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Sirsa News: नहीं हरा पाए हालात, महिलाओं ने हौसलों से दी मात
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Sun, 08 Mar 2026 12:32 AM IST
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सर्वजीत कौर
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महिला दिवस पर विशेष : बुरे समय को याद कर सिहर उठने वाली बोलीं : आज जिंदगी से कोई शिकवा नहीं
फोटो- 18 से 21
ओढां। कई बार इंसान के जीवन में ऐसी विकट परिस्थितियां आ जाती हैं कि वह विचलित हो जाता है। कुछ लोग ऐसी परिस्थितियों में घुटने टेक देते हैं, कुछ ऐसे भी होते हैं जो हौसले को ढाल बनाकर इनसे पार पा लेते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम आपको कुछ ऐसी महिलाओं से रू-ब-रू करवा रहे हैं जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और वक्त के साथ स्वयं को मजबूत बनाते हुए वक्त को ही बदल दिया। कभी बुरे समय को याद कर सिहर उठने वाली इन महिलाओं को आज जिंदगी से कोई शिकवा नहीं है। आज ये महिलाएं समाज में प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं। संवाद
पति की मौत के बाद लगा था सब कुछ खत्म हो गया
गांव पन्नीवाला मोटा की रहने वाली 35 वर्षीय रोशनी देवी के पति जगदीश की ढाई वर्ष पूर्व मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद रोशनी देवी के समक्ष अपने 4 बच्चों व स्वयं को संभालना बड़ी चुनौती थी। घर की आर्थिक दशा काफी कमजोर थी। पति की कोई चल-अचल संपत्ति भी नहीं थी। रोशनी को एक बार लगा कि जैसे सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन उन्होंने किसी पर आश्रित न होकर दिहाड़ी मजदूरी करते हुए अपने चारों बच्चों को पालन-पोषण कर पढ़ाया-लिखाया। मौजूदा समय में रोशनी देवी मंडी कालांवाली में अटल कैंटीन पर कार्य कर रही हैं। कुछ पैसे कंटीन से आ जाते हैं, कुछ विधवा पेंशन से आ जाते हैं तो कुछ घर में टिफिन सर्विस से आ जाते हैं। इन पैसों से रोशनी देवी अपना घर व बच्चों को संभाल रही हैं। उनकी 3 बेटियां व एक बेटा है। इनमें सबसे बड़ी 19 वर्ष की, उससे छोटी 17 वर्ष की तथा उससे छोटी बेटी 15 वर्ष की है। वहीं, बेटा 13 वर्ष का है। चारों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। रोशनी देवी की 2 बेटियां बीएससी कर रही हैं तो वहीं एक बेटी 12वीं कक्षा में पढ़ती है। वहीं बेटा 9वीं कक्षा में पढ़ता है। पति के जाने के बाद रोशनी देवी के लिए वो समय अत्यंत कठिन था, लेकिन वह हौसले को ढाल बनाकर अपने बच्चों को सफलता की राह पर अग्रसर कर रही हैं। रोशनी देवी का कहना है कि उनके पति का सपना था कि वह अपनी बेटी को डॉक्टर बनाएं। वह अपने पति का सपना एक दिन जरूर पूरा करेंगी।
बच्चों के लिए छोड़ दिया घर, उच्च शिक्षा दिलवाकर बनाया सफल गांव नुहियांवाली की बेटी सुमित्रा देवी का विवाह वर्ष 1996 मेें ढाणी बचन सिंह (ऐलनाबाद) निवासी लालचंद के साथ हुआ। शादी के 6 वर्ष बाद लालचंद की मृत्यु हो गई। इसके बाद स्वयं और 3 मासूम बच्चों (2 लड़की व एक लड़का) को संभालना सुमित्रा के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। यह समय उनके लिए अति विकट था। ऐसे में उनके माता-पिता ने उसमें हौसला भरा। सुमित्रा ने जैसे-तैसे कर स्वयं को परिस्थितियों से लड़ने के लिए मजबूत बनाया। सुमित्रा ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को एक सफल इंसान बनाएंगी चाहे उसके लिए उन्हें घर-बार ही क्यों न छोड़ना पड़े। सुमित्रा अपने तीनों बच्चों को शिक्षित करने के लिए 6 वर्ष तक अपने घर को छोड़कर राजस्थान के सीकर में रहीं। आज सुमित्रा की बड़ी बेटी 26 वर्षीय अंजनी स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर है। वहीं, उससे छोटी बेटी 24 वर्षीय प्रीति बागवानी में बीएससी कर आगे की तैयारी कर रही है। वहीं, बेटा 23 वर्षीय प्रिंस आईआईटी करने के बाद आज मुंबई में एक अच्छी नौकरी कर रहा है। सुमित्रा जब बीता हुआ समय याद करती हैं तो सिहर उठती हैं। आज बच्चों को सफल देखकर उन्हें अब जिंदगी से कोई शिकवा नहीं है।
परिवार ने दिया हौसला तो संभाला खुद को
गांव पन्नीवाला मोटा निवासी 57 वर्षीय निर्मला देवी का 5 वर्ष पूर्व पति का साथ छूट गया। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पति रामसिंह किराये पर गाड़ी चलाकर व एक छोटी सी दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। कोरोना काल में रामसिंह की मृत्यु हो गई। हालांकि, 3 बेटियों की शादी रामसिंह के रहते हो चुकी थी, लेकिन एक बेटा व एक बेटी अभी कुंवारे हैं। पति की मौत के बाद घर व 2 बच्चों को संभालना निर्मला देवी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। काफी समय तक तो निर्मला पति की मौत के सदमे से उभर भी नहीं पाई थी। परिवार के लोगों ने उनमें जीने का हौसला भरा। इसके बाद उन्होंने ठान ली कि वह बेटा-बेटी दोनों को अच्छी शिक्षा दिलवाकर अपने पैरों पर खड़ा करेंगी। इसके लिए निर्मला देवी ने पति की दुकान को संभाला और जैसे-तैसे कर अपने बच्चों को पढ़ाया और घर को संभाला। निर्मला देवी के बेटे की डेढ़ वर्ष पूर्व सरकारी नौकरी लग गई जबकि बेटी पुलिस की तैयारी कर रही है। निर्मला देवी की आंखें आज भी उस समय को याद कर नम हो उठती हैं। उन्हाेंने कहा कि वह समय पूरे परिवार के लिए विकट था, लेकिन परिवार ने उन्हें हौसला दिया। इसकी बदौलत उन्होंने उस कठिन समय को पीछे छोड़ दिया।
जिम्मेदारी कंधों पर आई तो सर्वजीत कौर ने थामी ट्रैक्टर की स्टीयरिंग
गांव ओढ़ां निवासी 42 वर्षीय महिला सर्वजीत कौर एक छोटी खेतिहर किसान हैं। सर्वजीत को एक बेटा व एक बेटी है। थोड़ी सी भूमि होने के चलते खेती कार्य से पति-पत्नी दोनों अपनी आर्थिक दशा में सुधार लाने में असक्षम थे। इसी बीच महिला सर्वजीत कौर के पति बलकरण सिंह की सेहत बिगड़ने के चलते वह चारपाई पर पड़ गए। एक तो पहले से ही आर्थिक दशा कमजोर थी और ऊपर से पति के बीमार होने के चलते घर का पूरा बोझ सर्वजीत कौर के कंधों पर आ गया। खेती संभालने वाला कोई न होने के चलते सर्वजीत कौर ने खुद को मजबूत करते हुए यह ठान लिया कि वह किसी पर आश्रित न होकर खुद खेती करेंगी। खेती कार्य से पूरी तरह से परिचित न होने के चलते शुरुआत के दौर में सर्वजीत कौर को काफी परेशानी झेलनी पड़ीं। पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आने के बाद उन्होंने स्वयं ही ट्रैक्टर की स्टीयरिंग थाम ली। अपने पति से पूछ-पूछकर धीरे-धीरे वह खेती कार्य में इस कदर निपुण हो गईं कि बुआई-बिजाई व सिंचाई तक खुद करने लग गईं। सर्वजीत कौर ने अपने दम पर दोनों बच्चों को बेहतर ढंग से पढ़ा-लिखाकर सफलता की राह पर अग्रसर किया। उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के समक्ष आर्थिक दशा या कार्य को कभी आड़े नहीं आने दिया। आज उनकी बेटी बठिंडा में एक निजी बैंक में असिस्टेंट मैनेजर है, वहीं, बेटा बीए की पढ़ाई कर रहा है।
