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Bilaspur News: भीड़ हिंसा व एससी-एसटी अत्याचार मामले में आरोपी की जमानत खारिज

Thu, 06 Aug 2026 11:37 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Thu, 06 Aug 2026 11:37 PM IST
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Bail rejected for accused in mob violence and SC/ST atrocity case.
120 फीट गहरी ढांक से धक्का देने, मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी के हैं आरोप
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घुमारवीं थाना में दर्ज भीड़ हिंसा, हत्या के प्रयास और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े मामले में विशेष न्यायाधीश की अदालत ने आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से आरोपी की प्रथमदृष्टया सक्रिय भूमिका सामने आती है और मामले की गंभीरता को देखते हुए इस स्तर पर उसे जमानत नहीं दी जा सकती।
आरोपी ने अदालत में दायर याचिका में स्वयं को निर्दोष बताते हुए झूठा फंसाने का दावा किया था। उसका कहना था कि उसे काफी समय बाद गिरफ्तार किया गया, इसलिए उसकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं थी। उसने जांच और ट्रायल में सहयोग करने तथा गवाहों को प्रभावित न करने का भी आश्वासन दिया था। राज्य की ओर से दायर जवाब में कहा गया कि सात जून 2026 को शिकायतकर्ता और उसके साथियों को रास्ते में रोककर उनके साथ मारपीट की गई। आरोप है कि आरोपियों ने लाठियों से हमला किया, जान से मारने की धमकी दी, एक घायल को करीब 120 फीट ऊंची ढांक से नीचे धक्का दिया तथा अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति के साथ सार्वजनिक रूप से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। जांच के दौरान मोबाइल फोन, वीडियो रिकॉर्डिंग, पेन ड्राइव, फेसबुक स्क्रीनशॉट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी जब्त किए गए हैं। अभियोजन के अनुसार आरोपी ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर ग्रामीणों को शिकायतकर्ताओं को मारने और जिंदा दफनाने के लिए उकसाया। अदालत ने माना कि गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और मेडिकल रिपोर्ट प्रथमदृष्टया अभियोजन के आरोपों का समर्थन करते हैं।
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अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ने अपनी जमानत याचिका में आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं होने का दावा किया, जबकि पुलिस की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार उसके खिलाफ पहले से तीन आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। इनमें एक मामले में उसे डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि दो मामले अभी न्यायालय में लंबित हैं। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना माना। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि भीड़ हिंसा के मामलों में वृद्धि चिंताजनक है और किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का शासन सर्वोपरि है। कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता। अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्यों, लंबित जांच और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को देखते हुए आरोपी की जमानत याचिका खारिज की जाती है।
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