ने समूह चर्चा कर प्रस्तुति दी। साथ ही भारतीय सांकेतिक भाषा के कुछ संकेत भी सिखाए गए।
समापन पर आयोजित संवाद प्रतियोगिता में बाजार, स्कूल, बस स्टॉप और डॉक्टर के पास जैसे विषयों पर विद्यार्थियों ने प्रस्तुति दी। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को भाषा मित्र बैज तथा सभी विद्यार्थियों को भागीदारी प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।
मनोज वशिष्ठ ने कहा कि भाषा रटने से नहीं बल्कि उसे जीने और प्रयोग करने से सीखी जाती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप खेल आधारित शिक्षण पद्धति बच्चों के आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति क्षमता को मजबूत बना रही है।
कार्यक्रम में राजेश यादव का सहयोग रहा। इस अवसर पर जितेंद्र दखोरा, विकास, सरोज धनखड़ और अशोक बेरवाल सहित विद्यालय स्टाफ उपस्थित रहा। शिविर की प्रमुख उपलब्धियों में 100 प्रतिशत भागीदारी, तनावमुक्त वातावरण और मातृभाषा आधारित शिक्षण को विशेष रूप से सराहा गया।
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