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ओढां। कई बार इंसान के जीवन में ऐसी विकट परिस्थितियां आ जाती हैं कि वह विचलित हो जाता है। कुछ लोग ऐसी परिस्थितियों में घुटने टेक देते हैं, कुछ ऐसे भी होते हैं जो हौसले को ढाल बनाकर इनसे पार पा लेते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम आपको कुछ ऐसी महिलाओं से रू-ब-रू करवा रहे हैं जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और वक्त के साथ स्वयं को मजबूत बनाते हुए वक्त को ही बदल दिया। कभी बुरे समय को याद कर सिहर उठने वाली इन महिलाओं को आज जिंदगी से कोई शिकवा नहीं है। आज ये महिलाएं समाज में प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं। संवाद
पति की मौत के बाद लगा था सब कुछ खत्म हो गया
गांव पन्नीवाला मोटा की रहने वाली 35 वर्षीय रोशनी देवी के पति जगदीश की ढाई वर्ष पूर्व मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद रोशनी देवी के समक्ष अपने 4 बच्चों व स्वयं को संभालना बड़ी चुनौती थी। घर की आर्थिक दशा काफी कमजोर थी। पति की कोई चल-अचल संपत्ति भी नहीं थी। रोशनी को एक बार लगा कि जैसे सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन उन्होंने किसी पर आश्रित न होकर दिहाड़ी मजदूरी करते हुए अपने चारों बच्चों को पालन-पोषण कर पढ़ाया-लिखाया। मौजूदा समय में रोशनी देवी मंडी कालांवाली में अटल कैंटीन पर कार्य कर रही हैं। कुछ पैसे कंटीन से आ जाते हैं, कुछ विधवा पेंशन से आ जाते हैं तो कुछ घर में टिफिन सर्विस से आ जाते हैं। इन पैसों से रोशनी देवी अपना घर व बच्चों को संभाल रही हैं। उनकी 3 बेटियां व एक बेटा है। इनमें सबसे बड़ी 19 वर्ष की, उससे छोटी 17 वर्ष की तथा उससे छोटी बेटी 15 वर्ष की है। वहीं, बेटा 13 वर्ष का है। चारों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। रोशनी देवी की 2 बेटियां बीएससी कर रही हैं तो वहीं एक बेटी 12वीं कक्षा में पढ़ती है। वहीं बेटा 9वीं कक्षा में पढ़ता है। पति के जाने के बाद रोशनी देवी के लिए वो समय अत्यंत कठिन था, लेकिन वह हौसले को ढाल बनाकर अपने बच्चों को सफलता की राह पर अग्रसर कर रही हैं। रोशनी देवी का कहना है कि उनके पति का सपना था कि वह अपनी बेटी को डॉक्टर बनाएं। वह अपने पति का सपना एक दिन जरूर पूरा करेंगी।
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बच्चों के लिए छोड़ दिया घर, उच्च शिक्षा दिलवाकर बनाया सफल गांव नुहियांवाली की बेटी सुमित्रा देवी का विवाह वर्ष 1996 मेें ढाणी बचन सिंह (ऐलनाबाद) निवासी लालचंद के साथ हुआ। शादी के 6 वर्ष बाद लालचंद की मृत्यु हो गई। इसके बाद स्वयं और 3 मासूम बच्चों (2 लड़की व एक लड़का) को संभालना सुमित्रा के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। यह समय उनके लिए अति विकट था। ऐसे में उनके माता-पिता ने उसमें हौसला भरा। सुमित्रा ने जैसे-तैसे कर स्वयं को परिस्थितियों से लड़ने के लिए मजबूत बनाया। सुमित्रा ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को एक सफल इंसान बनाएंगी चाहे उसके लिए उन्हें घर-बार ही क्यों न छोड़ना पड़े। सुमित्रा अपने तीनों बच्चों को शिक्षित करने के