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हिमाचल: सड़कें बंद होंगी तो आसमान से पहुंचेगी दवा, एम्स का मेगा प्रोजेक्ट बनेगा संजीवनी; 100 KM की होगी रेंज

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर। Published by: अंकेश डोगरा Updated Fri, 23 Jan 2026 06:00 AM IST
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सार

हिमाचल प्रदेश में एम्स बिलासपुर ने दुर्गम इलाकों में दवाइयां और वैक्सीन पहुंचाने के लिए हाईटेक ड्रोन सेवा का टेंडर जारी कर दिया है। ऐसे में मरीजों को किसी भी आपात स्थिति में इलाज मिल पाएगा। पढ़ें पूरी खबर...

Himachal If roads are blocked medicines will be delivered by air AIIMS mega project will be a lifesaver
एम्स बिलासपुर (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल के ऊंचे पहाड़ों पर अब आपात स्थिति में इलाज के लिए आसमान का रास्ता खुलेगा। एम्स बिलासपुर ने दुर्गम इलाकों में दवाइयां और वैक्सीन पहुंचाने के लिए हाईटेक ड्रोन सेवा का टेंडर जारी कर दिया है। मेक इन इंडिया के तहत तैयार होने वाले ये ड्रोन बियॉन्ड विजुअल लाइन ऑफ साइट तकनीक से लैस होंगे, जो कंट्रोल रूम से नजर न आने पर भी निर्धारित फ्लाइट पाथ पर उड़ते हुए सीधे मंजिल तक पहुंचेंगे।

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एम्स बिलासपुर का यह ‘एयर कॉरिडोर’ उन परिस्थितियों में वरदान बनेगा जब सड़कें बंद होंगी और मरीज को ‘गोल्डन ऑवर’ में दवा की जरूरत होगी। इन ड्रोन के लिए वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग तकनीक अनिवार्य की गई है। यानी ये ड्रोन हेलीकॉप्टर की तरह सीधे उड़ान भरेंगे और सीधे ही लैंड करेंगे। जीपीएस के जरिए इनकी लैंडिंग इतनी सटीक होगी कि तय बिंदु से महज दो मीटर के दायरे में ही दवा की खेप पहुंच जाएगी। इस प्रोजेक्ट के धरातल पर आने के बाद आपात स्थिति में दवाइयां, वैक्सीन और ब्लड सैंपल सड़क के भरोसे नहीं रहेंगे। एम्स ने इसकी खरीद के लिए टेंडर जारी कर दिया है।

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तकनीकी शर्तों के अनुसार, ड्रोन में इमरजेंसी रिकवरी मोड होगा। अगर उड़ान के दौरान संचार टूट जाए, बैटरी कम हो जाए या हवा की रफ्तार बढ़ जाए, तो ड्रोन अपने आप बेस स्टेशन (एम्स बिलासपुर) पर लौट आएगा। इसके अलावा ‘पुश बटन’ सुविधा भी दी गई है, जिससे डिलीवरी के बाद एक बटन दबाते ही ड्रोन वापसी की उड़ान भरेगा। पेलोड बॉक्स में तापमान रिकॉर्ड करने की सुविधा होगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वैक्सीन या जैविक सैंपल पूरे सफर के दौरान सुरक्षित तापमान में रहे। यदि ड्रोन की खराबी से पेलोड को नुकसान होता है, तो उसकी पूरी भरपाई वेंडर को करनी होगी।

इस मिशन को जमीनी स्तर पर सफल बनाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं और स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षित किया जाएगा। इन्हें पेलोड हैंडलिंग की ट्रेनिंग देने और उनके मानदेय का खर्च भी ड्रोन संचालक कंपनी ही उठाएगी। पेलोड की अधिकतम तीन किलो वजन ले जाने की क्षमता, ड्रोन रेंज में एक बार चार्ज करने पर न्यूनतम 100 किमी (दोतरफा) की दूरी। कम से कम 3 डीजीसीए प्रमाणित पायलट तैनात करने होंगे। हर समय 2 ड्रोन ऑपरेशन के लिए तैयार रहेंगे। सेवा प्रदाता कंपनी को ब्रेकडाउन होने पर 1 घंटे में ड्रोन बदलना होगा, वरना 5000 का रोज जुर्माना होगा। पहले 1 साल के लिए, प्रदर्शन के आधार पर तीन साल तक विस्तार किया जाएगा। एम्स प्रशासन ने नियमों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। यदि कोई कंपनी सेवा देने में विफल रहती है या टेंडर की शर्तों का उल्लंघन करती है, तो उसे 2 साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। गौरतलब है कि हिमाचल के कई इलाके सर्दियों में भारी बर्फबारी और मानसून में लैंडस्लाइड के कारण कट जाते हैं। ऐसे में ये प्रोजेक्ट मददगार बनेगा।

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