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Bilaspur News: कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन में वन भूमि सीमांकन पर सीएम कार्यालय सख्त
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Tue, 24 Feb 2026 11:55 PM IST
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एक्सक्लूसिव
प्रधान मुख्य अरण्यपाल से तुरंत रिपोर्ट तलब, शर्तों के पालन पर उठे गंभीर सवाल
बिना जांच सभी शर्तें पूरी होने की रिपोर्ट भेजने का आरोप, बुर्जियों पर नंबर नहीं होने से बढ़ा विवाद
मुख्यमंत्री कार्यालय के विशेष सचिव ने पत्र जारी कर मांगी पिलरों की रिपोर्ट
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना में परिवर्तित वन भूमि के सीमांकन और आरओडब्ल्यू (राइट ऑफ वे) के आरसीसी पिलरों की स्थापना को लेकर मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस संबंध में संज्ञान लेते हुए प्रधान मुख्य अरण्यपाल हिमाचल प्रदेश शिमला को जांच कर तुरंत प्रभाव से रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री कार्यालय के विशेष सचिव की ओर से जारी पत्र में मामले की शिकायत का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन में परिवर्तित वन भूमि पर आरओडब्ल्यू पिलरों के सत्यापन संबंधी मामले की जांच कर रिपोर्ट भेजी जाए। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति की शिकायत है कि परियोजना के तहत सड़क के दोनों ओर एक भी पिलर सही तरीके से स्थापित नहीं किया गया है। इससे अधिग्रहित चौड़ाई (एक्वायर्ड विड्थ) और कंट्रोल विड्थ की मौके पर पुष्टि नहीं हो पा रही, जिसके कारण कई स्थानों पर अवैध कब्जे और अवैध निर्माण भी हो रहे हैं। समिति ने इस संबंध में मुख्यमंत्री सहित करीब 16 विभागों को लिखित शिकायत भेजी थी। प्रभावितों के अनुसार पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2022 में परियोजना को सशर्त अनुमति देते समय स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कार्य शुरू करने से पहले प्रत्येक शर्त की अनुपालना का अलग-अलग प्रमाणपत्र जारी किया जाए। बताया जा रहा है कि परियोजना निदेशक की ओर से ऐसा प्रमाणपत्र डीएफओ को भेजा गया था। शिकायत है कि डीएफओ ने बिना मौके पर उचित जांच-पड़ताल किए ही सरकार को रिपोर्ट भेज दी कि सभी शर्तें पूरी कर ली गई हैं और परियोजना को दोबारा शुरू करने की अनुमति मांगी गई। प्रभावितों का कहना है कि इस प्रक्रिया में सरकार को गलत जानकारी दी गई।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि यदि शर्तों का सही पालन हुआ होता तो सड़क के दोनों ओर लगाए गए सीमांकन पिलरों (बुर्जियों) पर स्पष्ट नंबर अंकित होने चाहिए थे। वर्तमान में कई स्थानों पर पिलरों पर आगे या पीछे कहीं भी नंबर दर्ज नहीं हैं, जिससे उनकी प्रमाणिकता और वास्तविक सीमांकन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बता दें कि वन विभाग की स्वीकृति की शर्त नंबर-18 के तहत सड़क के दोनों ओर बुर्जियां स्थापित करना, पिलर-टू-पिलर दूरी, बैक बियरिंग और फ्रंट बियरिंग दर्ज करना अनिवार्य था, लेकिन पिछले लगभग 13 वर्ष से इसकी अनुपालना नहीं हो पाई है। अब मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद मामले में विभागीय जिम्मेदारी तय होने और वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है।
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बिना जांच सभी शर्तें पूरी होने की रिपोर्ट भेजने का आरोप, बुर्जियों पर नंबर नहीं होने से बढ़ा विवाद
मुख्यमंत्री कार्यालय के विशेष सचिव ने पत्र जारी कर मांगी पिलरों की रिपोर्ट
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना में परिवर्तित वन भूमि के सीमांकन और आरओडब्ल्यू (राइट ऑफ वे) के आरसीसी पिलरों की स्थापना को लेकर मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस संबंध में संज्ञान लेते हुए प्रधान मुख्य अरण्यपाल हिमाचल प्रदेश शिमला को जांच कर तुरंत प्रभाव से रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री कार्यालय के विशेष सचिव की ओर से जारी पत्र में मामले की शिकायत का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन में परिवर्तित वन भूमि पर आरओडब्ल्यू पिलरों के सत्यापन संबंधी मामले की जांच कर रिपोर्ट भेजी जाए। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति की शिकायत है कि परियोजना के तहत सड़क के दोनों ओर एक भी पिलर सही तरीके से स्थापित नहीं किया गया है। इससे अधिग्रहित चौड़ाई (एक्वायर्ड विड्थ) और कंट्रोल विड्थ की मौके पर पुष्टि नहीं हो पा रही, जिसके कारण कई स्थानों पर अवैध कब्जे और अवैध निर्माण भी हो रहे हैं। समिति ने इस संबंध में मुख्यमंत्री सहित करीब 16 विभागों को लिखित शिकायत भेजी थी। प्रभावितों के अनुसार पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2022 में परियोजना को सशर्त अनुमति देते समय स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कार्य शुरू करने से पहले प्रत्येक शर्त की अनुपालना का अलग-अलग प्रमाणपत्र जारी किया जाए। बताया जा रहा है कि परियोजना निदेशक की ओर से ऐसा प्रमाणपत्र डीएफओ को भेजा गया था। शिकायत है कि डीएफओ ने बिना मौके पर उचित जांच-पड़ताल किए ही सरकार को रिपोर्ट भेज दी कि सभी शर्तें पूरी कर ली गई हैं और परियोजना को दोबारा शुरू करने की अनुमति मांगी गई। प्रभावितों का कहना है कि इस प्रक्रिया में सरकार को गलत जानकारी दी गई।
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शिकायत में यह भी कहा गया है कि यदि शर्तों का सही पालन हुआ होता तो सड़क के दोनों ओर लगाए गए सीमांकन पिलरों (बुर्जियों) पर स्पष्ट नंबर अंकित होने चाहिए थे। वर्तमान में कई स्थानों पर पिलरों पर आगे या पीछे कहीं भी नंबर दर्ज नहीं हैं, जिससे उनकी प्रमाणिकता और वास्तविक सीमांकन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बता दें कि वन विभाग की स्वीकृति की शर्त नंबर-18 के तहत सड़क के दोनों ओर बुर्जियां स्थापित करना, पिलर-टू-पिलर दूरी, बैक बियरिंग और फ्रंट बियरिंग दर्ज करना अनिवार्य था, लेकिन पिछले लगभग 13 वर्ष से इसकी अनुपालना नहीं हो पाई है। अब मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद मामले में विभागीय जिम्मेदारी तय होने और वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है।