लिए 6 वर्ष तक अपने घर को छोड़कर राजस्थान के सीकर में रहीं। आज सुमित्रा की बड़ी बेटी 26 वर्षीय अंजनी स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर है। वहीं, उससे छोटी बेटी 24 वर्षीय प्रीति बागवानी में बीएससी कर आगे की तैयारी कर रही है। वहीं, बेटा 23 वर्षीय प्रिंस आईआईटी करने के बाद आज मुंबई में एक अच्छी नौकरी कर रहा है। सुमित्रा जब बीता हुआ समय याद करती हैं तो सिहर उठती हैं। आज बच्चों को सफल देखकर उन्हें अब जिंदगी से कोई शिकवा नहीं है।
परिवार ने दिया हौसला तो संभाला खुद को
गांव पन्नीवाला मोटा निवासी 57 वर्षीय निर्मला देवी का 5 वर्ष पूर्व पति का साथ छूट गया। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पति रामसिंह किराये पर गाड़ी चलाकर व एक छोटी सी दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। कोरोना काल में रामसिंह की मृत्यु हो गई। हालांकि, 3 बेटियों की शादी रामसिंह के रहते हो चुकी थी, लेकिन एक बेटा व एक बेटी अभी कुंवारे हैं। पति की मौत के बाद घर व 2 बच्चों को संभालना निर्मला देवी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। काफी समय तक तो निर्मला पति की मौत के सदमे से उभर भी नहीं पाई थी। परिवार के लोगों ने उनमें जीने का हौसला भरा। इसके बाद उन्होंने ठान ली कि वह बेटा-बेटी दोनों को अच्छी शिक्षा दिलवाकर अपने पैरों पर खड़ा करेंगी। इसके लिए निर्मला देवी ने पति की दुकान को संभाला और जैसे-तैसे कर अपने बच्चों को पढ़ाया और घर को संभाला। निर्मला देवी के बेटे की डेढ़ वर्ष पूर्व सरकारी नौकरी लग गई जबकि बेटी पुलिस की तैयारी कर रही है। निर्मला देवी की आंखें आज भी उस समय को याद कर नम हो उठती हैं। उन्हाेंने कहा कि वह समय पूरे परिवार के लिए विकट था, लेकिन परिवार ने उन्हें हौसला दिया। इसकी बदौलत उन्होंने उस कठिन समय को पीछे छोड़ दिया।
जिम्मेदारी कंधों पर आई तो सर्वजीत कौर ने थामी ट्रैक्टर की स्टीयरिंग
गांव ओढ़ां निवासी 42 वर्षीय महिला सर्वजीत कौर एक छोटी खेतिहर किसान हैं। सर्वजीत को एक बेटा व एक बेटी है। थोड़ी सी भूमि होने के चलते खेती कार्य से पति-पत्नी दोनों अपनी आर्थिक दशा में सुधार लाने में असक्षम थे। इसी बीच महिला सर्वजीत कौर के पति बलकरण सिंह की सेहत बिगड़ने के चलते वह चारपाई पर पड़ गए। एक तो पहले से ही आर्थिक दशा कमजोर थी और ऊपर से पति के बीमार होने के चलते घर का पूरा बोझ सर्वजीत कौर के कंधों पर आ गया। खेती संभालने वाला कोई न होने के चलते सर्वजीत कौर ने खुद को मजबूत करते हुए यह ठान लिया कि वह किसी पर आश्रित न होकर खुद खेती करेंगी। खेती कार्य से पूरी तरह से परिचित न होने के चलते शुरुआत के दौर में सर्वजीत कौर को काफी परेशानी झेलनी पड़ीं। पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आने के बाद उन्होंने स्वयं ही ट्रैक्टर की स्टीयरिंग थाम ली। अपने पति से पूछ-पूछकर धीरे-धीरे वह खेती कार्य में इस कदर निपुण हो गईं कि बुआई-बिजाई व सिंचाई तक खुद करने लग गईं। सर्वजीत कौर ने अपने दम पर दोनों बच्चों को बेहतर ढंग से पढ़ा-लिखाकर सफलता की राह पर अग्रसर किया। उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के समक्ष आर्थिक दशा या कार्य को कभी आड़े नहीं आने दिया। आज उनकी बेटी बठिंडा में एक निजी बैंक में असिस्टेंट मैनेजर है, वहीं, बेटा बीए की पढ़ाई कर रहा है।

सर्वजीत कौर